स्वदेशी आंदोलन से जन्मा Parle G ब्रांड, जिसने कई अंग्रेजी कंपनियों की खटिया खड़ी कर दी

आजादी के बाद की तीसरी जेनरेशन भारत का भविष्य संवारने की ओर है। लेकिन आजादी के बाद और पहले के भारतीयों कि रोजमर्रा कि जिंदगी में एक चीज हमेशा कॉमन रही है और वो है ‘ parle.G’ बिस्किट्स। आज भी बिस्किट्स का नाम आते ही जुबान से पारले जी का नाम ही सबसे पहले निकालता है। चाय की चुस्की के साथ हो या क्रिकेट के ग्राउंड पर जीत के बाद का सेलेब्रेशन, सबमें पारले जी का अपना विशेष स्थान है। 2011 के नील्सन सर्वे के अनुसार ये बिस्किट सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया का सबसे फेमस और ज्यादा बिकने वाला बिस्किट ब्रांड है। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा प्राउड कि बात हम भारतीयों के लिए ये है कि ये ब्रांड स्वदेशी है यानि मेड इन इंडिया।

आज के दौर में जब बात मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर की हो रही है ऐसे में आपके और हमारे लिए पारले जी के शुरू होने और इसकी सफलता के शिखर पर पहुंचने की कहानी को जानना प्रेरणादायक है। आज हम Parle G की कहानी आपसे साझा करने जा रहे हैं।

स्वदेशी आंदोलन की आग से जन्मा Parle G

Parle G

आजादी के आंदोलन में स्वदेशी मूवमेंट का एक अलग योगदान है। इस आंदोलन ने भारतीयों के अंदर भारतीय होने का गौरव बढ़ाया, उन्हें बताया की वे आत्मनिर्भर बन सकते हैं और अंग्रेजों की गुलामी की जंजीर को तोड़ सकते हैं। स्वदेशी आंदोलन के कारण ही अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों के गुस्सा में उबाल आया। ये वो दौर था जब लोगों ने अंग्रेजी कपड़ों से लेकर अंग्रेजी सामानों और मुकरियों तक का बहिष्कार कर दिया। स्वदेशी आंदोलन आगे चलकर महात्मा गांधी के आंदोलन का सबसे महत्तवपूर्ण अंग बन गया।

स्वदेशी आंदोलन के इसी दौर में मुंबई के एक रेशम व्यापारी थे मोहनलाल दयाल, जो चौहान परिवार से आते थे। उन्होंने मिठाई बनाने का काम शुरू करने की प्लानिंग की थी। स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित होकर चौहान जी सबसे पहले जर्मनी पहुंचे और वहां मिठाई बनाने की ट्रेनिंग ली, इसके बाद वे वहां से 60,000 रुपए में एक मशीन लेकर भारत लौटे। यहीं उन्होंने एक पुरानी दुकान ली और उसमें अपनी मिठाई की फैक्टरी शुरू कर दी।

उनकी ये फैक्टरी झरला और परला गांव के बीच में स्थित थी। यह एक छोटा सा कारखाना था जिसमें उनके परिवार के लोगों के साथ हीं 12 और मर्द काम करते थे। ये लोग ही इस फैक्टरी के मैकेनिक थे, मैनेजर थे और मिठाई बनाने वाले मजदूर भी थे। इस फैक्टरी के बारे में सबसे मजेदार बात ये है कि, ये सभी लोग कारखाने को लगाने और इसे चालू करने मै इतने मशगूल थे कि इस वक़्त तक फैक्टरी या कंपनी का कोई नाम ही नहीं था। मतलब पारले जी का कारखाना तो लग गया पर पारले जी नाम कहीं नहीं था।

इसका नाम पहली बार तब रखा गया जब इसकी पहली टॉफी यानि कन्फेंसरी ब्रांड लॉन्च हुई। इस दौरान कंपनी का नाम इसके जन्म पर हुआ, यही वजह रही कि, इसका नाम Parle रखा गया। ये टॉफी का ब्रांड जल्द ही मार्केट में हिट हो गया। बाकी विदेशी ब्रांडों के मुकाबले स्वदेशी ब्रांड का जलवा चल गया था।  लेकिन टॉफी बनाने का काम कंपनी ने केवल 10 सालों तक किया, इसके बाद बारी बिस्किट्स की आईं।

दौर 1939 का था, उस समय बिस्किट्स के मार्केट में ब्रिटानिया, हंटली एंड पामर्स और यूनिट्स बिस्किट्स का भारतीय मार्केट पर कब्जा था। लेकिन इस बिस्किट्स ब्रांड की सबसे बड़ी कमजोरी ये थी कि अपने नाम कि तरह ही ये रॉयल थे, मतलब इनकी पहुंच मिडिल क्लास और गरीब लोगों तक नहीं थी। तब बिस्किट्स अमीरों की चीज मानी जाती थी। लेकिन पारले ने इस ट्रेंड को उल्टा कर दिया। दुनियाभर में द्वितीय विश्व युद्ध के बिगुल के बजने के बाद भी पारले ने अपना पहला बिस्किट ब्रांड तैयार किया और मार्केट में उतारा।

पारले द्वारा बनाई गई ये बिस्किट्स सस्ती थी और गुलूकोज युक्त थी। मतलब आम जनता के लिए सस्ते दामों में पोषण से भरा बिस्किट्स। इस बिस्किट् का नाम था पारले ग्लूको। एक तो भारतीय ब्रांड और ऊपर से सस्ता और पोषण वाला होने के कारण इस बिस्किट के मार्केट ने रफ्तार पकड़ ली। ये बिस्किट बहुत पॉपुलर हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश इंडियन आर्मी में इस बिस्किट की सबसे ज्यादा डिमांड थी।

ऐसे पड़ा Parle G नाम

Parle G

1947 में भारत आजाद हुआ, तब तक पारले भारत के बड़े उद्योगों में से एक था। लेकिन भारत के लिए आजादी कई सारी दिक्कतें भी लेकर आई। आजादी के तुरंत बाद भारत में गेहूं की कमी हो गई। जिसपर पारले ने अपने कस्टमर्स से अनुरोध किया कि जब तक देश में गेहूं का भंडारण सामान्य नहीं होता तब तक वे जौ से बना बिस्किट खाएं। पारले ने लोगों से यह अपील स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए लोगों को नमन करने के तौर पर किया।

1960 का दशक भी पारले के लिए मुश्किलों भरा रहा। इस दौरान कई बिस्किट्स ब्रांड्स ने अपनी गुलूकोज बिस्किट्स मार्केट में लॉन्च कर दी। ब्रिटानिया ने भी गुलूकोज बिस्किट लॉन्च की और इसका एड उसने शोले फिल्म के विलेन अमजद खान से करवाया। मार्केट में कई सारी गुलूकोज बिस्किट्स आने के कारण कन्फ्यूजन सा हो गया और नाम होने के बाद भी पारले गुल्को की बिक्री गिर गई। ऐसे में पारले ने नई स्ट्रेटर्जी पर काम किया। पहले उसने अपनी पैकेजिंग को पेटेंट करवाया फिर बिस्किट्स के लिए वैक्स पेपर रैपर लॉन्च किया। जिस पर एक छोटी सी लड़की कि तस्वीर थी और लाला रंग में पारले नाम अंकित था।

इस नई पैकेजिंग ने बच्चों और उनके परेंट्स को आकर्षित किया लेकिन उन्हें पारले गुल्को और अन्य गुल्को बिस्किट्स में अंतर समझने में ये पैकेजिंग नाकाम रहा। ऐसे में कंपनी ने फिर एक बार मंथन किया और इस बार वैक्स पेपर की जगह प्लास्टिक रैपर लेकर आई और नाम में भी बड़ा बदलाव किया। पहले जिस पारले बिस्किट्स पर Parle Gulco लिखा होता था अब उसका नाम Parle G हो गया, जिसमे G का मतलब गुलूकोज से ही था। नए रैपर पर लड़की की तस्वीर थी और बगल में पारले जी लिखा हुआ था, ये पैकेट पीले रंग की थी। पारले की इस पैकेजिंग और नाम में बदलाव ने कमाल कर दिया और इसे अन्य बिस्किट्स से अलग खड़ा कर दिया।

अद्भुत विज्ञापन तकनीक

Parle G

पैकेजिंग के संग पारले ने अपने टैग लाइन पर भी काम किया जैसे नई पैकेजिंग के बाद इसका टैग लाइन आया

“हर बार नकल की, लेकिन बराबरी कभी नहीं

इसके तुरंत बाद दादा और पोते वाला टीवी विज्ञापन आया जिसमें टैग लाइन था “स्वाद भरे, शक्ति भरे, पारले-जी”। जब 1998 में टीवी पर भारत का पहला स्वदेशी सुपरहीरो ‘ शक्तिमान ‘ आया तब पारले ने बिना मौका गवाए मुकेश खन्ना को अपना ब्रांड एम्बेसडर बना लिया।

इस एड में जब एलियन बच्चों की शक्ति निचोड़ रहे होते हैं, तब शक्तिमान parle G का ट्रक लेकर वहां पहुंचता है और बच्चों को बिस्किट देता है। जिसके बाद वे मिलकर एलियन शिप को तबाह कर देते हैं। इसके आलावा Parle G बिस्किट्स में शक्तिमान स्टिकर्स का ऑफर देकर पारले ने इसे बच्चों में लोकप्रिय  बना दिया। इसके बाद G फॉर जीनियस, हिन्दुस्तान की ताकत और रोको नहीं टोको नहीं जैसे विज्ञापन के बाद इसने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

Parle G

2013 विज्ञापन ‘ रोको मत, टोकों मत गुलजार साहेब ने लिखा जिसे पीयूष मिश्रा ने आवाज दी। कई शानदार विज्ञापनों ने पारले को मल्टिडिमेंशनल बना दिया। आज यह कंपनी अपने वर्ल्ड फेमस बिस्किट्स का एक महीने में 1 अरब बिस्किट्स पैकेट्स बेचने का दावा करती है। यानि हर साल 14600 करोड़  बिस्किट्स पैकेट्स। इस आंकड़े को लेकर एक अमेजिंग फैक्ट ये है कि अगर एक साल में बिकने वाली बिस्किट्स को एक लाइन में सजाएं तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुंचना 192 बार धरती के चक्कर लगाने के बराबर होगा।

इस बिस्किट्स की लोकप्रियता इतनी है कि Parle ब्रांड ही बिस्किट्स का पर्यायवाची बन गया है। कई होटल रेस्टुरेंट में इसके नाम पर इससे बने डेजर्ट मिलते हैं। हाल के लॉकडाउन में Parle G लोगों के लिए रोटी के बराबर बन गया था। भारत के गरीब से गरीब और अमीर से अमीर की पसंद Parle G की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यह स्वदेशी है। आज की परिस्थितियां ऐसे है जब देश में स्वदेशी कंपनियों की मांग बढ़ रही है। खासतौर पर चीन के साथ हाल के मामलात के बाद तो भारत में लोग अब भारतीय सामानों को खरीदने की ही कसम खा रहे हैं। लेकिन कई लोगों का मानना है कि ये पॉसिबल नहीं है, ऐसे लोगों को Parle G से सीखना चाहिए, जिसने अंग्रेजों के राज में उन्हीं की बड़ी बड़ी बिस्किट्स कंपनियों का मार्केट खत्म कर दिया था।

Indian

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

मेघालय के जयंतिया जनजाति का प्रकृति को समर्पित त्योहार बेदीनखलम, जानिए क्या है इस पर्व की खासियत

Sun Jun 28 , 2020
Share on Facebook Tweet it Pin it Email हमारा देश भारत, त्योहारों के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। यहां हर दिन, हर महीने कोई न कोई त्योहार किसी न किसी कोने में मनाया जाता है। इन त्योहारों के अपने एतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व हैं। भारत में कुछ त्योहार तो […]
बेदीनखलम त्योहार