मैं न तो गम बाँट सकता हूँ… न दर्द समझ सकता हूँ

मैं न तो गम बाँट सकता हूँ,

न दर्द समझ सकता हूँ…

न जानें क्या हो गया है, इस मुल्क को

अब तो दोष भी मज़हब देखकर मढ़ते हैं.

क्योकिं कभी वो हत्यारा मज़हबी किताब का होता है

तो कभी वो हत्यारा हिंदू समुदाय का होता है

मगर इन सबके बीच मरती एक लड़की है

या, बस इंसानियत, न जानें क्या…

अब तक मैं समझ नहीं पाया,

कोई समझे तो आकर बता देना

क्या पता मुझको भी मालूम हो जाए

मैं भी समझ जाऊं की इन सबको आखिर पनाह कौन देता है.

कोई खुलकर नहीं कहता कि हाँ यही वो इंसान है…

“जिसने एक लड़की से उसकी आबरू छीन ली, एक माँ के आँचल से ममता छीन ली, भाई के हाथों से राखी और पिता की आखों का तारा छीन लिया.”

शायद, इन सबके बीच हमेशा हमको मज़हब और धर्म की दीवार ऊँची सी लगती है…

तभी तो, गुनाह गार मिल गया….अधजली लाश का कंकाल मिल गया

लेकिन अब हम फिर से तारीख के इंतजार में, उसी कतार में खड़े दिखाई दे रहे हैं…

जहाँ से कानूनी प्रक्रिया की कवायद होने को है

कल को दो दिन बाद तुम भूल जाना और मैं भी…

वो हत्यारे राष्ट्रपति से क्षमा याचना कर लेंगे

राष्ट्रपति भी शायद, उन्हें माफ कर देगा, फिर नेताओं की कतार वहां लग जाएगी

क्योंकि उनकी जिम्मेदारी बनती है, किसी का भविष्य बनाने की

लेकिन जिसकी उन्होंने जिंदगी खत्म कर दी, उन्हें उससे क्या…?

खैर, सोचना हमें है, बदलना हमें है. क्यों नहीं बदलते हम…

आखिर कब बदलेंगे हम…?

Indian

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