मुस्लिम कंट्री में है मां ज्वाला का मंदिर, आज भी यहां जलती है अखंड ज्योत

अगर हम अपने देश से दूर हों तो हम इंडियन्स को सबसे अच्छी बात क्या लगती है?  जवाब यहीं होता है अपने घर अपने देश और वहां की संस्कृति से जुड़ी हुई कोई चीज। ऐसी किसी भी चीज़ को देखते ही और उसके बारे में सुनते ही अंदर से एक अलग फीलिंग आती है। यह भावना कुछ ऐसी होती है कि आप और हम या हमारे जैसा कोई भी इंडियन बयां नहीं कर सकता। इस फीलिंग को आपके चेहरे पर आई एक अलग सी मुस्कान लोगों तक पहुंचा देती है। ऐसी ही एक जगह है पूर्वी यूरोप और एशिया के मध्य में.. इस देश का नाम है अज़रबेजान। वैसे तो यह एक मुस्लिम देश है। लेकिन यहां एक चीज ऐसी है जहां जाकर आपको अंदर से खुशी मिलेगी और एकदम इंडियननेस वाली फीलिंग आएगी। पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज भी अपने कार्यकाल में यहां गईं थी तब यह जगह बहुत ही चर्चा में रही। हाल ही में उपराष्ट्रपति वैन्कैया नायडु भी यहां पहुंचे थे।

अज़रबैजान के इस मंदिर को लेकर तब के न्यूज पेपरों और टीवी चैनलों की खबरों में दिखाया गया कि यहां के कैपिटल बाकू से कुछ दूर सुराखानी में स्थित एक मंदिर मां दुर्गा का प्रवित्र स्थान है जिसका इतिहास 300 साल पुराना है। इस मंदिर में एक अखण्ड ज्योति जलती है। ठीक ज्वाला जी मंदिर की तरह ही, ऐसे में कहा जाता है कि, यह मंदिर असल में हिन्दुओं का तीर्थ स्थल है जो आज विरान पड़ा हुआ है। इस मंदिर में बीते कई सालों से जल रही आग के कारण ही इसे ‘टेम्पल ऑफ फायर’ नाम से दुनिया जानती है। लेकिन क्या सच में यह एक हिन्दू मंदिर है और अगर है तो इसका इतिहास क्या है और इसे किसने बनवाया? यह सवाल हर किसी के मन में आता है।

मां ज्वाला का मंदिर

कैसा है Fire Temple?

मुस्लिम कंट्री में स्थित यह फायर टेंम्पल एक दम इंडियन स्टाइल का मंदिर है। मंदिर के चारों ओर पत्थरों से बनी कोठरी या गुफानुमा दीवार है और इन बाहरी दीवारों के साथ ही कमरे भी बने हुए हैं। जिनमें कभी मंदिर के पुजारी रहा करते थे। मंदिर के अंदर एक पंचभुजा यानि पेंटागोन के आकार के अहाते में मेन मंदिर है और इस मंदिर के गुंबद पर त्रिशूल स्थापित है जो हिन्दू धर्म में मां दुर्गा और भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। मंदिर के बीचो-बीच अग्निकुंड है जिसमें अखंड ज्योत जल रही है, जो सात छेदों से निकलती है। एक अग्निकुंड मंदिर के बाहर भी है। मंदिर में जल रही अग्नि हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर स्थित है ज्वालादेवी के ही समान है। जहां माता की कोई मूर्ति मंदिर में नहीं है। यहां धरती से निकल रही नौ ज्वालाओं की पूजा होती है।

क्या Fire Temple हिन्दू मंदिर है?

बाकू के इस फायर टेंम्पल के बारे में कई लोग मानते हैं कि, इसका निर्माण 18वीं सदी के आस पास हुआ होगा। वहीं कई लोग मानते हैं कि यह मंदिर पुराना है इसका बाद में जिर्णोद्वार कराया गया। वहीं एक द्वंद यह भी है कि मंदिर हिन्दुओं की आस्था का केन्द्र है या फारसियों का? अजरबैजान में स्थित इस मंदिर की दीवारों पर संस्कृत के कई श्लोक लिखे हुए हैं। वहीं मंदिर में पहुंचते ही जो सबसे पहला वाक्य हमे इसके पत्थरों पर लिखा हुआ मिलता है वो है ऊॅं गणेशाय नम:। इस मंदिर में सालों से हिन्दू, सिख और फारसी पूजा करने जाते रहे हैं। मंदिर की दीवारों पर देवनागरी और गुरूमुख लिपि में लिखे शिलालेख हैं जो इसे हिन्दू मंदिर ही प्रमाणित करते हैं। इसमें हिन्दू देवी मां ज्वाला की स्तूति भी है। मंदिर के ऊपर लगा त्रिशुल भी हिन्दू प्रतीक है।

वहीं पारसियों का मानना है कि, यह मंदिर उनके धर्म से जुड़ा है। क्योंकि आग उनके धर्म में भी पवित्र मानी जाती है। वहीं मंदिर के गुंबद के ऊपर लगे त्रिशुल के बारे में पारसी लोग मानते हैं कि, यह उनके धर्म के तीन विशेष गुणों का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि, भारतीय लोगों द्वारा इस जगह पर मंदिर बनाने से पहले यहां पारसी धर्म का मंदिर था। जो कई सालों तक यहां था और ध्वस्त हो गया। लेकिन इसके आसपास के इलाकों को पेट्रोलियम और गैस खनन के लिए यूज किया जाता है इसी कारण कोई सबूत अब मिलते नहीं हैं।

पारसियों ने भी इसे हिन्दू मंदिर माना

बता दें कि पारसी धर्म भी दुनिया के सबसे पुराने धर्मो में से एक है और यह भारतीय हिन्दुधर्म के काफी करीब भी है। कई पारसी विद्वानों ने इस मंदिर की जांच के बाद इसे एक हिन्दू स्थल बताया है। जोनस हैनवे (1712-1786) नाम के यूरोपिय समीक्षक ने पारसियों और हिन्दुओं को एक ही धारा का बताते हुए कहा था कि ‘प्राचीन भारतीयों और ईरानियों में काफी कुछ समान है, मंदिर में जिस पुजारी का जिक्र मिलता है वो पारसियों के लिए गेबेर या गौर है वहीं हिन्दूओं में यह गौड़ ब्राह्मण का प्रतीक है।

डॉ सर जीवनजी जमशेदजी मोदी ने अपनी किताब ‘माइ ट्रेवल्स आउटसाइड बॉम्बे-ईरान, अज़रबैजान, बाकू’ में इस जगह के बारे में लिख है। उन्होंने इस जगह को पारसी धर्मस्थल की अपेक्षा हिन्दू मंदिर के प्रमाण के रूप में बताया। उन्होंने 18 सितम्बर 1925 को मोस्को की अपनी यात्रा में लेनिन संग्रहालय में एक मंडप में बाकू ज्वालाजी के अग्निकुंड के सामने आसन लगाए हुए एक ब्राह्मण की मूर्ति देखी, जो अग्नि जला कर पूजा कर रहा है। उस ब्राह्मण के माथे पर लाल तिलक लगा हुआ है। इससे भी इस मंदिर का सम्बन्ध हिन्दू धर्म से पता चला।

मां ज्वाला का मंदिर

किसने बनवाया इस मंदिर को?

इतिहास बताता है कि, 16वीं शताब्दी के समय सेन्ट्रल एशिया में भारत के व्यापारी वर्गो की बड़ी आबादी थी। कैसपियन सागर के नावों के निर्माण के काम में भी भारतीय कारिगर और मजदूर लगे हुए थे। ऐसा कहा जाता है कि, इन्हीं लोगों ने इस मंदिर का निमार्ण या इसका जिर्णोद्वार कराया था। इतिहासकारों के मुताबिक, इसे बुद्धदेव नाम के किसी शख्स ने बनाया था, जो हरियाणा के मादजा गांव के रहने वाले थे। वहीं मंदिर के एक शिलालेख से पता चलता है कि, उनके अलावा उत्तमचंद और शोभराज ने भी मंदिर निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। इस रास्ते से होकर गुजरने वाले अधिकतर व्यापारी इस मंदिर में अपना मत्था जरूर टेकते थे।

इस मंदिर पर लगे शिलालेख बताते हैं कि, इसका निमार्ण विक्रम संवत ने 1802 में कराया था यानि 1745-46 ईस्वी के आस पास। बताया जाता है कि इस मंदिर में 1860 ई. के बाद कोई पुजारी नहीं आया। तब से इस मंदिर में श्रद्धालुओं का आना भी खत्म हो गया।

आज के दौर में इस जगह को अज़रबैजान सरकार ने एक संग्राहलय बना कर इसे संरक्षित कर दिया है। हर साल यहां 15000 के करीब टूरिस्ट आते हैं। साल 2007 में इसे वहां की सरकार ने अपने स्टेट हिस्टोरिकल रिर्जव मन्यूमेंट में शामिल कर लिया। बता दें कि, आज यह जगह दुनियाभर के हिन्दुओं को अपनी ओर आकर्षिक करती है। यह मंदिर हमारे गौरवपूर्ण इतिहास और प्राचीन समय में दुनिया के लोगों से हमारे मजबूत संबंध का गवाह है।

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