Sunita Krishnan- सिर्फ एक नाम नहीं पूरी दास्तां

15 साल की मासूम, औऱ उसपर 8 दरिंदों का वार.. वो चीखती-चिल्लाती खुदकी इज्जत को बचाने की मिन्नतें मांग रही थी.. मगर ना तो किसी ने उसकी मदद की और ना ही उन 8 हैवानों में से किसी को भी उसपर दया आई.. सिर्फ 15 साल उम्र में 8 दरिंदो ने उसका सामूहिक बलात्कार किया.. और उसका कुसूर, बस इतना कि वो दलित कम्यूनिटी के लिए कैंपेन कर रही थी..

मगर इसके बाद क्या…??? समाज के ताने, घृणा भरी नजरें, ना सिर्फ शारीरिक बल्कि, मानसिक तौर पर टूट चुकी उस 15 साल की लड़की को और ज्यादा तोड़ने की पूरी कोशिश.. आपने सुना होगा कि, अगर एक औरत दुर्गा और सरस्वती सी सीधी है, तो इसके बिल्कुल उलट उसे काली बनने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगता। ऐसा ही कुछ सुनीता कृष्णन की साथ भी हुआ। इस घटना ने सुनीता को और भी ज्यादा मजबूत बना दिया था, इतना सब होने के बावजूद भी सुनीता ने ना तो हार मानी और न ही हिम्मत छोड़ी।

Sunita Krishnan के बचपन का दर्द जो जज़्बा बन गया

बेंगलूरू के पालक्कड़ मलयाली गांव में साल 1972 में जन्मी सुनीता कृष्णन ने बचपन में ही भारत का अधिकांश हिस्सा देख लिया था। क्योंकि उनके पिता सर्वेक्षण विभाग में काम करते थे। इस दौरान उन्होंने अनेकों मुसीबतें देखी, लेकिन जो मुसीबत उन्होंने पंद्रह साल की उमर में झेली उसने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी।

क्योंकि इसके बाद कृष्णन ने अपनी पूरी जिंदगी उन लोगों की जिंदगी संवारने में लगा दी जो किसी ना किसी तरह से इसका शिकार हुए हैं। इसी के चलते सुनीता ने प्रजज्वला नाम के एक एनजीओ की भी शुरूआत की और अब तक ये संस्था लगभग 22 हजार से ज्यादा लड़कियों, बच्चियों और महिलाओं को इस दलदल से निकाल चुकी है। यही नहीं ये संस्था उन लड़कियों, बच्चियों और महिलाओं को उस दलदल से निकालने के बाद, उन्हें वो जगह भी उपलब्ध कराती है। जहां वो अपनी जिंदगी आराम से गुजार सकें।

लेकिन वो कहते हैं ना, इस दलदल से निकालने के लिए अपनी जिंदगी हथेलियों पर लेकर चलनी पड़ती है या फिर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। शायद यही वजह है कि, अब तक सुनीता पर 18 बार जानलेवा हमला हो चुका है, साथ ही सुनीता को कई बार पीटा भी जा चुका है।

यहां तक की एक रेस्क्यू के दौरान सुनीता के अपना एक साथी खो दिया था। वहीं अब तक कई बार मार खाने की वजह से सुनीता दाएं कान से सुन भी नहीं सकती। लेकिन हौसला है, जज्बा है और शायद बचपन का वो गुस्सा है जो सुनीता को न थकने, ना हार मानने के लिए प्रेरित करता है। तभी तो सुनीता अब तक इतनी सारी महिलाओं बच्चियों की जिंदगी बचा सकी हैं।

Sunita Krishnan- जब तक सांसें हैं, दूसरों के लिए जीती रहूंगी।

सुनीता खुद कहती हैं कि, जब तक उनकी सांसें हैं तब तक वो दूसरी लड़कियों को यूं ही वेश्यालायों से बाहर निकलती रहेंगी। उन्हें के लिए काम करती रहेंगी। यहां तक की हमारे देश में भी पहचान किसी को उसके काम से नहीं टी.वी से मिलती है। क्योंकि अमिताभ बच्चन के मशहूर टी.वी शो कौन बनेगा करोड़पति में सुनीता आई थी। जिसके बाद लोगों ने उन्हें ढूंढना शुरू किया। हालांकि कहीं न कहीं ये दुर्भाग्य की बात है कि, आज सुनीता कृष्णन को अधिकतर लोग नहीं जानते, न ही पहचानते हैं।

वहीं सुनीता के काम को देखते हुए साल 2016 में भारत सरकार ने उन्हें भारत के चौथे सबसे बड़े पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया था। हां मगर ये सम्मान किस लिए?  क्या इसलिए कि सुनीता अपने बलबूते अब तक इतनी सारी औरतों और बच्चियों को बचा सकी हैं या फिर सरकार अपनी नाकामी छुपाती है।क्योंकि जो काम इस तरह बिना किसी मदद के एक सुनीता या फिर ऐसे न जानें कितने लोग कर सकते हैं तो हमारी सरकारें या फिर पूरा प्रशासन क्यों नहीं करता है। क्योंकि कहीं न कहीं नेताओं की भी इसमें मिली भगत होती है या सरकारें कभी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझती।

लेकिन हम सलाम करते हैं, सुनीता के जज्बे को, जो अपनी जिंदगी अपने लिए नहीं उन लोगों के लिए जीती हैं, जिनको इसकी जरूरत है।

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