हजारों सालों से धर्म की दीवार को गिरा रहा है ‘छठ का महापर्व’

भारत सिर्फ एक देश नहीं है बल्कि दुनिया की सबसे पुरानी और जीवित सभ्यता है। दुनिया की सारी सभ्यताएं एक—एक कर खत्म हो गईं लेकिन भारत की सभ्यता आज भी पांच हजार सालों से लगातार आगे बढ़ रही है। इसका सिर्फ एक कारण है और वो है यहां का ‘कंपोजिट कल्चर’, जो इस देश की जीन में है। यह एक ऐसा कल्चर है जो यहां रहने वाले हर एक के अंदर है और इसी ‘इंडियननेस क्वालिटी’ के कारण आज भी भारत में कई धर्म—सम्प्रदायों के लोग मिल-जुलकर साथ रहते हैं।

Chhath

ऐसा नहीं है कि, इस देश में धर्म के नाम पर दिवारें नहीं खड़ी की जाती, लेकिन कई ऐसे मौके होते हैं जहां ये दिवारें ढह जाती हैं। भारत के पर्व त्योहारों में इसकी झलक हर साल देखने को मिलती है। अब छठ पूजा के महापर्व को ही देख लीजिए। भारत के पूर्वी राज्य बिहार, झारखंड और पूर्वी यूपी में इस महापर्व को मनाया जाता है। कहा जाता है कि, सिर्फ हिन्दू इस त्योहार को मनाते हैं। लेकिन इस धारणा की जमीनी हकीकत ना के बराबर है। कई मुस्लिम परिवार भी आपको इस दिन छठ घाट पर पूजा करते और लोगों की सेवा करते दिख जाएंगे।

Chhath- हिंदुओं संग मुस्लिम परिवार भी मनाते हैं छठ पर्व

अब बिहार के समस्‍तीपुर जिले में सिथत सरायरंजन प्रखंड के बथुआ बुजुर्ग गांव को ही देख लीजिए। इस गांव में हिंदुओ के संग ही मुस्लिम परिवार भी छठ का व्रत करते हैं और वह भी एक साथ एक ही घाट पर। ऐसा नहीं है कि, यह परंपरा हाल-फिलहाल में शुरू हुई है। यहां के मुस्लमान करीब सौ सालों से छठी मैया की पूजा पूरी श्रद्धा से करते आ रहे हैं। 100 साल पहले जब मुस्लिम समुदाय के लोगों ने व्रत करना शुरू किया था तो केवल एक से दो परिवार के लोग ही घाटों पर दिखते थे। लेकिन आज यहां संख्या 100 के पार पहुंच गई है। यहां के लोग कहते हैं कि बथुआ बुजुर्ग पंचायत के लहेरिया, सिहमा टोला और सीमावर्ती बखरी बुजुर्ग पंचायत के धुनिया टोले के मुस्लिम समाज के लोगों ने यहां के तालाब के किनारे छठ व्रत करना शुरू किया था।

दरअसल बता दें कि, इस गांव के ज्यादातर लोग फिर चाहे वे हिन्दू हों या मुस्लिम ये सभी पेशे से बुनकर हैं। ये लोग पीढ़ियों से बुनकर का काम करते आ रहे हैं। ऐसे में इसी व्यवसाय के कारण इनमें एक जुड़ाव रहा। इसी बीच छठ व्रत की ओर मुस्लिम सुमुदाय का रूझान हुआ। कई मुस्लिम महिलाओं ने व्रत किया और जो मन्नते मांगी वो पूरी हुईं, बस इसी के बाद उनकी आस्था भी छठी मैया के प्रति जाग गई। धीरे—धीरे धर्म की बेड़ियां टूट गईं और अब छठ पर हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर एक ही घाट पर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ देते हैं। 

Chhath- सिर्फ एक नहीं, कई गांवों में एक साथ छठ मनाते हैं दो धर्म

वैसे बिहार का यह इकलौता ऐसा गांव नहीं है। कई ऐसे गांव हैं जहां के मुस्लिम परिवार छठ करते हैं या छठ में उपयोग होने वाली चीजें बनाते हैं। जैसे कि, छपरा का गांव झौंवा, यहां के मुस्लमान छठ में उपयोग होने वाले ‘आरता का पात’ बनाने का काम पिछले सौ सालों से भी अधिक दिनों से कर रहे हैं। इस गांव में बने ‘आरता का पात’ अमेरिका तक इस पर्व के लिए भेजे जाते हैं।

बिहार के हर जिले में आपको छठ व्रत पर हिन्दु-मुस्लिम सद्भाव का यह दृश्य देखने को मिल जाएगा। ऐसे कई गांव हैं जहां हर जाति और धर्म के लोग एक साथ बैठे और छठी मैया का लोकगीत गाते हुए मिल जाएंगे। यही तो हमारे देश की ‘इंडियननेस क्वालिटी’ है। जो दिखाती है कि हम कितने भी अलग क्यों न हों लेकिन हम एक हैं।

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