मुंबई का पहला डॉन, जिसके इशारे पर चलता था “सिस्टम”!

जब भी हम 90 के दशक की फिल्में देखते हैं, तो अधिकतर फिल्मों में हमें मुंबई की ही कहानी देखने को मिलती है। जिसमें एक भोला-भाला मजदूर या कोई लड़का हमेशा यही सोचता है कि, एक न एक दिन वो अक्खा मुंबई पर राज करेगा और फिल्म में होता भी यही है। अपने इरादे का पक्का लड़का एक दिन अक्खा मुंबई का मालिक बन भी जाता है।

कुछ ऐसी ही कहानी मुंबई के पहले डॉन, यानि की करीम लाला की है। जोकि आजाद भारत का पहला डॉन बना था। आज अगर हम अपने देश में अंडरवर्ल्ड या फिर डॉन जैसी बात सुनते या कहते हैं तो हमारे दिमाग में छोटा डॉन, दाऊद का ख्याल आता है। लेकिन 40 के दशक से लेकर 90 के दशक तक बस एक ही डॉन हुआ करता था। करीम लाला और उसका दोस्त हाजी मस्तान।

जैसे तब कि, फिल्मों में ऊपर पहुंचने के लिए हमेशा किरदार को सहारे की जरूरत पड़ती थी। ठीक उसी तरह करीम लाला भी हाजी मस्तान के साथ मुंबई का डॉन होने के साथ-साथ अक्खा मुंबई का कर्ता-धर्ता बन चुका था और इसकी शुरूवात हुई थी।चालीस के दशक में बम्बई के बंदरगाह पर ही मजदूरी करने से, यही वो समय था जिस समय करीम लाला जुर्म के साथ-साथ पूरी मुंबई का डॉन बन गया। चाहे धारावी से दहानू की बात हो या फिर डोम्बीवली से ग्रांट रोड तक।

करीम लाला

क्राइम के बीच, छड़ी बनी करीम की पहचान

करीम लाला का वर्चस्व इस तरह था कि, कोई भी इंसान करीम लाला से आंख तक नहीं मिलाता था और बुलंद होते ही अपने हौंसलों के बीच करीम लाला, देसी दारू से लेकर ब्लैक टिकट और यहाँ तक की औरतों की भी सौदेबाजी तय करने लगा। जिसमें उसने महिलाओं के रेट सऊदी के शेखों के लिए तय कर दिए थे। इस दौरान हज़ार रुपए देने वाले शेख को कोई भी लड़की, पाँच हज़ार देने वाले शेख को कुंवारी लड़की को नकली बीवी बना, देश से बाहर भेजने के लिए दस हज़ार रुपए देने होते थे।

इधर जहाँ पूरे देश में करीम लाला का नाम फैला था, तो वहीं करीम लाला का सिक्का पूरी मुंबई में चलने लगा था। अफगानिस्तान में पैदा हुआ करीम, हमेशा कहा करता कि, बम्बई से जो लिया ‘हक़ से लिया’, बम्बई का ‘पठान गैंग’.

अपने अपराधों की पहचान के बीच करीम लाला ने अपनी एक अलग पहचान अपने पहनावे को भी लेकर बना ली थी। जिसमें एक सात फुट का इंसान जब पठान सूट पहनकर और हाथ में छड़ी लेकर निकलता तो उसके रास्ते बस वही आया करता था, जिसे उसकी बदनसीबी खींच लाई हो। यही वजह रही कि, करीम का आंतक इस तरह बढ़ा कि, उसे अपने मंसूबे ज़ाहिर करने के लिए निकलने की भी जरूरत नहीं रहती, क्योंकि इस काम को भी करने की जिम्मेदारी ले ली थी करीम लाला की काली छड़ी ने, करीम को जब भी कोई जगह या कुछ करना होता तो उसके गुर्गे वहां जाकर उसकी छड़ी रख देते। सबको मालूम था कि, छड़ी को कोई हाथ नहीं लगाएगा। ये एक ऐसा दौर था, जिस समय दाऊद इब्राहिम जैसे, क्राइम की नर्सरी में पढ़ाई कर रहे थे।

यही वजह रही कि, 1950 से लेकर 1980 तक करीम लाला ने अक्खा मुंबई पर एक तरफा राज़ किया और फिर हाजी मस्तान भी अपने काम में व्यस्त हो गया, यही एक ऐसा दौर था, जिस समय मुंबई में दूसरे गिरोहों के पनपने की शुरुवात हुई। इन गिरोहों में दाऊद इब्राहिम कास्कर का भी गिरोह शामिल था। इस दौरान दाऊद की गिरोह ने कई बार करीम लाला का रास्ता रोका और एक हाथ से चलने वाली बम्बई में खूनी गैंग वॉर की शुरुवात हुई। जिसको पुलिस ने भी गैंग वॉर का नाम दिया।

करीम लाला

दाऊद इब्राहिम और करीम लाला की खूनी वॉर

जिस समय करीम लाला जनता का नेता बन चुका था। उस समय हर शाम करीम लाला के घर जनता दरबार लगाया जाता था, जहाँ हर फरियादी की बात करीम लाला सुना करता था। इस दरबार में करीम लाला से मदद मांगने के लिए बम्बई के नेता, अभिनेता और यहाँ तक की पुलिस वाले भी आया करते थे। इस बीच जिस दिन करीम नहीं होता था। उस दिन करीम की छड़ी लोगों की फरियाद सुना करती थी। लेकिन दूसरी तरफ बम्बई में पनपते नए गिरोह करीम लाला के लिए परेशानी बनने लगे थे।

क्योंकि दाऊद जानता था कि, करीम को जनता बादशाह मानती है और उससे सीधा टकराने से लोगों के बीच उसे भी वही पहचान जरूर मिलेगी। इस बीच दाऊद किसी भी तरह के बनाए माफ़िया गैंग को नहीं मानता था और न ही पठान गैंग कभी भी गिरोह के परिवार और औरत पर हमला करता था। लेकिन दाऊद ने इन सभी नियमों को तोड़ दिया। जिसके बाद तो बम्बई की सड़के भी गवाह हैं, करीम लाला ने दाऊद को बम्बई की सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था। इस बीच साल 1981 में करीम लाला की पठान गैंग ने दाऊद के भाई शब्बीर इब्राहिम को भी मौत के घाट उतार दिया। जिससे तिलमिलाए दाऊद और उसके गिरोह ने करीम लाला के भाई की हत्या कर दी।

ये वो दौर था जिस समय, करीम लाला का क़ारोबार धीरे-धीरे सिमटता चला गया और बम्बई में डी कंपनी सबकी नज़र में आई। साल 1981 से लेकर 1985 बम्बई का एक ऐसा दौर था, जिस समय सबसे ज्यादा गैंग वॉर हुए। दर्जनों से ज्यादा लोगों की जानें गई। उसी समय एक फिल्म आई थी। जंजीर जोकि अमिताभ बच्चन की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है। जिसमें एक किरदार शेर खान का था। जिसको प्राण साहब ने निभाया था। इस किरदार को लेकर ऐसा कहा जाता रहा है कि, ये किरदार करीम लाला की ही तर्ज पर तैयार किया गया था.

करीम लाला के आखिरी दिन

जिस समय डी कंपनी अस्तित्व में आई, उन्होंने पठान गैंग के लोगों को चुन-चुन कर खत्म कर दिया। इसके बावजूद भी करीम लाला और हाजी मस्तान की दोस्ती लोगों के बीच काफी मशहूर रही। क्योंकि हाजी मस्तान हमेशा से करीम लाला को असली डॉन कहता था। वहीं करीम लाला अपनी बादशाहत गंवाने के बाद साल 2002 में 19 फरवरी के दिन दुनिया को अलविदा कह गया। उस समय करीम 90 साल का था यानी कि आतंक का ये सूरमा अपनी पूरी जिंदगी जीकर मरा।

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