शौक को सोच में बदल, बदल दी अष्टमुडी झील की काया- अपर्णा

जल प्रदूषण, आज सुनने में इतना आम शब्द बन गया है की लोगों ने शायद इसके बारे में सोचना ही बंद कर दिया है. क्योंकि लोगों को न तो इसकी परवाह है और न ही जल की कद्र…लेकिन बेंगलुरु में रहने वाली अपर्णा हम सभी से बिल्कुल अलग हैं. वो जल को प्रदूषित होने से बचा तो नहीं रही. उसके साथ वो उसे इतना खूबसूरत बना रही हैं की कोई भी इंसान दोबारा यहां गंदगी करने की सोचता ही नही और यही सोचकर आज अपर्णा कुछ ऐसा ही कर रही हैं, क्योंकि प्रदूषण चाहे पानी में हो या किसी जगह पर गंदा ही रहता है. शायद इसी को समझा है केरल की बेंगलुरु की रहने वाली अपर्णा ने…हालांकि न तो अपर्णा कोई जागरूकता का कैंपेन चला रही हैं न ही लोगों के पास जाकर समझा रही हैं. लेकिन फिर भी आज अपर्णा के चलते बेंगलुरु की अष्टमुडी कायल झील की खूबसूरती लोगों को एक बार फिर अपनी ओर आकर्षित कर रही है.

अपर्णा खुद बताती हैं कि, “मैं पुराने, बेकार गिलास, थर्माकोल और प्लास्टिक के थैलों को हर जगह से इकट्ठा करती हूं. रास्ते पर पड़ी बोतलों को मैं अपने घर ले आती हूं. मुझे हमेशा से पेंटिंग और ड्रॉइंग काफी पसंद रही है. जिसके चलते मैं इन सभी सामान का इस्तेमाल करती हूं और बोतलों पर पेंटिंग कर देती हूं. जिसके चलते झील की सुंदरता बढ़ रही है.”

पुरानी बोतलों से सजी अष्टमुडी झील

आज अपर्णा के इस शौक से न केवल बोतलों को नया आकार मिला है. बल्कि इससे झील को भी साफ करने में काफी हद तक मदद मिली है. इसी के चलते आज अपर्णा इन बोतलों को बेच भी रही हैं. अपर्णा खुद कहती हैं कि, “मैं अपने काम को लेकर काफी उत्साहित हूं और मुझे काफी सारे ऑर्डर रोज मिलने लगे हैं. मैं खुश हूं क्योंकि हर इंसान मेरे काम की तारीफ कर रहा है. साथ ही जो इंसान पहले बोतलों को यूं ही फेंक देते थे आज वो लोग इसे सही से रखने लगे हैं.”

आज अपने जज्बे के चलते अपर्णा के बहुत सारे लोग जुड़ चुके हैं और इसी अभियान के लिए अपर्णा ने अब तक ट्रक भर से ज्यादा बोतलों को इकट्ठा किया है. जो बोतलें पहले के समय में झील को गंदा करने का काम करती थी आज वही उसकी खूबसूरती की वजह बन रही हैं.

हाथों की कला ने बोतल में भरे रंगे- अपर्णा

अपर्णा कहती हैं कि, “हम अक्सर दुकान से हस्तशिल्प खरीदने में मोटी रकम खर्च करते हैं. इसके बजाय हम ऐसे बेकार सामान को उपयोग में ला सकते हैं. पहले जब मैं सड़क से कचरा उठाती थी तो लोग मेरा मजाक उड़ाते थे, लेकिन अब ये स्थिति बदल गई है और वही लोग मेरी तारीफ करते हैं.”

कहते हैं न चीज की शुरुवात से लेकर उसको आगे बढ़ाना खुद सीखना होता है उसके बाद खुद लोग आपसे सीखने आते हैं. जाहिर है जिस तरह अपर्णा आज के वक्त में झील की काया बदल रही हैं. ठीक उसी तरह हमें भी अपने आस पास की स्वच्छता को लेकर जागरूक होने की जरूरत है. ताकि हम अपने पर्यावरण को बेहतर बना सकें.

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