विद्यारंभ त्योहार : बच्चों के अंदर शिक्षा के लिए इंट्रेस्ट जगाने का त्योहार

हिन्दू मान्यता के अनुसार वसंत महीने का पांचवा दिन यानि की वसंत पंचमी शिक्षा से जुड़ा हुआ दिन है। पौराणिक कहानियां बताती हैं कि, इसी दिन को संसार का निमार्ण पूरी तरह से संपन्न हो सका था। क्योंकि कला और विद्या की देवी सरस्वती इसी दिन प्रकट हुई थीं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार बिना कला और शिक्षा के दुनिया अधूरी थी…. लेकिन सरस्वती के आगमन के बाद दुनिया धीरे-धीरे भरती चली गई, यानि हमारी सभ्यता और संस्कृति में शिक्षा यानि एजूकेशन को सबसे बड़ी चीज माना गया है। यह माना गया है कि शिक्षा यानि ज्ञान वह प्रकाश है, जो दुनिया और एक इंसान की जिंदगी में छाए अंधकार को दूर करता है। बिना शिक्षा के इंसान को असभ्य या पशु की श्रेणी में ही माना गया है। वहीं हमारी सभ्यता में यह भी परंपरा रही है कि पीढ़ी दर पीढ़ी शिक्षा का प्रचार प्रसार किया जाता रहा है।

पीढ़ी दर पीढ़ी एजूकेशन ट्रांसफर का यह काम एक संस्कार के रुप में होता है, और यह संस्कार आज भी दक्षिण भारत यानि की साउथ इंडिया में एक पर्व के रूप में मनाया जाता है। जब वसंत पंचमी के दिन उत्तरी और पूर्वी भारत में सरस्वती पूजा का त्योहार मनाया जाता है तब दक्षिण में विद्यारंभ पर्व मनाया जाता है। यह पर्व बच्चों में शिक्षा के प्रति रुची यानि इंट्रेस्ट जगाने का पर्व है। यह हिन्दू मान्यताओं में बताए गए एक संस्कार का हिस्सा है, जिसमें बच्चे की शिक्षा का आरंभ उसके घर से ही होता है। इस दिन बुद्धि के देवता मानें जाने वाले भगवान गणेश और विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा से बच्चों को आर्शिवाद दिलाकर उसके कदम एजूकेशन की ओर बढ़ाए जाते हैं।  

विद्यारंभ पर्व क्यों और कैसे मनाया जाता है?

विद्यारंभ त्योहार

हमारी सभ्यता में इस बात को माना गया है कि यह हर अभिभावक का काम है कि, वो अपने बच्चे को जन्म देने के साथ ही उसके संग आई सारी जिम्मेदारियां जैसे कि भोजन, कपड़ा और अन्य शारीरिक जरूरतों को पूरा करें। इतना कुछ होने पर यह उस अभिभावक की जिम्मेदारी है कि वह उसके शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध करें। हमारी संस्कृति में इस बात को साफ किया गया है कि कोई भी मां-बाप अपने इन दायित्वों से मुंह नहीं मोड़ सकता। अगर कोई मां-बाप ऐसा करते हैं तो उन्हें उसी अपराधी के जैसा माना जाता है, जिसने अपने बच्चे को भूखे रख कर मार दिया हो। यानि यह बात साफ है कि बच्चों की पैदाइस तभी सुनिश्चित होनी चाहिए, जब उसकी जिम्मेदारी उठाई जा सके और खास तौर पर शिक्षा की जिम्मेदारी। यह भी कहा गया है कि अगर मां-बाप इस अपराध से बचना चाहते हैं तो वे अपने बच्चों को फिर चाहे लड़का हो या लड़की दोनों को समान रुप से उनका विद्यारम्भ संस्कार कराएं यानि उन्हें शिक्षा के मार्ग पर डालें।

विद्यारम्भ संस्कार वो विधि है, जिससे बच्चों में शिक्षा का बीज डाला जाता है। यानि यह शिक्षा को एक मूल रुप में बच्चें में डालने का तरीका है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि वे जो ज्ञान लें वो सिर्फ नाम मात्र का न रहे बल्कि वह आगे उसके जीवन निमार्ण में सहयोगी बन सके। यानि हमारी सभ्यता बच्चों को लीट्रेट करने से ज्यादा उन्हें एजूकेटेट बनाने पर जोर देती रही है।


विद्यारम्भ त्योहार कैसे होता है :— विद्यारम्भ संस्कार के लिए सामान्य तैयारी के अलावा पूजा की थोड़ी विशेष तैयारी भी होती है। इसके लिए गणेशजी एवं माँ सरस्वती के चित्र या प्रतिमाएं रखी जाती हैं। वहीं किताब कॉपी या पट्टी, दवात और लेखनी भी पूजा भी इसमें शामिल है। बच्चे को लिखने में सुविधा हो, इसके लिए स्लेट, खड़िया भी रखी जा सकती है। गुरु पूजन के लिए प्रतीक रूप में नारियल रखा जा सकता है। अगर बच्चों के कोई टीचर वहां मौजूद हैं तो उनका पूजन भी कराया जाता है।

इस दौरान गणेश और सरस्वती की पूजा होती है। गणेश को विद्या और सरस्वती को शिक्षा का प्रतीक माना गया है। विद्या और शिक्षा एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरी अधूरी है। शिक्षा उसे कहते हैं, जो स्कूलों में पढ़ाई जाती है। जैसे भाषा, लिपि, गणित, इतिहास, शिल्प, रसायन, चिकित्सा, कला, विज्ञान आदि। इससे हमारे दिमाग की क्षमता बढ़ती है और हम संसारिक चीजों धन-सम्पत्ती, सुख-सुविधाओं का लाभ लेते हैं। इसी को सरस्वती आराधना कहते हैं। विद्या के प्रतिनिधि गणेश जी हैं। विद्या का अर्थ है विवेक एवं सद्भाव की शक्ति से। इससे हमारे अंदर सही—गलत, कर्त्तव्य और अकत्तर्व्य को जानने और समझाने की बुद्धि आती है। यहां एक बात याद रखनी होगी कि हमारी सभ्यता में गणेश का स्थान पहला है बाद में कोई और देवी-देवता आते हैं। मतलब बुद्धि का महत्व पहले है। यानि हमारा फोकस बच्चों को एजूकेट करने पर होना चाहिए न कि सिर्फ उन्हें लीट्रेट बनाने में।

इन्हीं बातों को बच्चों के अंदर डालने के लिए यह पर्व मनाया जाता है। बच्चे विद्यारम्भ के समय गणेश पूजन करते हैं। वहीं मां का प्रेम जैसे बच्चों के लिए पूरी जिंदगी जरूरी होता है, उसी मां सरस्वती का आर्शिवाद भी है। इसलिए उनकी उपासना होती है। ऐसा माना जाता है कि सरस्वती की अराधना पढ़ाई के जरिए ही हो सकती है। इसलिए इस दिन बच्चों को बताया जाता है कि पूजा-पाठ, खाना-पीना, नहाना-सोना ओर अन्य कामों की तरह ही पढ़ना हमारे रोज के जीवन का एक जरूरी काम होना चाहिए।

इस दिन पूजन की विविधां होती हैं, जिसमें कॉपी-किताब की पूजा, कलम की पूजा, गुरू की पूजा और लेखनी पूजा होती है। इसी दिन पहली बार बच्चों को लिखना सिखाया जाता है। यह परंपरा सच में अदभुत है, जो पीढ़ीयों से हमारे समाज को मजूबत बनाए हुए है। बड़ी बात यह है कि कई बार हमारी इस सभ्यता को खत्म करने की कोशिश हुई लेकिन आज भी भारतीयता की यह पहचान जीवित है।

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