दुर्गोत्सव- सांस्कृतिक विरासत के बीच, धर्म और उत्सव का संगम

पूरे देश में नवरात्रों के लिए अब गिनकर कुछ ही दिन बाकी हैं। जिसके बाद से देश में त्योहारों का दौर शुरू हो जाएगा, तो वहीं पश्चिम बंगाल भारतीय संस्कृति का एक अनोखा राज्य है। जो कि नवरात्रों के दिनों में पूरी तरह शक्तिमय हो जाएगा, और यही नहीं पूरा राज्य मां दुर्गा के जयकारों की लहरों में डूब जाएगा। यानि की आने वाले महज कुछ दिनों में ये पूरा शहर ‘सिटी ऑफ जॉय’ बन जाएगा। जिसकी तैयारियां बंगाल के सभी हिस्सों में पिछले काफी दिनों से देखने को भी मिल रही हैं।

ये हर कोई जानता है कि, बंगाली हिंदुओं के लिए दुर्गा पूजा और काली की आराधना से बड़ा कोई भी उत्सव नहीं है। यही वजह है कि, शायद हर इंसान या फिर देश-दुनिया से आने वाले लोग इन दिनों बंगाल जाना चाहते हैं। वहां के इस उत्सव को देखना चाहते हैं।

बंगाल का अनोखा उत्सव दुर्गोत्सव

जहां बंगाल के अलावा देश के कई राज्यों में नवरात्री की धूम देखने को मिलती है। तो वहीं दुर्गा के आगमन पर ढ़ोल की मधुर गूंज केवल बंगाल से ही उठती है। जहां सिंदूर की लाली देश के कई हिस्सों में दुर्गा देवी के चरणों में अर्पित की जाती है, तो वहीं इसी दौरान पूरा बंगाल ही लाल रंग से सराबोर हो जाता है। लेकिन क्या आपको मालूम है कि, आखिर बंगाल के लोगों के लिए ये त्यौहार इतना खास क्यों बन गया है?

दुर्गोत्सव- मां दूर्गा से बंगाल का खास रिश्ता

जिस तरह हमारी सांस्कृतिक विरासत में अनेकों ऐसे लोग पैदा हुए हैं, जिनको आज भी हम पढ़ते हैं। चाहे वो तुलसीदास हो या फिर कबीर दास, ठीक उसी तरह पंद्रहवीं सदी के एक सुप्रसिद्ध बांग्ला भक्तकवि थे, कृत्तिवास ओझा!

पढ़ने और सुनने में भले ही ये नाम अनसुना सा लगता हो, लेकिन ये बंगाल के वो कवि थे, जिन्हें तुलसीदास के स्वरुप ही दर्जा दिया गया है। इन्होंने ही वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में लिखी ‘रामायण’ का बांग्ला संस्करण “श्री राम पांचाली” अनुवादित किया था। यही नहीं संस्कृत को छोड़कर रामायण का ये किसी भी दूसरी भाषा में पहला अनुवाद था। वहीं हिंदी में रामचरित मानस का अनुवाद भी इसके डेढ़ सदी बाद किया गया था।

दुर्गोत्सव

तो वहीं कृत्तिवास की लिखी रामायण में मौलिक कल्पनाओं में राम को रावण से युद्ध करने से पहले, राम ने मां शक्ति की पूजा की थी। यही नहीं इस महाकाव्य में पहली बार शक्ति पूजा का विस्तार से वर्णन भी किया गया। जिसने पूरे बंगाल में नारी की छवि को अप्रीतम बना दिया। कृत्तिवास ने अपनी श्री राम पांचाली में लिखा कि, जब राम को महसूस हुआ की, उनकी ताकत रावण के सामने कम पड़ सकती है तब राम ने कहा था कि, हाय! उद्धार प्रिया (यानि की सीता) का हो न सका।

राम की इस करुण वेदना को समझते हुए जामवंत ने राम से कहा था कि, –

‘शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन!

छोड़ दो समर जब तक सिद्धि न हो, रघुनंदन!!

जिसका मतलब है कि, आप इस लड़ाई में इसलिए कमजोर पड़ रहे हैं क्योंकि उनके साथ केवल नैतिक बल ही है। लेकिन जीतने के लिए शक्ति का आह्वान जरूरी है। जिसका सीधा मतलब दुर्गा की नौ दिनों तक कठोर साधना से था।

यही नहीं, इस बात का जिक्र तुलसीदास द्वारा अनुवादित रामचरित मानस में भी मिलता है। हालांकि बंगाल में कृत्तिवास द्वारा अनुवादित ‘श्री राम पंचाली’ को सबसे बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया गया था, यही वजह रही कि, वहां के लोगों ने शक्ति पूजा को समय के साथ काफी बेहतर समझा और इसे काफी महत्व भी मिला।

1381 में जन्में बंगाल के कृत्तिवास ओझा अपने समय के एक दार्शनिक भी थे। जिन्होंने बंगाल के शाक्त संप्रदाय और वैष्णव संतों के बीच की दूरियां मिटाई। जिसके बाद इसी दौर में शुरू हुई दुर्गोत्सव की आराधना शताब्दियों से अब तक यूं ही चली आ रही है।

संस्कृति और पंरपरा के बीच में आधुनिकता का समागम

जिस समय उन्नीसवीं शताब्दी की शुरूआत हुई थी, उस समय में भी बंगाल में पहली लहर का उन्मेष हुआ था। जहां आधुनिकता के बीज अंकुरित हो रहे थे। जिसमें यहां की परंपराएं पूरी तरह से खाद का काम कर रही थी। यही वजह रही की आधुनिक होते हुए भी बंगाल ने अपनी परंपराओं का दामन नहीं छोड़ा था, जबकि वक्त के साथ-साथ ये और भी बेहतर होता चला गया।

ये हर कोई जानता है कि, जब भी देश में किसी सामाजिक सुधार, भारतीय समाज या फिर स्वराज्य आंदोलन की बात हुई है तो, इसमें कहीं न कहीं हमारी परंपराऐं काम आती रही हैं. चाहे बात बेड़ियों में लिपटी भारत की आजादी की हो या फिर वहां से आजादी की लौ जलाने की या महाराष्ट्र की, जहां लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव का पर्व मनाने की शुरूआत की थी। जिसके बाद आज गणेशोत्सव का दर्जा न जानें कहां पहुंच गया है। इसी तरह ही बीसवीं सदी में भारत के प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी चित्रकूट में रामायण मेले की शुरूआत की, जहां एक तरफ हमारे समाज ने आधुनिकता को स्वीकार किया है वहीं अपनी सांस्कृतिक स्मिता को भी बरकरार रखा है।

बंगाल में दुर्गा पूजा मनाने के पीछे छुपा है ये इतिहास

आपको बता दें कि, बंगाल में दुर्गा पूजा शुरू होने की कोई निश्चित तारीख नहीं है। हालांकि कुछ किताबों में इसका जिक्र 1790 में मिलता है। जिस समय कलकत्ता के पास हुगली के बाहर ब्राह्मणों ने मिलकर दुर्गा पूजा का सामूहिक अनुष्ठान किया था। इस दौरान उन्होंने दुर्गा मां की बहुत बड़ी प्रतिमा बनाई थी। तब से ये चलन गांव-गांव में फैल गया।

वहीं दुर्गा पूजा को सांस्कृतिक वैभव का पर्व बनाने का श्रेय बंगाल के ताहिरपुर के महाराजा कंस नारायण को दिया जाता है। जिन्होंने सबसे पहले इतिहास की सबसे बड़ी दुर्गा पूजा की थी। उस समय दुर्गा पूजा के आखिरी दिन महिषासुर वध के सूचक के तौर पर भैंसों की बलि दी जाती थी। हालांकि बाह्य राजवंश में जन्में शिवायन के प्रणेता मशहूर कवि रामकृष्ण राय ने बलि की परंपरा का पुरजोर विरोध किया था जिसके बाद से इसे धीरे-धीरे बंद कर दिया गया।

दुर्गोत्सव

वहीं 10 दिनों तक चलने वाली दुर्गा अराधना में विशेष कार्यक्रम की शुरूआत महाषष्ठी के दिन से होती है, जिसमें अलग तरह के ड्रम, जिसे ढाक कहा जाता है, उससे पूजा पंडाला गूंज उठता है। जिसके बाद क्रम से संधिपूजा, संधिकाल और भी कई तरह की आराधनाएं की जाती है। इन दिनों में जहां मंत्रों का उच्चारण होता है, तो वहीं भक्त भजन-गायन से देवी को प्रसन्न करते हैं।

वैसे तो दुर्गा पूजा भारत के हर कोने में अलग-अलग तरह से मनाया जाने वाला त्योहार हैं, मगर जिस तरह से बंगाल में मां दुर्गा के स्वागत के लिए लोग महीनों पहले ही तैयारियां शुरू कर देते हैं। जिस श्रद्धा-भावना के साथ बंगाल का हर शख्स मां दुर्गा की अराधना में लीन हो जाता हैं, शायद ही भारत के किसी और कोने में दुर्गोत्सव का ऐसा जश्न, ऐसा जुनून आपको देखने को मिलेगा।

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