मलाणा गाँव जहाँ नहीं चलता भारत का कानून, ‘Social Distancing’ की अनूठी मिसाल

देश दुनिया में कोरोना काल जारी है। इससे संक्रमित होने वाले लोगों का आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अपने देश भारत में भी अब संक्रमितों के आंकड़ा इस समय साढ़े 5 लाख के पार है। दुनिया भर में इस वायरस ने 5 लाख से ज्यादा लोगों को मौत के मुंह में धकेल दिया है। एक तरह कोरोना का संक्रमण बढ़ रहा है तो वहीं अभी इंसानी आबादी के पास इससे निपटने के लिए बचाव के तरीके को अपनाने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं है। बचाव के तरीके वहीं है सोशल डिस्टेंसिंग, हैंड वाश, सैनिटाइजर और लॉक डाउन। भारत में भी लॉकडाउन पांचवे फेज है। वहीं सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील भारत कि सरकार लगातार लोगों से कर रही है।

लेकिन लोग अब इससे लगातार बोर होते दिख रहे हैं, शायद यहीं कारण है कि लोग अब इसे सीरियसली भी नहीं ले रहे। लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग से बोर होने वाले लोगों के लिए आज हम भारत के गांव की एक अनोखी कहानी लेकर आए हैं, जहां हजारों सालों से सोशलडिस्टेंसिंग का पालन होता आया है और जो ये नहीं करता उस भरना पड़ता है…भारी जुर्माना। भारत के हिमाचल प्रदेश में एक गांव है मलाणा। कोरोना काल में यह गांव कैसे अपनी परंपरा के कारण बचा हुआ है यह बताएंगे लेकिन इससे पहले इस गांव के बारे में कुछ अनोखी बातें जान लेते हैं।

भारत का सबसे रहस्यमयी गांव है मणाला

मलाणा गाँव

मलाणा के बारे में कहा जाता है कि ये भारत का सबसे रहस्य मयी गांव है। यह भारत का वो गांव है जहां देश का कानून नहीं चलता है। यहां का कानून अलग है और ये सिस्टम यहां पर बहुत साल पहले डेवलप हुआ है। हिमाचल के इस गांव को प्रजातंत्र यानि की डेमोक्रेसी का जन्म स्थान भी माना जाता है, ठीक बिहार के वैशाली की तरह। इस गांव का हजारों साल पुराना डेमोक्रैटिक सिस्टम आज भी ज्यों के त्यों बना हुआ है और गांव के सारे नियम कानून उसी हिसाब से बनते हैं।

पहाड़ियों से घिरे हिमाचल के कुल्लू जिले में मलाणा गांव पड़ता है। इस गांव को कई लोग सिकंदर के सैनिकों का गांव भी कहते हैं। कहानियां हैं कि जब सिकंदर और राजा पुरू के बीच लड़ाई हो रही थी तो कई सैनिक भाग कर हिमाचल कि आओर चले गए और फिर बाद में यहीं बस गए। हालाकि यहां के लोगो का ऐसा कोई डीएनए टेस्ट हुआ नहीं है लेकिन इस गांव में मिलने वाले ऐतिहासिक और पुरातात्विक चीजे, इस बात की तरफ संकेत जरूर करती हैं।

यहां के लोगों के नैन नक्श और हाव भाव भी भारतीय लोगों से अलग हैं। वहीं इसके अलावा याहन के लोग मुगल बादशाह अकबर की पूजा करते हैं। दरअसल इस गांव में आज जिस देवता की पूजा होती है वो मध्य काल के महान ऋषि जमलू हैं। बादशाह अकबर ने एक बार उनकी परीक्षा ली थी, तब ऋषि ने अपने तपोबल से उस समय दिल्ली में बर्फबारी करवा दी थी।

गांव की शासन व्यवस्था है सदियों पुरानी

मलाणा गाँव

जैसा कि हमने आपको पहले ही बताया की इस गांव में भारतीय कानून नहीं बल्कि इनका अपना कानून चलता है।

मलाणा गांव में वर्षों पुरानी प्रजातांत्रिक व्यवस्था है जो आज भी काम करती है। गांव की अपनी संसद है जिसके दो सदन है, एक उपरी सदन और एक निचला सदन। बड़े सदन में 11 सदस्य होते हैं। जिसमें 8 सदस्य गांव वालों में से चुने जाते हैं, जबकि तीन अन्य कारदार, गुर और पुजारी स्थायी सदस्य होते हैं। निचले सदन में गांव के हर घर से एक बुजुर्ग आदमी सदस्य होता है। सारे अहम फैसले बड़े सदन में होते हैं जहां अंतिम फैसला जमलू ऋषि का होता है। कहा जाता है कि मुख्य पुजारी के शरीर में जमलू ऋषि की आत्मा आती है जो फैसला सुनाते है। बड़े सदन कि एक और खासियत ये है कि अगर इसके किसी भी सदस्य की मृत्यु हो जाए तो पूरे सदन का गठन दोबारा होता है।

किसी भी मुद्दे पर फैसला देवनीति से तय होता है। हर फैसले के लिए संसद भवन के रूप में ऐतिहासिक चौपाल लगाई जाती है। ऊपरी सदन के 11 सदस्य ऊपर बैठते हैं और निचली सदन के सदस्य नीचे बैठे होते हैं। यूं तो ज्यादातर मामले सुलझा लिए जाते हैं, लेकिन अगर कोई मामला फंस जाता है तो ऐसे मामले को सबसे अंतिम पड़ाव पर भेज दिया जाता है यानि फैसला जमलू देवता के सुपुर्द कर दिया जाता है।

गांव के लोग जमलू ऋषि को अपना देवता मानते हैं। उनका फैसला अंतिम और सच्चा माना जाता है।  किसी मामले को जमलू देवता के हवाले करने की बाद एक अजीबो गरीब ढंग अपना कर फैसला दिया जाता है। जिन दो पक्षों का मामला होता है, उनसे दो बकरे मंगाए जाते हैं। दोनों ही बकरों की टांग में चीरा लगाकर बराबर मात्रा में जहर भर दिया जाता है. जहर भरने के बाद बकरों के मरने का इंतजार होता है और जिस पक्ष का बकरा पहले मरता है, वह दोषी होता है।

ऐसे फैसलों पर कोई सवाल नहीं उठाता, लेकिन 2012 के बाद इस गांव में कई बदलाव आए हैं। अब इस जगह पर चुनाव भी होने लगे हैं। इस गांव की शासन प्रणाली ग्रीक एथेंस से मिलती जुलती है इसलिए इसे भारत का एथेंस भी कहते हैं।

अपनी अलग भाषा

इस गांव के लोगों की अपनी एक अलग भाषा है। यह भाषा सिर्फ यहीं बोली जाती है। गांव के लोग अपनी भाषा को पवित्र मानते हैं और इसलिए किसी और को नहीं सिखाते।

इस भाषा को कनाशी कहते हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं बोली जाती। हालांकि स्थानीय लोग हिंदी समझ जाते हैं. मगर, वो उसके जवाब में जो कहते हैं, वो बात कनाशी में होती है और समझ में नहीं आती।

कनाशी भाषा पर एक रिसर्च स्वीडन की उप्पासला यूनिवर्सिटी में हो रही है। रिसर्चर्स कहते हैं कि कनाशी तेज़ी से विलुप्त हो रही ज़बान है। जो चीनी-तिब्बती भाषा समूह की भाषा है। अगल बगल के गांव में इंडो आर्यन भाषा बोली जाती है। जिसका इस भाषा से कोई रिश्ता नहीं है यहीं कारण है कि यह भाषा कईयों के लिए दिलचस्पी का केंद्र है।

हशीश का जादू खींच लाता है दुनिया को

मलाणा गाँव

इस गांव में पर्यटन के आकर्षित होने का एक महत्वपूर्ण कारण है हशीश या चरस। यहां के हशीश की बड़ी खूबी ये है कि यहां के लोग इसे खुद अपने हाथ से रगड़ कर तैयार करते हैं। रहस्य से भरे इस गांव में नशे का व्यापार खूब फलता-फूलता है। मलाणा गांव की चरस पूरी दुनिया में मशहूर है, जिसे मलाणा क्रीम कहा जाता है। यहां पैदा होने वाली चरस में उच्च गुणवत्ता का तेल पाया जाता है.

अपनी कानून व्यवस्था, कुछ भी छूने पर पाबंदी

मलाणा गाँव

शासन के साथ ही यंहा की अपनी प्रशासन व्यवस्था और पुलिस है। जिसमें सरकार का कोई दखल नहीं होता। रहस्यों से भरे इस गांव में एक नियम ये है कि यहां किसी भी चीज को आप छू नहीं सकते, ऐसा करने पर आपको बड़ा जुर्माना भरना पड़ सकता है। इस गांव के बाहर ही बोर्ड लगा है कि कुछ भी छूने पर 1000 रुपया जुर्माना लगेगा। यहीं जुर्माने की राशि 1000 से 2500 तक है। इसके आलावा यहीं जमलू देवता का जो मंदिर है काफी आकर्षक है। लेकिन कोई बाहरी इस मंदिर को छू नहीं सकता। मंदिर के आगे एक नोटिस लगा है जिसपर मंदिर को छूने पर 3500 रुपए जुर्माना भरने की बात लिखी हुई है।

इस पाबंदी के बाद भी यह जगह पर्यटकों के लिए सबसे बेस्ट जगहों में से है। यहां प्रयत्नों की भीड़ रहती है। अगर गांव आए किसी पर्यटक को कुछ खाने की चीज खरीदनी होती है तो वो पैसा दुकान के आगे रख देता है और फिर दुकान दार सामान उनके आगे जमीन पर रख देता है। सोशल डिस्टेंसिंग का ये तरीका यानि वर्षों से यूं ही चलता आ रहा है। यहां तक कि इस गांव में नियम है कि कोई भी बाहरी गांव में रात में नहीं रुक सकता, ज्यादातर पर्यटक गांव के बाहर टेंट लगाकर रात गुजारते हैं।

बाहरी लोगों से यहीं दूरी है के लिए कोरोना काल में वरदान बन गई है। यहां के लोग जो बाहरी लोगों से किसी भी तरह के शारीरिक संपर्क से दूर रहते हैं और साथ ही एक निश्चित दूरी बनाते हैं वो आज कोरोना संक्रमण से बचे हुए हैं। वहीं इस गांव में 15 अगस्त तक लॉक डाउन भी लगा हुआ है जो भारत भर में लॉक डाउन के फैसले से पहले लिया गया था। लॉक डाउन का पालन सख्ती से हो इसके लिए जुर्माने का प्रावधान है।

यदि गांव का व्यक्ति किसी को अपने घर में शरण देता है तो उसे 51 हजार रुपए का जुर्माना भरना होगा। इसी तरह बाहर से मलाणा आने वाले व्यक्ति को 1100 रुपए की पैनल्टी भरनी होगी। चोरी-छिपे गांव में यदि कोई व्यक्ति दाखिल होकर 5 दिन गुजार लेता है तो उस व्यक्ति को प्रत्येक दिन के 1100 रुपए के हिसाब से 5 दिन के 5500 रुपए देने होंगे। दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय लोग दिन-रात गांव की पहरेदारी करते हैं। मलाणा पंचायत में कुल 5 वार्ड हैं। प्रत्येक वार्ड से एक-एक व्यक्ति रोजाना गांव की पहरेदारी कर रहा है।

आज ये गांव अपनी पुरानी परंपरा के के कारण कई लोगों और समूहों के लिए एक मिसाल बन गया है। तो अगर आप सोशल डिस्टेंसिंग से बोरे हो गए हैं तो आप मलाणा गांव के लोगों से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

Indian

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

नैप नैप मैट - जिसपर नवजात बच्चों को मिलती है सुकून वाली नींद, बीमारियों से भी बचाता है

Wed Jul 1 , 2020
Share on Facebook Tweet it Pin it Email मां…., ये शब्द नहीं पूरा वाक्य है, बस दो अक्षरों का ये शब्द अपने आप में एक बड़े से एहसास की व्याख्या कर देता है। किसी भी महिला के लिए मां बनना या गर्भ धारण करना ही एक अलग एहसास है। यह […]
नैप नैप मैट