रीति रिवाज़ों के दलदल में, बार-बार महिलाऐं क्यों फंसती हैं…?

रीति रिवाज, पंरपरा, किस्सा, कहानी और न जानें कितना कुछ….शायद हमारा भारत ही एक ऐसा देश है जो आज भी आस्थाओं से लेकर रीति रिवाज़ों और परंपराओं के बंधन में इस तरह घिरा हुआ है कि मानों यही सब कुछ है….तभी तो हमारी मां समान नदियां, किसी गंदे नाले जैसी दिखाई देती हैं. समाज में महिलाओं को देवियों का रूप मानने वाले इंसान उन्हीं को डायन से लेकर ना जानें क्या कुछ कहकर महिलाओं के अस्तित्व तक पर खतरा पैदा कर देते हैं. यहां तक तो हमारे समाज में आज घरों से बाहर खेलती छोटी बच्चियां भी खतरें से बाहर नहीं हैं.

खैर हम आपको ज्ञान की बातें नहीं बता रहे, हम आपको बता रहे हैं….एक ऐसी ही भारतीय रीति के बारें में जोकि पिछले काफी दशकों यूं ही चली आ रही है. आप सबने पीरियड्स यानि की मासिक धर्म के बारे में कहीं न कहीं जरूर सुना होगा. वो रोग जिससे हर महीने हर वयस्क महिला और लड़की पीडित होती है. यही वजह है की पीरियड्स को लोगों ने हमारे समाज में एक ऐसी बिमारी मान ली है कि, इससे ग्रसित होने पर लोग महिलाओं बच्चियों को घरों के बाहर रहने से लेकर सब कुछ छूने तक पर मनाही कर देते हैं.

पीरियड्स (Periods) के दौरान असम की अनोखी कुरीति

कुछ इसी तरह का रीति रिवाज असम में भी है. जोकि पिछले काफी समय से चला आ रहा है. बोगांइगांव जिले में सोलमारी गांव की लडकियों को जब पहली बार पीरियड्स आते हैं… तो उन्हें यहां लोगों की बनाई प्रथा के हिसाब से केले के पेड़ से शादी करनी पड़ती है और इस प्रथा को वहां तोलिनी ब्याह कहा जाता है. पिछले सौ सालों से ज्यादा समय से चली आ रही इस प्रथा में केले के पेड़ से शादी कराने के बाद लोगों द्वारा ये मान लिया जाता है की उनकी पहली शादी हो चुकी है. 

यही नहीं, आपको ये भी जानकर हैरानी होगी कि, जिस तरह एक आम शादी में पूरी खुशी के साथ लोग बाराती बनकर आते हैं और दुल्हन को विदा कर लेके जाते हैं…ठीक उसी तरह का माहौल यहां भी देखने को मिलता है. इस दौरान भी लोग खुशी के साथ संगीत करते हैं.

गांव के लोग बनकर आते हैं बाराती

उस छोटी से बच्ची को दुल्हन की तरह सजाया जाता है. उसके बाद केले के पेड़ से शादी रचा दी जाती है और बाराती के तर्ज पर आते हैं गांव के ही सभी लोग जिन्हें लड़की के घर वाले की तरह से न्यौता दिया जाता है. तीन से चार दिन तक इसकी तैयारियां की जाती है और इस पूरे समारोह के निपटने तक लड़की को सूरज की रोशनी से बचाकर रखा जाता है और पीरियड्स के चार दिनों तक लड़की को खाने में सिर्फ फल और कच्चा दूध ही दिया जाता है और आखिर में दुल्हन को जोड़े में गहनों से सजाकर उस लड़की को केले के पेड़ के साथ मंगल फेरे करा दिए जाते हैं और गांव वाले अपने घर चले जाते हैं…

लड़की की पहली शादी हो जाती है…सुनने में कितना फिल्मी क्यों न लग रहा हो, लेकिन हकीकत यही है की आज भी हमारा भारत रीति रिवाजों और परंपराओं की उस जंजीर में तमाम ऐसे ही जंजालों से घिरा हुआ है. जहां महिलाओं को देवी तो कह दिया जाता है. लेकिन पीरियड्स के दौरान उन्हें उसी तरह दुत्कार दिया जाता है. भले ही इस प्रथा में बाद में लड़की की दूसरी शादी लड़के के साथ कर दी जाती हो…लेकिन इस तरह किसी लड़की को मानसिक और शारीरिक रूप से मानसिक तौर पर टार्चर करना और उसके पीरियड्स को हउ्वा बना देने में परंपरा, रीति रिवाजों के नाम पर ढोल पीटना शायद हमारे समाज में पलती कुरीतियों का असल आईना है. जहां एक तरह हमारे घरों में पीरियड्स का नाम ले लेने पर घर में सबकी सांस फूल जाती है…वहीं छोटी से बच्ची की केले के पेड़ के साथ शादी कर देना कहां की मानसिकता है. अब फैसला आपके ऊपर है आप इसके बारें में क्या सोचते हैं. क्या आप भी उन्हीं में से एक हैं या फिर अलग..?

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