माँ-पापा और उनके माथे पर दिखाई देती झुर्रियां…

कहते हैं, नियती का लिखा कोई टाल नहीं सकता.. क्योंकि जो कुछ लिखा जा चुका है। उसे टाल पाना इंसान के बस की बात नहीं है। खैर ये हमारी पुरानी उन परंपराओं में कही गई, एक ऐसी कड़वी सच्चाई है. जो हमको मालूम होने के बावजूद भी हम कभी इससे डरते नहीं हैं। क्योंकि क्या लिखा जा चुका है। क्या नहीं, आम लोगों को क्या मालूम

लेकिन एक चीज है, जो वास्तव में हर इंसान के जीवन की सबसे बड़ी मुसीबत होती है।

क्योंकि ये मेरे बचपन की बात है, जब मैं नर्सरी में था. तब जब मुझे मेरे स्कूल में दाखिला दिया गया था. उस समय मेरी माँ मुझे हर रोज स्कूल छोड़ने जाती, फिर वहां से लेकर आती. इन सबके बीच मैं एक चीज कभी मिस नहीं करता था. वो था, स्कूल से निकलने वाले भईया की रेड़ी से इमली खरीदना.

खैर मम्मी पैसा दे देती और मैं हंसी-खुशी घर आ जाता. लेकिन धीरे-धीरे वक्त बदलता गया। मैं भी स्कूल से निकलकर, कॉलेज में गया. वहाँ से कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके, एक अच्छी सी जॉब करने लगा. न वक्त रुका और न ही मैं इस बीच मैं बड़ा हो गया. मैंने जिम्मेदारियां ले ली.

उन्हीं जिम्मेदारियों के चलते, मैं अपने घर से निकलकर दिल्ली जैसे शहर में आ गया. कमाने लगा. रफ्तार ही कुछ ऐसी है कि, मानो पता ही नहीं चला. लेकिन इन बीच एक और चीज है. जो दिल के साथ-साथ दिमाग में भी घर कर गई.

वो ये कि, मम्मी और पापा के माथे पर दिखाई देती झुर्रियां….ऐसे झुर्रियां जिन्होंने मम्मी पापा के चहरे पर अपना घर बना लिया. शाम को जब गांव पहुंचा था. तब मैं ये देख नहीं पाया था. हालांकि अगली सुबह जब मुझे मेरी माँ जगाने आई. तो मेरी नजर उनके माथे पर पड़ी थी.

अब कुछ खास कमाता नहीं हूँ मैं, घर में पिता जी भी एक प्राइवेट संस्था में काम करते थे. लेकिन पिछले दो साल से मैंने ही उनकी नौकरी छुड़वा कर घर रहने को कहा दिया था. वक्त की भागम-भाग में लेकिन इन झुर्रियों ने कब मेरे मम्मी-पापा के चेहरे पर अपना बसेरा बना लिया मालूम नहीं चला.

यही वजह है कि, जब से अपने घर से वापस लौटा हूँ, तब से वही रह रहकर याद आता रहा है। क्योंकि ये झुर्रियां हर रोज मेरे माँ और पिता जी को अपनी जकड़ में कैद कर रही हैं, या ये नियती है मालूम नहीं.

हाँ मगर अब मैं इसलिए डर रहा हूं, क्योंकि अब तक न तो कुछ सेव कर सका हूँ मैं और न ही कोई सोर्स है मेरे पास कि, जब कभी मेरे मम्मी-पापा को मेडिकल की जरूरत हो तो मैं उन्हें बेहतर मेडिकल ट्रीट दिला पाऊंगा, घुटन होती है कभी-कभी.

क्या करूं, क्या न करूं समझ नहीं आता. हाँ मगर माँ का चेहरा जरूर याद आता है. उन झुर्रियों के साथ जब मेरे वापस लौटते वक्त माँ दरवाजे पर खड़ी थी और उन्होंने मुझसे कहा कि, ख्याल रखना अपना और उनकी आँखें भर आईं थी. तब मन हुआ था कि, माँ के गले लगकर रो जाऊ. लेकिन अगर ऐसा करता तो, मम्मी-पापा के अंदर कहीं भय बैठ जाता कि, बेटा वहां सुखी तो है ना, खुद बहुत मजबूत रहा हूँ क्योंकि हमेशा उनके सामने.

सच कहूं, मैं चाहता हूँ कि, काश ये रूक जाए.. वक्त भी… क्योंकि मुझको न तो सरकार से कोई उम्मीदें हैं और न ही, किसी पर यकीन…. खैर, अगर नियती का लिखा ही है तो, काश ये रुक जाता. लेकिन मजबूर हूँ मैं… अपनी तैयारी करना चाहता तो हूँ लेकिन नहीं कर पाता.

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