‘महाशिवरात्री’ — अध्यात्म, योग और विज्ञान से जुड़ा भारतीय सनातनी त्योहार

21 अगस्त 2020, इस दिन को एक बार फिर से पूरे भारत सहीत दुनिया के हर उस कोने में जहां शिवभक्त है, महाशिवरात्रि का महान पर्व मनाया जाएगा। एक ऐसा पर्व तो खासतौर पर पूरी रात जग कर मनाया जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार, इस दिन को शिव—पार्वती विवाह और भगवान शिव के प्रकट होने के दिन के रुप में देखा जाता है। वैसे तो हिन्दू लूनर—सोलर कैलेंडर के अनुसार हर महीने में एक शिवरात्रि 13वें की रात और 14वें दिन की सुबह होती है। लेकिन माघ यानि की फरवरी के अंत में या मार्च की शुरूआत में जो शिवरात्रि का दिन होता है उसे महाशिवरात्रि के दिन के रूप में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि यानि की भगवान शिव की वो रात जो सबसे महान है।

इस रात को उस महान रात के रूप में देखा जाता है जिस दिन इंसान अपनी जिंदगी के हर अंधेरे और अज्ञानता पर काबू पा सकता है। भक्ति परंपरा के अनुसार, यह मान्यता प्रबल है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की शादी हुई थी लेकिन यौगिक परंपरा में इस बारे में बहुत से वैज्ञानिक बातें बताई गईं हैं जो इंसान के खुद के आंतरिक विकास से जुड़ी हुई हैं। इस दिन को कश्मीर के शिवभक्त हर—रात्रि या हिरथ कहते हैं। इस दिन को लोग शिवलिंग के दर्शन करने के लिए मंदिरों में जाते हैं, भागवान शिव का जाप करते है और कई जगहों पर रात भर जागरण होता है। वहीं भारत सहित नेपाल में कई जगहों पर इस दिन को भांग या गांजा पीने की भी परंपरा है।

महाशिवरात्री

‘महाशिवरात्रि’ भारतीय हिन्दू सनातन परंपरा का एक ऐसा पर्व है जो खुद में सनातनी है यानि की इस त्योहार की शुरूआत कब, कैसे और कहां हुई? इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता। लेकिन यह पूरे भारत और नेपाल में समान रुप से एक ही दिन भगवान शिव की पूजा के तौर पर मनाई जाती है। महाशिवरात्रि असल में हिन्दू और भारतीय संस्कृति में मनाई जाने वाली बाकी सारे त्योहारों से बिल्कुल अलग है। आमतौर पर हम देखते हैं कि, हिन्दू त्योहार ज्यादात्तर दिन में मनाए जाते हैं, लेकिन शिवरात्रि ही एक ऐसा त्योहार है जो पूरी रात मनाई जाती है। बाकी के हिन्दू त्योहार भारतीय संस्कृति और इसकी परंपरा की झलक लिए आती हैं जिसमें एक बाहरी उमंग और हर्षोल्लास का नजारा दिखता है, लेकिन इसके विपरीत महाशिवरात्रि के दिन का शांति, एकात्म, एकांत, आत्ममंथन, योग, उपवास और शिवमंदिर में जागरण का ही नजारा दिखता है। 

Maha Shivratri को लेकर प्रचलित पौराणिक कहानियां

भक्ति परंपरा के हिसाब से अगर ‘महाशिवरात्रि’ के इतिहास को खंगालने की कोशिश करें तो इसमें कई सारी कहानियां हमारे सामने उपलब्ध मिलती हैं। शिव पुराण, स्कंद पुराण, लिंगम पुराण और पद्म पुराणों में इस बारे में कई तरह की धार्मिक कहानियां हैं।

पहली बार प्रकट हुए थे भगवान शिव :—  महाशिवरात्रि को भगवान शिव के पहली बार सगुण रुप में प्रकट होने के रुप में देखा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि, सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा और पालनहार भगवान विष्णु में इस बात की बहस हो गई कि, दोनों में बड़ा कौन है। इसी बहस के बीच भगवान शिव एक शिवलिंग के आकार में प्रकट हुए। और एक आवाज गुंजी कि, जो भी इस शिवलिंग के बाकी और छोर का पता लगाएगा वो ही दोनों में बड़ा होगा। ब्रह्म लिंग के ऊपरी हिस्से की ओर गए  और विष्णु पाताल की ओर लेकिन कोई और छोर पता नहीं चला। ऐसे में फिर दोनों ने शिवलिंग से प्रार्थना की। इसके बाद भगवान शिव अपने महादेव रुप में प्रकट हुए। यह दिन ही महाशिवरात्रि के रुप में मनाया जाता है।

शिव—पार्वती के विवाह का दिन :— महाशिवरात्रि को शिव और पार्वती के मिलन के रुप में देखा जाता है। माता सती के बाद भगवान शिव अकेले पड़ गए थे। इसके बाद शिव ने पार्वती के होने तक का इंतजार किया। बता दें कि शिव और पार्वती को पुरूष और प्रकृत का रुप माना जाता है। यह दोनों के मिलने का दिन है। इस दोनों तत्व के मिलने से ही संसार में पूर्णता आती है। महाशिवरात्रि के दिन ही दोनों का विवाह हुआ था। इससे पहले शिव वैरागी थे लेकिन इसके बाद वे गृहस्थ बन गए। इस दिन के 15 दिन बाद होली मनाए जाने का ये ही कारण है।

पूरी दुनिया में प्रकट हुए थे 64 शिवलिंग :– महाशिवरात्रि को लेकर हिन्दू परंपरा में एक और कहानी है। यह कहानी है 64 शिवलिंगों के एक साथ धरती पर प्रकट होने की। कहा जाता है कि, इसी रात तो 64 शिवलिंग प्रकट हुए थे जिसमें से 12 के बारे में ही लोग जानते हैं। इन्हें ही भारत में 12 ज्योर्तिलिंग कहा जाता है। महाशिवरात्रि के दिन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर दीपस्तंभ लगाए जाते हैं ताकि लोग शिवजी के अग्नि वाले अनंत लिंग का अनुभव कर सकें। इसलिए इस दिन को लिंगोभव, यानी जो लिंग से प्रकट होने के रुप में जाना जाता है। ऐसा लिंग जिसका न तो आदि था और न ही अंत।

Maha Shivratri – क्या है यौगिक परंपरा में इस दिन का महत्व?

यौगिक परंपरा में शिव का सबसे ज्यादा महत्व है। इस परंपरा में भक्ति परंपरा की हर कहानी का एक वैज्ञानिक अर्थ मिलता है। यौगिक परंपरा में शिव को भगवान नहीं बल्कि पहले गुरू के रुप में देखा जाता है जिन्होंने दुनिया को योग का उपहार दिया। इसलिए शिव को इस परंपरा में आदियोगी के नाम से जाना जाता है। यह परंपरा हिन्दू धर्म के अद्वैत परंपरा के बारे में है। ‘शिव’ का मतलब होता है ‘वो जो है ही नहीं’। ऐसा माना जाता है कि इस दिन को अगर इंसान खुद को ऐसी स्थिति में रखे कि, वो इंसान न होकर खुद को शिव होने दें, तो वो अपने जीवन में पूर्ण स्पष्टता को देखने के लिए एक नई दृष्टि की संभावना को पा सकता है। शिव यानि जो है नही है, ऐसा कहना आधुनिक विज्ञान के उस सिद्धांत के बारे में है जिसमें माना जाता है कि, यह दुनिया शून्य से निकली है और शून्य में चली जाएगी। यौगिक परंपरा में बहुत पहले ही शून्य को सृष्टि का आधार बताया गया है। यानि कि, शिव ही अस्तित्व का आधार है। ‘वह जो नहीं है’, वह उसका आधार जो मौजूद है।

इसी परंपरा में ‘शिव’ को घने अंधकार से जोड़कर देखा जाता है। शिव जो नही है उसका अर्थ शून्य, अंधकार और रिक्त यानि खाली स्थान से है। अगर हम रात में आकाश को देखेंगे तो हमें हजारों तारे टिमटिमाते हुए दिखते हैं। लेकिन इन तारों की रोशनी हमे इसलिए दिखती है क्योंकि एक घना अंधेरा होता है, इसके अलावा विज्ञान इस बात को कहता है कि, हमारा पूरा यूनिवर्स असल में पूरा खाली है और एक काली या अंधेरी चीज से बना है। जिसके मात्र कुछ ही हिस्से में यह तारे और आकाश गंगाएं हैं। यानि 95 पर्सेंट ब्रह्मांड डार्क एनर्जी है सिर्फ 5 प्रसेंट ही रोशनी का हिस्सा है। इसी असीम खालीपन को यौगिक परंपरा में शिव कहा गया है यानि अंधकार, शून्यता, रिक्तता और जो है ही नहीं। ‘जो है’, वह अस्तित्व और सृजन है। ‘जो नहीं है’, वह ही शिव है। इसी शून्यता में सृजन होती है और अंत भी, शिव ही वह शून्यता हैं जहां से सृजन होता है और अंत भी।

महाशिवरात्री

अंधकार सर्वव्यापी है, यह शैतान का प्रतीक नहीं

”जब लोग अपना कल्याण चाहते हैं, तो हम उस दिव्यता को प्रकाश के तौर पर दिखाते हैं। जब लोग अपने कल्याण से ऊपर उठ कर, अपने जीवन से परे जाने, अद्वैत होने पर ध्यान लगाते हैं तो हम सदा उनके लिए दिव्यता को अंधकार के रूप में परिभाषित करते हैं”

हमारी दुनिया के प्रत्येक धर्म व संस्कृति में दिव्यता और एक सर्वव्यापी प्रकृति की बात कही जाती है और असल मे कोई चीज़ जो सही मायनों में सर्वव्यापी हो सकती है वह केवल अंधकार, शून्यता या रिक्तता ही है। प्रकाश आपके मन की एक छोटी सी घटना मात्र है। यह शाश्वत नहीं है,यह सीमित है और यह किसी स्त्रोत से निकलती है। लेकिन अंधकरा सर्वव्यापी है, शाश्वत है, असीमित है और इसका कोई स्त्रोत नही है।

योगियों के लिए इस दिन का अपना आध्यात्मिक महत्व है। योग का अर्थ जोड़ने से है, यह जोड़ 1 जोड़ 1 बराबर दो वाला नहीं है बल्कि एक से जुड़कर एक होने का है। यौगिक परंपराओं में महाशिवरात्रि को आध्यात्मिक साधकों के लिए बहुत सी संभावनाओं वाले दिन के रुप में देखा जाता है। ‘योगी’ का अर्थ अस्तित्व की एकात्मकता को जानने वाले से है और ‘योग’ एकात्म को जानने की क्रिया है। महाशिवरात्रि के दिन असीम विस्तार में एकात्म वाला अनुभव प्राप्त करने का मौका मिलता है। यौगिक परंपरा के अनुसार यह दिन अवसर होता है कि व्यक्ति अपनी सीमितता को छोड़, सृजन के उस असीम स्त्रोत का अनुभव करें जो हम सबमें मौजूद है।

जागृति की रात है महाशिवरात्रि :— महाशिवरात्रि केवल रात में नही सोने, ‘जागरण’ करने की रात नही है। यह आध्यात्मिक जागरण, चेतना और जागरूकता वाली रात है। इस रात में हमारी धरती का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार से होता है कि मनुष्य के ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की और जाती है। विज्ञान की भाषा में कहें तो अर्थ का सेन्द्रलफ्यूबल फोर्स एक खास तरीक से काम करता है। यह उपर की ओर उठता है इस लिए इस दिन सोने से मना किया गया है। कर्नाटक के कुछ इलाकों में इस दिन को एक परंपरा है कि बच्चे लोगों के घरों पर जाकर पत्थर मारते हैं ताकि वे हर सोते हुए इंसान को जगा सकें। यह एक ऐसा दिन है, जब मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद मिलती है। इसलिए इस रात लोग अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए जागते रहते हैं ताकि वे उर्जा के इस प्रवाह का आनंद ले सकें।

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