स्वर्ण मंदिर की रसोई, यह सिर्फ एक किचन नहीं भारतीयता की पहचान है

‘रसोई’ का अर्थ पके हुए खाने से होता है, और जहां यह रसोई बनती है उसे रसोई घर, रसोई कक्ष, चौका, रसोईगृह या पाकशाला कहते हैं। हमारे देश में रसोई का खास महत्व है क्योंकि महत्व अन्न का है। अन्न को अगर माता माना गया है तो रसोई घर को उस मां का घर माना गया है। इसलिए रसोई घर का ख्याल खासतौर पर रखा जाता है। लेकिन रसोई सिर्फ घर का एक छोटा सा कमरा नहीं होता.. यह एक घर के कमरे से लेकर बाहर हर रोज होने वाले लंगरों तक के अलग—अलग प्रकारों में हमें हमारे देश में देखने को मिलती है। यह भारत ही है जहां आपको, हमें और दुनिया के बाकी लोगों को बड़े—बड़े रसोईघर देखने को मिलते हैं। इन बड़ी—बड़ी रसोई घरों के होने के पीछे हमारी पुरातन संस्कृति भी है। क्योंकि हमारा समाज भरे पूरे समाज वाला रहा है तो हमारे देश में ऐसे रसोई घर पहले हर घर में हुआ करते थे। जहां एक साथ कई लोगों के लिए खाना बना करता था। लेकिन जैसे—जैसे सामाज बदला घरों की रसोई सिमटी चली गई और अब यह एक ‘किचन’ बन गई है। लेकिन देश के मंदिरों—मठों में आज भी इन कम्यूनिटी रसोई घरों की परंपरा जीवित है। वैसे तो हमारे देश में कई जगहों पर विशाल रसोई घर आपको देखने को मिल जाएंगी लेकिन स्वर्ण मंदिर की रसोई इन सबमें सबसे बड़ी है।

स्वर्ण मंदिर

स्वर्ण मंदिर और यहां का रसोई घर

सिख धर्म का सबसे बड़ा धर्म स्थल अमृतसर में स्थित स्वर्ण मंदिर को माना जाता है। इसी के चारों ओर पूरा शहर बसा हुआ है। इस मंदिर की नींव सिखों के चौथे गुरू रामदास जी ने रखी थी। कहा जाता है कि, इस मंदिर को कई बार तोड़ा गया, लेकिन आस्था के कारण सिखों ने हर बार इसका पुन: निर्माण कराया। इस मंदिर पर जितनी बार भी हमला हुआ उसका सारा ब्योरा मंदिर के अंदर चित्रों के रूप में दिखाया गया। स्वर्ण मंदिर आस्था के कारण तो श्रद्धालुओं में फेमस तो है ही, लेकिन सबसे ज्यादा जो लोगों को यहां आकर्षित करती है वह है यहां की रसोई, जो 24 घंटे सातों दिन चलती रहती है। इस रसोई में बनने वाले खाने से हर दिन 1 लाख से ज्यादा लोगों का पेट भरता है और इसके लिए कोई चार्ज नहीं लिया जाता। यह बिल्कुल मुफ्त होती है और रसोई का द्वार सबके लिए चाहे वो कोई भी इंसान हो, किसी भी जाति का हो, किसी भी धर्म का हो, किसी भी नस्ल का हो या किसी भी देश का हो, खुला रहता है।

स्वर्ण मंदिर में लगने वाले लंगर की सबसे बड़ी खासियत है कि, यहां किसी को कभी भी खाने के लिए रोका नहीं जाता। मंदिर आने वाला हर भूखा यहां अपनी क्षुदा को शांत कर सकता है। असल में मंदिर का भंडारा ही यहां का असल प्रसाद होता है। लंगर या भंडारे की प्रथा लगभग हर गुरूद्वारे में है। कहते हैं इसकी परंपरा सबसे पहले गुरूनानक देव जी ने की थी, जो सिखों के पहले गुरू भी थे। नानकदेव जी का पूरा जीवन मानवता की सेवा का रहा है और भूखे को खाना खिलाना इसी सेवा का सबसे महत्वपूर्ण काम था। उनके बाद सिख धर्म के सभी गुरूओं ने इस परंपरा को बनाए रखा और गुरूगोबिंद सिंह जी के बाद गुरूद्वारा की देख-रेख में रहने वाले लोगों ने इस परंपरा को बनाए रखा। स्वर्ण मंदिर में लगने वाला लंगर मानवता में आस्था का प्रतीक है और यहीं कारण है कि, सिख धर्म से जुड़ा बड़े से बड़ा आदमी भी इस लंगर में अपनी सेवा देता हुआ दिख जाएगा।

स्वर्ण मंदिर में कैसे तैयार होता है लंगर का खाना?

स्वर्ण मंदिर की रसोई सबसे बड़ी, सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में है। अब जब यह रसोई सबसे बड़ी है तो इसका मतलब है कि, यहां हर रोज बहुत खाना बनता होगा और लाखों लोग इसे खाते होंगे। स्वर्ण मंदिर में हर रोज लगभग एक लाख से ज्यादा लोग पहुंचते हैं और ये सारे लोग यहां के लंगर में बनने वाला खाना जरूर खाते हैं। इतनी बड़ी संख्या को खाना खिलाना एक बहुत बड़ा काम है, जिसमें भारी मेहनत और भारी मात्रा में अनाज लगता है। स्वर्ण मंदिर की रसोई में इतनी बड़ी आबादी को हर रोज खाना खिलाने के लिए करीब 2,00,000 रोटियां, 1.5 टन दाल, 25 क्विंटल अनाज, समेत कई अन्य व्यंजन बनते हैं।

श्रद्धालुओं की संख्या को ध्यान में रखते हुए 12,000 किलो आटे से दिनभर में लगभग 2 लाख चपातियां बनाई जाती हैं। ऑटोमेटिक रोटी मेकर भी इस्तेमाल किया जाता है, जो एक घंटे में लगभग 25,000 रोटियां बनाता है। इस खाने को बनाने में कुल 100 एलपीजी सिलेंडर और 5,000 किलोग्राम जलाऊ लकड़ी भी लगती है। दरअसल, खाना पकाने में रेगुलर रूप से जितने लोग लगे होते हैं उससे ज्यादा संख्या यहां सेवादारों की होती है जो गुरूद्वारे के हर काम में अपनी स्वेच्छा से हाथ बंटाते हैं। ये लोग सब्ज़ियां छीलने से लेकर खाना पकाने और बाद में उसे श्रद्धालुओं के बीच परोसन तक में अपना योगदान करते हैं। इस तरह यहां का रसोई घर आपसी सहयोग और लोगों के अंदर सेवा करने के भाव पर निरंतर बिना रुके चलता रहता है।

स्वर्ण मंदिर

कहते हैं कि, स्वर्ण मंदिर में लगने वाले गुरु लंगर से कोई भूखा नहीं जाता फिर चाहे वो किसी भी धर्म और जाति का हो उसे उसी पात में बैठकर सबके साथ समान रूप से खाना खाने को मिलता है जैसे अन्य सभी को। असल में यह भारतीय सनातन परंपरा का असल निर्वाह स्वर्ण मंदिर में हर रोज किया जाता है। वो सनातन परंपरा जिसमें ईश्वर के सामने सबको बराबर और समान माना गया है, वो सनातन परंपरा जिसमें कहा गया है कि, भगवान के दर से कोई खाली नहीं जाता। सनातनी परंपरा में अन्न को महादान माना गया है और स्वर्ण मंदिर इस काम को 400 सालों से कर रहा है। यहां की सबसे विशेष बात यह है कि, यहां आकर बड़े से बड़ा आदमी धरातल पर खुद को उतारता है और मानवता की सेवा में अपना योगदान देता है। भारतीयता की यह लहर हर दिन स्वर्ण मंदिर में निरंतर बह रही है।

कहते हैं कि, स्वर्ण मंदिर में लगने वाले गुरु लंगर से कोई भूखा नहीं जाता फिर चाहे वो किसी भी धर्म और जाति का हो उसे उसी पात में बैठकर सबके साथ समान रूप से खाना खाने को मिलता है जैसे अन्य सभी को। असल में यह भारतीय सनातन परंपरा का असल निर्वाह स्वर्ण मंदिर में हर रोज किया जाता है। वो सनातन परंपरा जिसमें ईश्वर के सामने सबको बराबर और समान माना गया है, वो सनातन परंपरा जिसमें कहा गया है कि, भगवान के दर से कोई खाली नहीं जाता। सनातनी परंपरा में अन्न को महादान माना गया है और स्वर्ण मंदिर इस काम को 400 सालों से कर रहा है। यहां की सबसे विशेष बात यह है कि, यहां आकर बड़े से बड़ा आदमी धरातल पर खुद को उतारता है और मानवता की सेवा में अपना योगदान देता है। भारतीयता की यह लहर हर दिन स्वर्ण मंदिर में निरंतर बह रही है।

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