वसंत पंचमी : सिर्फ पूजा नहीं, विद्या के महत्व को समझने का दिन

भारतीय संस्कृति जो प्रकृति से जुड़ी हुई है…. इसके मूल में प्रकृति और इंसान के बीच का प्रेम है। प्रकृति के रंग से ही इंसान का संसार खिलता है। ऐसे में वसंत ऋतु वह मौसम होता है, जब प्रकृति खिलती है और यह मौसम इंसानों के जीवन में भी रंग भर देता है। वसंत ऋतु के कई संदेश हैं…. एक तो मौसम में परिवर्तन की बात कहता है, दूसरा यह है कि यह इंसानों के जीवन से जुड़ा हुआ संदेश लेकर आता है…. जैसे दुख के बाद सुख का संदेश हो गया। वसंत को ज्ञान, विज्ञान और म्यूजिक वाला मौसम भी माना जाता है और यही कारण है कि इस मौसम में विद्या की देवी सरस्वती की पूजा होती है। सिर्फ भारतीय संस्कृति ही ऐसी संस्कृति हैं जहां ज्ञान यानि नॉलेज को सबसे ऊपर माना गया है। वसंत को ज्ञान का मौसम इसलिए कहा जाता है, क्योंकि नॉलेज इंसान की जिंदगी में अज्ञान के अंधेरे को दूर करता है और इसके आने से इंसान की जिंदगी में एक प्रकाश आता है जो उसे सुख देती है। यह ठीक वसंत के मौसम की तरह….। यह मौसम संदेश देता है कि विद्या से ही हमारी लाइफ बेहतर हो सकती है।

संस्कृत में एक श्लोक है :

विद्यां ददाति विनयं,
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति,
धनात् धर्मं ततः सुखम्॥

इस श्लोक का मतलब है कि — नॉलेज से ही इंसान के अंदर हंबलनेस आती है…. यहीं हंबलनेस उसे किसी काम को करने के काबिल बनाता है और जब इंसान किसी काम को करने के काबिल बन जाता है तो धन कमाने लगता है और जब इंसान के पास पैसा होता है तो वो धर्म स्थापित करता है और इसी धर्म से वो खुद के लिए और दूसरों के लिए सुख के दिन लेकर आता है। यानि अगर कोई इंसान चाहता है कि वो सुखी हो, उसके सारे काम बन जाएं…. गरीबी दूर हो…. कोई प्रॉब्लम लाइफ में नहीं हो… तो उसे सबसे पहले खुद को एजुकेट करना होगा। यह बात हम आजकल हर सर्वे की रिपोर्ट में पाते हैं…. जहां किसी भी प्रॉब्लम के पीछे का मुख्य कारण ऐजुकेशन की कमी ही मानी जाती है….।  

वसंत पंचमी धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कहानियां

वसंत पंचमी,सरस्वती पूजा

वसंत पंचमी के मौसम को नएपन के रूप में देखा जाता है…. जब प्रकृति में सब कुछ नया—नया होता है तो इंसान का चित अंदर से प्रसन्न होता है। इस बात को हम और आप अपने रोजमर्रा की जिंदगी से भी जोड़कर समझ सकते हैं। जैसे हमे नया कपड़ा पहनना पसंद है….उसकी बात ही अलग है…, अगर आपने कभी गौर नहीं किया तो इस चीज को आगे से एक बार गौर करके देखिएगा कि जिस दिन आपने नए कपड़े पहने होते हैं उस दिन आपके शरीर के अंदर और मन के भाव में क्या बदलाव आते हैं। इसके अलावा एक और एग्जांपल ले सकते हैं। जैसे ठंड के दिनो में बहुत दिन तक नहीं नहाएं हो और रजाई में दुबके—दुबके मन मन बोरिया गया हो….इसके बाद अचानक से मिले गरम पानी से नहा कर जब आप लौटते हैं तो, मूड एकदम फ्रेश सा लगता है और ठंड भी आपके अंदर की उर्जा के सामने बेअसर हो जाती है। वसंत का मौसम ठीक वैसा ही है।

वसंत को लेकर जो पौराणिक मान्याताएं है कि, वो ऐसा ही संकेत देते हैं कि यह ऋतु नए पन से लबरेज होने का है। पहली कहानी सृष्टि के बनने से जुड़ी हुई है। कहते हैं कि जब ब्रह्मा ने सृष्टी की रचना की तो उसमें सबकुछ था…. लेकिन फिर भी एक चीज की कमी थी…. एक बोरियत थी….इस बोरपन को दूर करने के लिए ब्रह्मा ने कमंडल से जल लेकर छिड़का और सरस्वती प्रकट हुई। सरस्वती ने जब वीणा बजाई तो दुनिया पूर्ण हुई। यह वीणा ठंड के मौसम में उसी गर्म पानी की तरह है, जिससे आपकी सारी बोरियत दूर हो जाती है। सरस्वती ने ब्रह्मा के साथ सृष्टी रचना में मदद की इसलिए सरस्वती पूजा आज के दिन होती है।

दूसरी कहानी के अनुसार आज ही के दिन कामदेव की है। असल में ये दिन श्रृंगार रस से जुड़ा हुआ है जो प्रेम का प्रतीक का भी है। लोककथा कहती है कि कामदेव की पत्नी रति ने कठोर तप करके पति को वापस पाया था, जो भगवान शिव ने क्रोध के कारण भस्म हो गए थे। ऐसे में यह दिन रति और कामदेव के प्रेम की निशानी है और इस दिन को हम इंडियान कल्चर का वेलेंटाइन डे भी कह सकते हैं।

इन सभी पौराणिक कहानियों में एक चीज कॉमन है और वो है एक नयेपन का एहसास। इस तरह ये कहानियां (जिन्हें हिन्दू मान्यताओं में इतिहास माना गया है) वसंत को सभी तरह के गुणों से सम्पूर्ण मौसम का काल बताती हैं।

मुस्लिमों में वसंत पंचमी का महत्व  

वसंत पंचमी,सरस्वती पूजा

भारत के कल्चर को मुख्य रूप से हिन्दू धर्म से जोड़ कर देखा जाता है। ऐसे में कई बार सेकुलरिज्म के पैरोकार वसंत पंचमी या सरस्वती पूजा का विरोध भी करते हैं। जैसा की पिछले कुछ सालों में देखने को मिला भी। लेकिन क्या सच में वसंत पंचमी सिर्फ हिन्दुओं से जुड़ा है? जवाब है नहीं…. भारत में मुसलमान भी इस दिन को बड़ी धूम—धाम से मनाते हैं और वो भी हिन्दुओं की तरह पीले कपड़े पहनकर। इस दिन को आप दिल्ली स्थित निजामुद्दीन औलिया के दरगाह में पहुंच जाइए आपको वसंत पंचमी का एक अलग ही रंग देखने को मिलेगा। यहां वसंत पंचमी के त्योहार को मनाने को लेकर एक कहानी है।

कहते हैं कि तकीउद्दीन नूह, निजामुद्दीन औलिया का भांजा था। निजामुद्दीन अपने भांजे से बहुत प्यार करते थे। लेकिन भीषण बीमारी के चलते वह मर गया। उसकी मौत के बाद निजामुद्दीन पागल से हो गए….उस दौरान अमीर खुसरो ने उन्हें फिर से ठीक करने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन सब बेकार हुए। वहीं एक दिन खुसरो ने कुछ औरतों को पीले रंग की साड़ी में पीले फूलों के साथ बसंत पंचमी का त्योहार मनाते हुए देखा। खुसरो ने देखा कि वे सभी औरतें काफी खुश थीं।

फिर खुसरो ने भी निज़ामुद्दीन को खुश करने के लिए पीले रंग का घाघरा पहना और गले में दुपट्टा पहन लिया। इतना ही नहीं उन्होंने ढोलक भी ले रखा था और बसंत के गाने गाने लगे। खुसरो को जनानी के वेष में देखकर निजामुद्दीन के सारे दुख-दर्द दूर हो गए और वो ठहाके लगाकर हंसने लगे। निजामुद्दीन की उसी खुशी को याद करते हुए हर साल उनकी दरगाह पर बसंत पंचमी का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। मुस्लिम समुदाय के लोग बसंत पंचमी पर निजामुद्दीन और अमीर खुसरो की दरगाह पर पीले फूलों की चादर चढ़ाते हैं। इतना ही नहीं सूफी प्रेमी लोग इनकी दरगाह पर बैठकर वसंती गाने भी गाते हैं।

यानि धर्म कोई भी हो यह त्योहार कला और ज्ञान से जुड़ा हुआ है जिसका एक ही संदेश है और वो हैं प्रेम का। शायद इसलिए कबीर ने सिर्फ किताबी पढ़ाई को नकारते हुए कहा –

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

विद्यार्थियों के लिए बेहद वसंत पंचमी

हम जो भी त्योहार मनाते हैं उसका एक खास महत्व होता है… यह परंपरा आज भी दुनिया में जारी है। सरस्वती पूजा भी खास तौर एक महत्व रखती है। यह दिन विद्यार्थियों के लिया यानि स्टूडेंट्स के लिए खास है। असल में अगर हम इस दिन को एक धर्म से न जोड़कर अगर पूरे विश्व से जोड़ें तो यह दिन एक तरह से ऐजुकेशन डे या स्टूडेंन्ट डे की तरह है। जिसका एक मकसद है और वो है लोगों के बीच नॉलेज और ऐजुकेशन को लेकर अवेयरनेस लाना। आज भी स्टूडेंटस के लिए यह दिन काफी महत्व रखता है। असल में सरस्वती कोई देवी का रूप नही….यह तो वो शक्ति है, जिसमें इंसान को हर तरह से काबिल बनाने की क्षमता है। लेकिन विद्या की प्राप्ती इतनी आसान नहीं…. आइए कुछ संस्कृत श्लोकों के जरिए विद्या और सरस्वती के महत्व को समझते हैं।

चोरहार्यं न च राजहार्यंन भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥

भावार्थ- न कोई चोर चुरा सकता है, न कोई राजा आपसे इसे छीन सकता है, न भाई इसे आपस में बांट सकते हैं…. इसे जितना खर्च करोंगे यह उतना बढ़ेगा …. यह विद्या है जो हर धन में सबसे श्रेष्ठ धन है।

अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतः सुखम् ॥

भावार्थ- आलसी इन्सान को विद्या नहीं मिलती, जिसके पास विद्या नही है, उसके पास धन नहीं है और बिना धन वाले का इस जगत में कोई दोस्त नहीं होता और बिना दोस्त के इंसान को कभी सुख नही मिलता।


रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥

भावार्थ- भले ही कोई इंसान रुप, रंग आकार में सबसे शानदार हो और वो किसी बड़े कुल में पैदा भी क्यों न हुआ हो ….. लेकिन अगर उसके पास विद्या नही है…. यानि अगर वो एजुकेटेड नही है तो केसुडे के फूलों की तरह है जिसका कोई महत्व नही है। 

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