‘लोसर फैस्टिवल’:- सिर्फ तिब्बती न्यू ईयर नही, भारतीयता से जुड़ा प्रमुख त्योहार भी है।

हमारे देश में नए साल के शुरू होते ही इसके स्वागत के लिए कई त्योहार मनाए जाते हैं। बैसाखी, गुड़ी पड़वा, पोंगल इसके कई उदाहरण हैं। लेकिन इसी बीच एक और त्योहार है जो अपने रंग, रुप और कला से भारतीय संस्कृति को कई सालों से समृद्ध करती हुई आ रही है। इस अनोखे फेस्टिवल को ‘लोसर’ कहा जाता है। वैसे तो लोसर तिब्बती न्यू ईयर के रुप में मनाया जाता है और इसका मतलब तिब्ब्ती भाषा में नया साल ही होता है। लेकिन यह त्योहार भारत के भी कई हिस्सों में मनाया जाता है। भारत के वो इलाके जहां तिब्बती ट्राइब के लोग रहते हैं वहां इस त्योहार को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इसमें बहुत कुछ ऐसे रंग देखने को मिलते हैं तो भारत के अन्य त्योहारों से बिल्कुल अलग ही है। वैसे तो यह पर्व 15 दिनों तक मनाया जाता है लेकिन इसमें शुरू के तीन दिनों को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।

‘Losar’ तिब्ब्ती बौद्ध धर्म से पहले का कल्चर

लोसर त्योहार की शुरूआत तिब्बती लूनरसोलर कैलेंडर के हिसाब से साल के पहले दिन को हो जाती है। यह दिन अंग्रेजी ग्रोग्रियन कलैंडर के हिसाब से फरवरी या मार्च के महीने में पड़ता है। इस साल यह त्योहार 24 फरवरी से शुरू हो रहा है। बात भारत की करें तो हमारे देश में यह त्योहार लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में मनाया जाता है। यह त्योहार इन जगहों पर रहने वाली तिब्बती और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के लिए नए साल की शुरूआत है। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर, लाहौल, स्पीति और कांगड़ा में इस त्योहार की धूम दिखती है। वहीं अरुणाचल प्रदेश में मोनपा जनजातियों द्वारा तवांग, मेम्बा और मेचुखा घाटी में इसे मनाया जाता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले योलमो, शेरपा, तमांग, गुरुंग और भूटिया समुदाय भी लोसार के उत्सव में भाग लेते हैं।

Losar Festival

दस से पंद्रह दिनों तक चलने वाले इस फैस्टिवल की शुरूआत घरो और मंदिरों में रोशनी के साथ होती है। चारों ओर रोशनी से पूरा लद्दाख समेत देश का हर वो हिस्सा जगमगा उठता है जहां तिब्बती लोग रहते हैं। पुरानी परंपराओं की मानें तो इस दिन परिवार के लोग अपने घरों के मृत लोगों के कब्र पर जाते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्राथना करते हैं। वहीं तीसरे दिन चांद देखने का इतंजार होता है। इस त्योहार के पहले तीन दिन सबसे खास होते हैं :—

पहला दिन :— त्योहार के पहले दिन को पिछले वर्ष की हर तरह की बुराइयों और बुरी आत्माओं को दूर करने के लिए घरों की अच्छी तरह से लोग साफ—सफाई करते हैं। इस दिन को ‘गुटुक’ नाम का एक अनोखा व्यंजन बनाया जाता है। वहीं विशेष आटे के गोले बनाए जाते हैं जिनमें विभिन्न सामग्रियों को भरा जाता है। आटे के गोले को खाते समय जिस व्यक्ति के खाने में जो सामग्री निकलती है वो उस आदमी के चरित्र के विशिष्ट लक्षणों के रुप में देखा जाता है। ऐसा सिर्फ हंसी मजाक के तौर पर लोग आपस में करते हैं।

दूसरा दिन : दूसरे दिन लोग स्थानीय ‘मठों’ पर पहुंचते हैं और अपना ट्रिब्यूट देते हैं। मठो पर जाने से पहले बाजारों, सड़कों और गलियों से लोग एक जुलूस निकालते हैं जिसमें वे अपने माथे पर ‘मेथी’ नाम की एक चीज ढ़ोते हैं। इस दौरान लोग ज्वलंत मशालें लेकर नारे लगाते हुए मठों की ओर जाते हैं। कहा जाता है कि, यह जुलूस शहर से बुरी आत्माओं या शक्तियों की विदाई के लिए निकाली जाती है। इस दिन लोग मठो पर दुआ मांगते हैं और अपनी इच्छा अनुसार मठो के भिक्षुओं को उपहार भेंट करते हैं।

तीसरा दिन :— यह दिन लोसार महोत्सव के मुख्य समारोहों का अंतिम दिन होता है। इस दिन लोग एक री-यूनियन भोज का आयोजन करते है, वो आपस में मिलते हैं और एक खास तरह का केक जिसे काप्स कहते है, उसका सेवन चांग नामक एक मादक पेय, जिसे गर्म रखने के लिए सेवन करते हैं।

इस त्योहार का सबसे मुख्य आकर्षण होते हैं पारंपरिक डांस, जो लोग इस दौरान करते हैं। इसमें डांस करने वाले लोग कुछ खास किस्म के रंगीन और चमकीले कपड़े पहनते हैं और अपने चेहरे पर दानव या किसी पशु का मुखौटा पहनते है। यह डांस दुनियाभर के लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनते हैं।

Losar Festival का इतिहास

लोसर फैस्टिवल के इतिहास की बात करें तो आज भले ही यह तिब्बती बौद्ध धर्म का त्योहार लगता है लेकिन तिब्बती इलाके में इस त्योहार का इतिहास बुद्धिज्म़ के आने से पहले का है। इतिहास पर अगर गौर करें तो लोसर फैस्टिवल की जड़े हमें यहां के पुराने बॉर्न धर्म से जुड़ी हुई मिलती हैं, जिसमें ठंड के दिनों में धूप जलाने का रिवाज हुआ करता था। बताया जाता है कि, नौवें तिब्बती राजा, पुड गुंग्याल के शासनकाल के दौरान इसी रिवाज़ को वार्षिक त्यौहार बनाने के लिए इसे एक फसल त्योहार के साथ मिला दिया गया।

बैशाखी, पोंगल आदि की तरह ही लोसर में भी फसल के लिए आभार व्यक्त किया जाता है। लोसार का बाद में तिब्बत में आई बौद्ध परंपरा की ओर झुकाव हो गया। ऐसा माना जाता है कि, पुड गुंग्याल के शासनकाल के दौरान बेल्मा नाम की एक बूढ़ी औरत हुआ करती थी, जो लोगों को चंद्रमा के आधार पर समय की गणना करना सिखाती थी। उस विश्वास के साथ, कुछ स्थानीय लोग लोसार को बाल ग्याल लो के रूप में संदर्भित करते हैं। लोसार को मनाने की तिथि हर साल बदलती है और कभी कभी सेम डेट को भी पड़ जाती है।

Losar Festival

भारत की सभ्यता की पहचान है

लोसर वैसे तो मुख्य रुप से तिब्ब्ती न्यू ईयर का त्योहार है, लेकिन इस त्योहार को लद्दाख के बौद्ध लोगो सहित देश के कई हिस्सो में रहने वाले भारतीय और तिब्बती लोग मनाते हैं। वक्त के साथ इस त्योहार ने भारत की सभ्यता को इस तरह से जोड़ लिया है कि, इस त्योहार के तीन मुख्य दिनों पर भारत के तीन मुख्य त्योहारों की एक छटा देखने को मिलती है। बता दें कि, लोसर एक ऐसा त्योहार है। संस्कृति और परंपराओं के प्रतीक इस लोक पर्व पर होली व दीपावली और दशहरा एक साथ मानते हुए आप देख सकते हैं। ऋतुराज बंसत के दौरान लोसर पर्व हिन्दु पंचाग के अनुसार फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की मध्य रात्री से प्रारंभ होता है। देश के कई हिस्सों में इस दौरान इस बौद्ध परंपरा का एक अनूठा संगम हिन्दु रीति रिवाजों के संग देखने को मिलता है।

हिमाचल के कुछ इलाकों में आपको इस त्योहार का हिन्दु रुपांतरण भी देखने को मिलेगा। तीन दिनों के इस त्योहार में लोग बौद्ध पंचाग के अनुसार अपना घर सजाते हैं। पहले दिन ये लोग लोकगीत गाते हुए पारंपरिक परिधानों के साथ अपने ईष्ट देव के मंदिर में पहुंचते हैं। इस दिन को दीपावली जैसा माहौल होता है। दुख, रोग एवं अशांति को नष्ट करने के लिए लोग एक जगह पर इकट्ठा होकर छिलके जलाते हैं और इसकी मशाल को नदी में विसर्जित कर संपन्नता के रूप में नदी से पत्थर घर ले जाते है। अगले दूसरे दिन दशहरा के तौर पर मनाया जाता है। इसमें गंगाजल से आटा गूंथकर गणेश की प्रतिमा बनाई जाती है और मूर्ति को छंग, चावल व आटे का भोग लगाया जाता है। त्यौहार के अंतिम दिन आटे की होली खेली जाती है और इसके लिये धान्य की कामना की जाती है। इस दिन लोग धार्मिक आस्था के प्रतीक पुराने झंडो को जमीन में गाड़कर नये झंडे फहराते हैं और लम्बी उम्र और समृद्धि की कामना करते हैं।

आमतौर पर लोसर को जानने वाले इसके बारे में यह ही कहेंगे कि, यह तो तिब्बती न्यू ईयर का त्योहार है। लेकिन असल में यह त्योहार सिर्फ तिब्बत से नहीं जुड़ा। यह त्योहार भारत के बड़े हिस्सों में मनाया जाता है और एक तरह से भारत के एक बड़े वर्ग का मुख्य त्योहार है। ऐसे में लोसर फैस्टिवल भारतीय सभ्यता की विराट विभिन्नता का ही अंग है।

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