मेरी पहली ईद की नमाज़

हर साल जब ईद आती है तो, मेरा मन मेरी उस पहली नमाज़ को याद करता है. जो मैंने ईद के दिन इंसानों के एक ऐसे हुजूम के बीच पढ़ी थी. जो कौमी तौर पर मुझसे अलग थे, उनका मजहब इस्लाम, जिन्हेx दुनिया मुस्लिम या मुसलमान कहती है. मै ब्राह्मण परिवार में जन्मा, सुबह की शुरूवात जहां गायत्री मंत्र और ॐ नमः शिवाय से होती है. मेरी जुबान पर कभी अल्लाह का नाम आया भी होगा तो, शायद वो किसी फिल्मी गाने के तराने के कारण. लेकिन ईद जैसे त्यौहार से एक जुड़ाव बचपन से रहा और वो जुड़ाव था इस दिन की सेवईयों के कारण….

टेलर मास्टर की सेवई

वैसे तो सेवईयां बहुत खाई,  लेकिन हर साल एक सेवई जरूर आती थी. घर पर जिसका स्वाद ज़ुबां पर पूरे साल तक चढ़ा रहता था. हमारे गांव के मार्केट में ईद से पहले इन सेवईयों की दुकानें सज जाती थी, लेकिन हम नहीं खरीदते थे, कारण ये था कि हमारे घर पर तो अपने टेलर मास्टर की सेवई का इंतजार रहता था.

ईद, सेवई

हमारे टेलर मास्टर, जो चौक पर बनी हमरी बिल्डिंग में अपनी दुकान चलाते थे, आज भी चलाते है. ईद के एक दिन पहले वो अपनी दुकान बंद करने के बाद हमारे पूरे परिवार के लिए सेवई और दूध लेकर आते थे. उस सेवई की मिठास हीं अलग थी, आज भी उसका स्वाद याद करते वक़्त मुंह में पानी आ जाता है. आज वो सेवईयां किसी अन्य कारणो से दूर है… नहीं….नहीं कारण कोई हिन्दू मुस्लिम वाला विवाद नहीं है, ये थोड़ा अलग है. हर बार हिंदू-मुस्लिम भी तो ठीक नहीं न….वैसे भी हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं आया. हां मगर आजकी कोरोना बीमारी ने हमको दूर कर रखा है.

जब मैंने पहली बार रोजा रखा और नमाज़ पढ़ी

एक हिन्दू होकर आप नमाज़ पढ़ सकते हैं..? ये सवाल अगर आप किसी भी आम हिन्दू धर्म के मानने वाले से पूछेंगे तो जवाब ना होगा. वो भी सिर्फ एक शब्द में नहीं बल्कि पूरे पैराग्राफ में… वो ये तो बताएगा ही की नहीं पढ़ना चाहिए साथ में ये भी ज्ञान दे देगा कि क्यूं नहीं पढ़ना चाहिए. लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं, ये संस्कार और वातावरण की बात है. कहते हैं कि आपके बुद्धि का विकास घर के बाद अगर सबसे ज्यादा किसी चीज पर डिपेंड करता है तो वो है आपका वातावरण. अगर आप एक कुएं के मेंढ़क हैं तो यकीनन आप के लिए सागर की कल्पना एक बेहूदा बात है.

बात उन दिनों की है जब मैं 10 वी का छात्र था. इसी समय मुझे कुछ करने की चाह जग गई थी. और अचानक एक काम भी मिला. जिसमे ख्याली पुलाव ज्यादा पकते थे. वैसे जिंदगी में आपको अगर धोखा या नाकामयाबी न मिली तो फिर आप आगे कुछ कर नहीं सकते. इस काम में मै असफल तो रहा लेकिन जिंदगी के कई अफसाने भी बने, जो आज तक मेरे जिंदगी का मार्गदर्शन करते हैं. इन्हीं अफसाने  में से एक था एक गैर हिन्दू समाज में जिंदगी बिताना.

इस काम के दौरान एक दोस्त बना जिसका नाम ‘ मेराज ‘ था. हम दोनों उन दिनों उसके पश्चिमी चंपारण के उसके गांव हरनातांड गए थे. वैसे ये जगह थारू आदिवासियों का बाहुल्य है, लेकिन मुस्लिम आबादी भी कुछ मात्रा में है. छोटे से इस गांव में मेराज का एक घर है जहां उसकी मां, बड़ा भाई , छोटा भाई और बहन रहते हैं. मुस्लिम कॉलोनी में एक घर में किसी हिन्दू का रहना भी ठीक वैसे हीं है जैसे कि हिन्दूओं के यहां मुस्लिमों का रहना. मै वहां था तो पर आसपास के लोगों को मेरा नाम साहिल बता कर.

जब हम वहां पहुंचे थे तो रमजान के महीने के आखिरी कुछ दिन हीं बचे थे. मुझे तब फास्ट रखने का कोई शौक नहीं था. लेकिन मेराज के घर तब रोजे के अनुसार ही सब खाना खाते. सुबह में आजान यानी सेहरी और शाम में इफ्तारी. बीच में पानी तक नहीं. उन 5 दिनों में एक दिन मैंने रोजे के अनुसार खाना नहीं खाया, लेकिन फिर रात में दिमाग में आया कि क्यूं ना कुछ अलग ट्राई करें. तो बाकी के 4 दिन मैंने भी रोजा रखा.

सुबह और शाम के सेहरी और इफ्तारी के वक़्त जब सब जुटते थे तब मेरे सामने जानने के लिए बहुत कुछ था. पहली बार दस्तर खान के बारे में जाना, ये जाना की मुस्लिम परिवार में खाना खाते कैसे कैसे हैं. मसलन मेरे घर में तो होता ये था कि हमे थाली में परोस के मां दे देती थी और हम खा लेते थे, और दुबारा लेना होता था तो मां लेकर आती थी. लेकिन यहां ये था कि दस्तर खान पर दो तरह के बर्तन थे एक थाली और दूसरा भगोना जिसमें खाना निकाल कर रखा होता था, इस भगोने से खाना निकाल कर थाली में डाला जाता है. मतलब की दोबारा लेने के लिए रसोई का चक्कर नहीं था.

इसी दौरान मैंने पहली बार पाक किताब कुरान भी देखी. जो मेराज का छोटा भाई सेराज हर शाम को वो पढ़ता था. किताब अरबी में थी. लेकिन सेराज को यह नहीं पता था कि उस किताब में लिखा क्या था, वो बस पढ़ता था. जिसपर मेरी उससे बात भी होती थी. मेरी बातों से वो इत्तेफाक भी रखता था, लेकिन वो ये भी मानता था कि कुरान की दो आयत रोज पढ़नी चाहिए. घर के बाकी लोग भी कुरान पढ़ते थे, अम्मी की रोजमर्रा की जिंदगी में कुरान पढ़ना शामिल था, सुबह उठकर और रात में सोने से पहले.

मेरी पहली नमाज़

ईद के पहले वाली शाम को हम बाजार में सामान खरीदने को निकले थे. उस समय हमने बाज़ार से टोपियां खरीदी थी. उस वक़्त मैंने भी एक टोपी खरीद ली. तब मेराज ने पूछा था कि नमाज़ पढ़ोगे क्या? मैंने जवाब में कहा अब जब रोजा किया है तो ईद की नमाज तो पढ़नी पड़ेगी. मेरे नमाज़ पढ़ने के बारे में जब अम्मी को पता चला तो उन्हें खुशी हुई. तब उन्होंने कहा कि आपकी दुआ जल्द कबूल होगी. ये आस्था हिन्दू समाज वाली आस्था से मिलती जुलती थी. ऐसा कहा जाता है कि गैर धर्म वाला अगर आपके धर्म के अनुसार ऊपर वाले से दुआ मांगे तो रब उसकी जल्दी सुनता है.

ईद, नमाज़, सेवई

रात में सेराज मस्जिद गया था, वहां सब बच्चे चांद का इंतजार कर रहे थे. चांद दिखा तो सब बच्चे अपने घर तक दौड़े भागे हुए पहुंचे इस बात की खबर देने की चांद दिख गया. अगली सुबह की मस्जिद से आजान के संग हीं हम सब तैयार होकर नमाज़ पढ़ने को गए. मैंने मेराज से पूछा कि नमाज़ के वक़्त पढ़ते क्या हैं, मतलब हम तो पूजा के समय मंत्र पढ़ते हैं, वैसे हीं नमाज़ के वक़्त कुछ…

तब मेराज ने कहा कि कुछ पढ़ने की जरूरत नहीं है बस में में याद कर लेना और जैसे जैसे सब करें वैसे वैसे करना. मैंने वैसा ही किया नमाज़ पढ़ने के समय मेरे मन में मेरे आराध्य थे. बस मेरी पूजा का तरीका बदल गया था.

शाम में फिर जमात निकली तो सेराज के जिद पर में भी इसमें शामिल हुआ. वैसे इसके लिए लालच ये मिली थी कि, इसमें सेवई खाने का खूब मौका मिलता है. हर घर के दरवाजे पर जाना था और उनके घर की बनी सेवई का स्वाद लेना था….हम तो वैसे ही सेवई के दीवाने थे. शाम तक जब घर लौटे तो सेवई खा खा कर पर फटने को आ गया था. रात में कुछ कहानियां सुनी अम्मी से फिर सब सो गए.

नमाज़ से मेरे दिन को कोई खतरा नहीं हुआ

ये मेरी जिंदगी की पहली नमाज़ थी. जिसे अदा करते समय मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि में अपने आराध्य से अलग हो गया हूं या अपने धर्म को छोड़ दूसरे धर्म में चला गया हूं. मेरे मन में बस एक जानने की जिज्ञासा थी. जिसने मुझे उस पल का एहसास कराया था। कहते हैं कि बिना ऊपर वाले की ईच्छा के पत्ता भी नहीं हिलता, ऐसे मेरी जिंदगी का ये पल भी शायद उनकी मर्जी का हिस्सा था. वैसे मुझे लगता है कि अगर वो मौका मुझे न मिला होता तो शायद अपने विचार में में कोई खुलापन नहीं लेकर आ सकता था.

आज जब उस वाक्ये को सात साल गुजर चुके हैं तो हर ईद पर मुझे वो पल याद आता है. इस बीच मैंने भारतीय संस्कृति और सनातन पर कई विचार और लेख पढ़े. जिसके बाद मुझे लगा कि मेरा नमाज़ पढ़ना मेरी भारतीय संस्कृति के कतई विपरीत नहीं है. मै उसी पथ पर था जिसपर हमारे देश के पूर्वज रहे हैं. यानि कि अपने अंदर हर चीज के बारे में जानने की जिज्ञासा रखने और उसे करके देखने के तरीके को अपनाने वाले. हमारी संस्कृति में ज्ञान को बड़ा माना गया है और ये ज्ञान प्रेक्टिकल हो ये ज़रूरी होना चाहिए. मसलन नमाज़ या इस्लाम मुझे उन अनेक नदियों में से एक नदी जैसे हीं लगी जो आगे जाकर सागर में मिल जाती है… और ईद उसी सागर में मिलने का आनंद है.

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