हजारों सुरंगों वाला ‘शेरगढ़ का किला’, आज भी यहां जाने से डरते हैं लोग

भारत का इतिहास गजब का रहा है। इस इतिहास को जानने और समझने में सबसे ज्यादा मदद अगर किसी चीज से मिलती है तो इतिहास के राजाओं के द्वारा बनवाए गए किलों और दुर्गो से। किलों की बनावट के कारण ही उस समय के राजाओं के रहन-सहन से लेकर उनकी निजी जिंदगी और उनके दरबारों के बारे में पता चल पाता है। वहीं हमारे देश के कई हिस्सों में बने इन ऐतिहासिक किलों से कई रहस्यमयी कहानियां भी जुड़ी है। जो सच है या झूठ इस बारे में अभी तक कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। ऐसा ही एक किला है बिहार के सासाराम में, जिसका इतिहास अफगान शासक शेर शाह सूरी से जुड़ा हुआ है। इस किले का नाम है ‘शेरगढ़ का किला’।

यह किला जितना रहस्यमयी है उतनी ही कहानियां इससे जुड़ी हुई हैं। किले को लेकर जो सबसे ज्यादा इंट्रेस्ट पैदा करने वाली बातें हैं वो यहां की सुरंगे और तहखानों से जुड़ी हैं। कहा जाता है कि, इस किले में सुरंगों और तहखानों की संख्या इतनी है कि, इसका सही आंकड़ा शायद किसी को नहीं पता। वहीं इन तहखानों और सुरंगों को भूतिया भी माना जाता है। इस किले की खासियतें आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं लेकिन सरकार और प्रशासन की अनदेखी ने इस किले को पहाड़ी पर घने जंगलों और झाड़ियों में छुपा दिया है।

Shergarh Fort- क्या है कैमूर की पहाड़ी पर बने इस किले का इतिहास?

बिहार के रोहतास जिले के सासाराम से 20 मील दूर दक्षिण-पश्चिम व चेनारी से लगभग 12 किमी दक्षिण में 800 फीट ऊंची कैमूर की पहाड़ियां हैं। इसी पहाड़ी की चोटी पर बना है शेरशाह का शेरगढ़ वाला किला। यह किला लगभग 6 वर्ग मील क्षेत्रफल में फैला है और 470 साल पुराना माना जाता है। शेर शाह सूरी ने इस पर कब्जा किया या इसे बनवाया इसपर भी एक अलग बहस है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि शेरशाह के अच्छे मित्र खरवार राजा गजपती ने उन्हें यह तोहफें में दिया था। ये किला 1540 से 1545 के बनकर तैयार हुआ और 1576 में ये मुगलों के हाथ लग गया। ऐसा भी कहा जाता है कि रोहतास किले पर कब्जा करने के बाद शेरशाह की नजर इस पर पड़ी और इसे भी उसने अपने अधीन ले लिया। इस किले को कभी नवाबगढ़ भी कहा जाता था।

किले के एक ओर दुर्गावती नदी है तो दूसरी ओर जंगल। किले के नीचे हाल ही में दुर्गावती नदी पर डैम बना है। किले के अंदर सुरंगो और तहखानों का अंबार है। वहीं इस किले के अंदर जाने के लिए भी सुरंग से ही होकर जाया जा सकता है और अगर इसे बंद कर दिया जाए तो किले के अंदर घुसना नामुमकिन है। किला कुछ इस तरीके से बना है कि बाहर से देखने वाले को कभी ऐसा लगेगा ही नहीं कि, पहाड़ की ऊंचाइयों पर कोई किला है। किले के अंदर बने तहखानों के बारे में कहा जाता है कि, ये इतने बड़े हैं कि, मुश्किलों के समय में इनमें 10 हजार से ज्यादा सैनिक छुप के रह सकते हैं।

Shergarh Fort- भूतिया मानते है लोग, सरकार ने भी नहीं दिया ध्यान

सुरक्षा के मामले में सबसे बेस्ट होने के कारण ही शेरशाह इसी किले में अपने परिवार संग रहता था। बात किले के कमरों की करें तो ये ऐसे बने हुए हैं कि, हर दिशा में 10 किमी दूर से भी अगर कोई दुश्मन आक्रमण के लिए आ रहा हो तो उसे देखा जा सकता था। बात अगर किले में बने सुरंगों की करें तो ये 400 साल पहले इसलिए बनवाई गईं थी ताकि, मुसीबत के समय किले के बाहर जाने में कोई दिक्कत न हो। इसमें बनी हजारों सुरंगें किसी भी दूसरे किले की तरह नहीं हैं, इन सुरंगों का राज सिर्फ शेरशाह और उसके कुछ भरोसेमंदों को ही पता था। यहां से एक सुरंग सीधे रोहतास किले से जुड़ी हुई है। इसके जरिए सैनिक पहाड़ों में दुश्मनों को बिना दिखे काफी दूर तक निकल जाते थे। वहीं यहां के तहखाने में शेरशाह अपने दुश्मनों को कड़ी यातनाएं देता था।

Shergarh Fort

किले के सुरंगों को लेकर कहा जाता है कि इसमें भीषण नरसंहार हुआ था। जब मुगल सेना को इस किले के बारे में पता चला तो उसने इसपर हमला कर शेरशाह के पूरे परिवार को किले के नीचे बहती दुर्गावती नदी में फेंक दिया और साथ ही हजारों सैनिकों को किले के अंदर ही सुरंगो में फंसा कर मरने के लिए छोड़ दिया। सैनिकों को सुरंगों का राज नहीं पता था जिसके कारण वे उससे बाहर नहीं निकल सके। इस बड़े नरसंहार के बाद से इस महल में कोई नहीं रहा। आज भी लोग यहां अकेले जाने से डरते हैं। फ्रांस के यात्रि फ्रांसिस बुकानन के अनुसार यहां भारी नरसंहार हुआ था। इसी कारण यह किला अभिशप्त माना जाता है।

देश के बड़े किलों और रहस्यमयी जगहों से खजानों को लेकर कहानियां हमेशा से जुड़ी रहती है। इस किले से भी एक ऐसा ही इतिहास जुड़ा हुआ है। कहते हैं शेरशाह की बहुत सारी टकसालें थीं, जिनमें वो सोने और चांदी के सिक्के बनवाया करता था। इन्ही टकसालों में से एक इस किले के अंदर थी। ऐसा कहा जाता है कि, इस किले में शेरशाह का खजाना कहीं छुपा हुआ है जिसे अभी तक ढूंढा नहीं जा सकता है और ऐसा लगता है कि, शायद ही कभी ढूंढा जा सकें कयोंकि सरकार की बेरूखी के कारण यह ऐतिहासिक किला पर्यटन स्थल बनने की बजाए बियाबान में तब्दील हो चुका है।

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