मकर संक्रांति और इससे जुड़ी देश भर में अलग-अलग परंपराएं

मकर संक्रांति यानि की भगवान भास्कर का त्योहार, जो कि पूरे भारतवर्ष में और इससे बाहर के देशों में भी किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। वैसे तो इसे हिन्दुओं का प्रमुख पर्व माना जाता है लेकिन दुनिया भर की ऐतिहासिक और प्राचीन परंपराओं में संक्रांति का यह त्योहार मनाया जाता है। जैसा कि, हम जानते हैं कि भारत कई परंपराओं का संगम है, ऐसे में मकर संक्रांति के पर्व के कई रंग हमे हमारे देश के अलग—अलग हिस्सों में देखने को मिलते हैं। आमतौर पर यह समय फसल काटने का होता है। ऐसे में इस त्योहार का अपना एक अलग महत्व भी बन जाता है। भारतीय कैलेंडर के अनुसार जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तब इस पर्व को आम लोग मनाते हैं।

आमतौर पर यह त्योहार जनवरी महीने में 14 या 15 तारीख को मनाया जाता है। मकर संक्रांति के पर्व को कहीं-कहीं उतरायणी भी कहते हैं। लेकिन आज की शताब्दी के हिसाब से सूरज 14 या 15 दिसम्बर को ही उत्तर की ओर होने लगता है। लगभग 1800 साल पहले ये दोनों एक ही दिन होते थे। उत्तरायण के अलावा इस दिन को भारत के कई हिस्सों में कई अलग—अलग नामों से जाना जाता है। जैसे तमिलनाडु में पोंगल, गुजरात में उतरायण, पंजाब में लोहड़ी, असम में बिहु, कश्मीर घाटी में शिशुर सेंक्रात, बिहार और यूपी में खिचड़ी या तील संक्रांति, पश्चिम बंगाल में पौष संक्रांति, कर्नाटक में मकर संक्रांति और हरियाणा में माघी आदि।

Makar Sankranti को मनाने के कुछ विशेष तरीके 

मकर संक्रांति एक नए युग में प्रवेश करने जैसा है। क्योंकि इस दिन के पहले तक चलने वाले एक महीने के टाइम पीरियड में आम तौर पर हिन्दू रिती—रिवाज़ों के अनुसार कोई शुभ काम नहीं होता। इस दिन खरमास का यह टाइम पीरियड खत्म हो जाता है ऐसे में मकरसंक्रांति नए कामों को नई उर्जा के संग शुरू करने का दिन है और ऊर्जा के सबसे बड़े प्रतीक सूर्य होते हैं। आमतौर पर मकर संक्रांति को ज्यादात्तर घरों में खिचड़ी खाने की परंपरा है। वहीं इस दिन को कई जगहों पर मेले लगते हैं और पतंग उड़ाने या पतंगबाजी करने की परंपरा देखने को मिलती है। लेकिन यह परंपरा देश के सिर्फ कुछ ही हिस्सों में सीमित हैं। भारत के हर हिस्से में एक अलग तरह की संक्रांति देखने को मिलती है।

बिहार—यूपी और झारखंड की Makar Sankranti

सबसे पहले बात बिहार में मनाई जानेवाली मकर संक्रांति की करते हैं। बिहार में दो हिस्से है जिनमें परंपराएं थोड़ी सी अलग हैं। एक हिस्सा जो मिथिला का इलाका है वहां इस दिन को मूल रूप से तील संक्रांति के नाम से जाना जाता है। वहीं बाकी के हिस्से में इसे खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। इस दिन की शुरूआत लोगों के घरों में सुबह के स्नान से शुरू होता है। इसके बाद लोग पूजा करके दान के लिए निकाले गए अनाज को छू कर इसे प्रणाम करते हैं। जिसे बाद में किसी गरीब ब्राह्मण को दान कर दिया जाता है।

इसके बाद पूरे बिहार में दही—चूड़ा और साथ में थोड़ा सा कच्चा तिल और गुड खाने की परंपरा है। वैसे दही—चूड़ा के भोज बिहार की राजनीति का भी इस दिन केन्द्र रहते हैं, हर बड़ा नेता इस दिन दही—चूड़ा के भोज का आयोजन करता है। इस दिन को कोहड़ी की सब्जी बनाने की भी परंपरा है। वहीं घरों में आमतौर पर लंच को इस दिन छोड़ दिया जाता है फिर शाम या रात में खिचड़ी बनाई जाती है। खिचड़ी के साथ इसके चार यार भी होते हैं यानि चोखा, पापड़, घी और अचार। इस दिन गुण में काले और सफेद तिल के लड्डू और लाई जिसे मूरी भी कहते हैं, उसके लड्डू बनते हैं। वहीं ब्राह्मणों में अपने जनेऊ बदलने की भी परंपरा है।

बात यूपी की करें तो यहां भी बिहार की तरह ही परंपराएं है। पूर्वी यूपी की ज्यादातर परंपराएं बिहार के पूर्वांचली इलाकों से जुड़े हैं तो। वहीं वेस्टर्न इलाकों में यह परंपरा कमोबेश उसी तरीके से हैं। जिसमें स्नान करना, सूर्य की पूजा और अन्न का दान विशेष है। झारखंड में भी मकर संक्रांति इसी तरीके से मनाई जाती है।

Makar Sankranti

बंगाल की संक्रांति

मकर संक्रांति को पश्चिम बंगाल में पौष संक्रांति भी कहते हैं। क्योंकि यह वह जगह हैं जहां पवित्र गंगा नदी समुद्र में मिलती है इसलिए इस दिन गंगा के अंतिम छोर पर गंगासागर मेले के नाम से धार्मिक मेला लगता है। इस दिन दुनियाभर से लोग गंगा और समुद्र के मिलन स्थान पर आस्था की डुबकी लगाने आते हैं। ऐसा कहा जाता है कि, इसी दिन गंगाजी भगीरथ के पीछे−पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जा मिली थी। इस दिन को बंगाल में स्नान के साथ−साथ दान का महत्व है। इस दिन लोग तिल का दान अवश्य यहां जरूर करते हैं।

वहीं इस दिन खजूर के रस से बने गुड की मिठाइयां भी घरों में बनती हैं। इस दिन देश के पूर्वी क्षेत्र का प्रसिद्ध डिश पिठा भी बनाने की परंपरा है। बंगाल में संक्रांति का यह पर्व तीन दिनों तक होता है। जो संक्रांति के एक दिन पहले शुरू होकर एक दिन बाद खत्म होता है। मकर संक्रांति के दिन यहां मां लक्ष्मी की विशेष पूजा होती है। बंगाल के हिमालयी इलाकों में इस दिन को माघी संक्रांति के नाम से जाना जाता है और यहां भगवान शिव की पूजा होती है।

Makar Sankranti

नार्थ—ईस्ट में मकर संक्रांति

नार्थ—ईस्ट में मकर संक्रांति का एक अलग ही रूप देखने को मिलता है। यहां के असम राज्य में इस दिन को बिहु त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इसे आम तौर पर माघा बिहु या भोगाली बिहु या फिर मगहर दोमाहि नाम से भी जाना जाता है। यह एक फसल आधारित त्योहार होता है जो इस समय के फसल सीजन के महीने में मनाया जाता है। आमतौर पर यह त्योहार 1 सप्ताह तक मनाया जाता है। इस दिन लोगों को दावतों पर बुलाया जाता है और अलाव यानि बॉर्नफायर जलाई जाती है। वहीं युवा इस दिन शिफ्ट हट्स बनाते हैं जिसे मेजी और भेलाघर कहते हैं। ये घर बांस के बनते हैं और इसके धप्पर पत्तों के होते हैं।

इन्हीं घरों में वे त्योहार के दिन बनने वाले पकवानों को बैठकर खाते हैं और सुबह होते ही इन झोपड़ियों को जला देते है। वहीं इस दिन टकेली बोंगा यानि मटका फोड़ने और मैसों की फाइट वाले खेल भी खेले जाते हैं। पहले यह त्योहार पूरे एक महीने का होता था लेकिन अब यह दो दिन का ही होता है। इस दिन असामी लोग सुघा, पिठा, तिल पिठा नाम के पकवान बनाते और लारू और लास्कारा नाम के नारियल से बनने वाली मिठाइयां बनाते हैं।

वहीं अरूणाचल प्रदेश में इस दिन लोहित नदी में स्थित पशुराम कुंड में स्नान करने की परंपरा है। वहीं त्रिपुरा में इस दिन को चकमाघाट पर लोग डुबकी लगाते हैं। वहीं इस दिन महिलाएं पिकनिक भी मनाती हैं, यह पिकनिक उनके अपने हाथों से बनाई गई झोपड़ियों में होती हे जिसे भूरिर घोर कहते हैं। इस दिन यहां पिठा बनता है। वहीं नए साल पर मनाया जाने वाला त्योहार संगाराई भी इसी के आस—पास मनाया जाता है।

Makar Sankranti

दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में मकर संक्रांति

दिल्ली पंजाब और हरियाणा में मुख्य रूप से इस त्योहार को ‘लोहड़ी’ के रूप में मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन से पहले की शाम लकड़ियां इकट्ठा कर लोग इसे जलाते हैं और इसके चारो ओर पारंपरिक नाच गानों का प्रोग्राम होता है। इसके अलावा यादवों, जाटों और कायस्तों में इस दिन को सकरांत के नाम से जाना जाता है। ये लोग इस दिन को साल के सबसे मुख्य त्योंहारों में से मानते हैं। इस दिन इनके घरों में घी में बाजरे का चूरमा, हलवा और खीर बनती है। वहीं इस दिन भाई के अपने बहन के घर गरम कपड़े लेकर जाने की भी परंपरा है। यह परंपरा वेस्टर्न यूपी के भी कुछ हिस्सों में है जहां जाटों की आबादी है। पंजाब में इस दिन श्री मुक्तसर साहिब में मेला लगता है और भांगडा होता है। वहीं यहां के हिन्दू इस दिन तिल के तेल में दिया जलाते हैं जो प्रकाश के फैलने और समृद्धि का प्रतीक है।

उत्तराखंड में होती है मकर संक्रांति की धूम

सूर्य के उत्तरायण होने के पर्व को उत्तराखंड में खूब धूम—धाम से मनाया जाता है। यहां के बघेश्वर में हर साल उत्तरायणी का मेला लगता है। यहां स्नान करने और भगवान शिव को जल देने की परंपरा है। बता दें कि, कई लोग तीन दिनों तक इस काम को करते हैं इसे ‘त्रीमाघी’ कहते हैं। उत्तरायणी के दिन को घुघुति नाम से कुमाऊंन में जानते हैं। इस पर्व में काले कौंओं को भोजन कराने की परंपरा है।

महाराष्ट्र, गोवा, मध्यप्रदेश, गुजरात और ओडिशा में मकर संक्रांति

महाराष्ट्र, गोवा मध्यप्रदेश गुजरात और ओडिशा में मकर संक्रांति का त्योहार भारत के अन्य हिस्सों के जैसे ही मनाई जाती है। लेकिन थोड़े बहुत डिफरेन्स देखने को मिलते हैं। जैसे की महाराष्ट्र और गोवा में इस दिन से हल्दी—कुमकुम का त्योहार शुरू होता है, इस दिन महिलाएं ब्लैक साड़ी पहनती है और एक दूसरे के घर जाकर उनके माथे पर हल्दी—कुमकुम लगाती हैं। वहीं गुजरात में यह दो दिनों का फैस्टिवल होता है। दोनों दिन लोग पर ज्यादात्तर समय छतों पर पतंग बाजी करने में बिताते हैं। वहीं उडीसा में एक अलग परंपरा दोस्ती से जुड़ी हुई है। इस दिन को दोस्ती करने के रूप में देखा जाता है इसके लिए महिला और पुरूष अपने दोस्तों के हाथों पर धागे बांधते हैं। जिसके बाद वे साल भर एक दूसरे को उनके नाम से नहीं बुलाते, लड़के अपने दोस्तों को मरसद और लड़कियां मकर कहकर पुकारते हैं। वहीं बात मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी पतंगबाजी की परंपरा है वही यहां शादी-शुदा महिलाएं 13 शादी—शुदा महिलाओं को खाने—पीने की चीजें देती हैं। 

साउथ की मकर संक्रांति कैसी होती है?

साउथ की मकर संक्रांति बेहद अलग और खास होती है। तमिलनाडू और आंध्रप्रदेश एवं तेलंगाना में यह त्योहार चार दिनों तक चलता है। यहीं नहीं इन त्योहारों के नाम भी अलग ही होते हैं।

कर्नाटक :—

कर्नाटक में इसे सुग्गी त्योहार कहा जाता है। इस दिन ‘ऐल्ला बिरोधू’ नाम की एक परंपरा निभाई जाती है। जिसमें लड़कियां एक दूसरे के घर तिल, ग्राउंड नट्स, गुण से बना एक डीश आपस में शेयर करती हैं। वही यहां एक परंपरा है जिसमें इस दिन गायों को कलर किया जाता है और उसे आग को पार कराया जाता हैं इसे ‘किछु हयसुवडु’ कहते हैं।

तमिलनाडू :— 

बात तमिलनाडू की करें तो यहां यहां इसे ‘पोंगल’ के नाम से जाना जाता है। भारत की कई जगहों की तरह यहां भी यह फसलों से जुड़ा हुआ त्योहार है जो सूरज की पूजा से जुड़ा है। तमिल लैंण्ड में यह त्योहार चार दिनो तक मनाया जाता है। पहले दिन को भोगी पंडीगाई कहते हैं, इस दिन लोग पुराने कपड़ों को जला देते हैं या उसे किसी तरह से खत्म कर देते हैं। वहीं घरों पर नीम के पत्ते लगाए जाते हैं। दूसरे दिन को थाई पोंगल कहते हैं, इस दिन को त्योहार के मुख्य दिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नए चावल को उबाला जाता है ओर सूर्य को अर्पित किया जाता है। इसी दिन को वदाई, मुरूक्कू, प्यासम जैसी मिठाइयां बनाई जाती है। तीसरे दिन को माटू पोंगल कहते हैं, इस दिन पशुओं की पूजा होती है। जली कट्टू का खेल इसी दिन होता है। वहीं चौथे दिन को कानूम पोंगल कहते हैं, इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों के घर घूमने और उनसे मिलने जाते हैं, वहीं घरों के आगे कोलम बनाएं जाते हैं जो एक तरह की रंगोली ही होती है।

Makar Sankranti

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना :

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में भी यह त्योहार 4 दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन को भोघी कहते हैं। इस दिन को लोग पुरानी और बेकार की चींजों को जला देते हैं। दूसरा दिन त्योहार का मेन दिन होता है। इसे मकारा कहते हैं। इस दिन लोग पूजा—पाठ करते हैं और घरों के आगे रंगोली या मग्गू बनाते हैं। खाने में इस दिन चेक्कालू, चाकरालू, अरिसालू, बोरालू, पूरनालू, बूंदी मिठाई आदि बनाते हैं। तीसरे दिन को कनूमा नाम से जानते हैं। यह दिन पशुओं को समर्पित होता है। चौथे दिन को मुक्कानुमा कहते हैं और इस दिन को शकाहार दिन माना जाता है। लोग जल, जंगल, जमीन, हवा, पानी, आग की पूजा करते हैं।

केरल : केरल में इस दिन सबरीमाला मंदिर में त्योहार मनाया जाता है और मकर ज्योत, यानि कैपरिकॉन तारे को देखने की परंपरा है।

इस तरह से भारत में अलग—अलग तरीके से मकर संक्रांति के इस त्योहार को मनाने की कई विधियों और परंपराओं को हम देश के कई हिस्सों में देखते हैं। असल में त्योहार तो एक ही है पर इसे मनाने के तरीके सबके अलग—अलग हैं। यहीं भारतीय संस्कृति की पहचान है जो ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ के कथन पर चलता है।

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