भारत से लेकर चीन के बीच की एक कल्चरल कहानी

चाइनीज फिल्मों में एक चीज बेहद कॉमन होती है और वो है ताबड़तोड़ मार्शल आर्ट वाली तकनीक। जो देखने में तो अच्छा लगता ही है साथ ही हमारे ऊपर उसका ऐसा प्रभाव पड़ता है कि, हम रियल लाइफ में भी चाहते हैं कि, यह कूंग—फू या मार्शल आर्ट की तकनीक हम भी जाने। लेकिन जब भी बात वैसी पढ़ाई की आती है तो बस चाइना जाने के अलावा और कोई चारा नहीं दिखता। क्योंकि शाओलिन मोनेस्ट्री या शाओलिन टेंम्पल जहां से यह सब शुरू हुआ था उसके पास ही उस तकनीक को दुनिया में कहीं भी सिखाने का एकाधिकार है या यूं कहें कि, वहां से अगर सर्टिफिकेट मिलता है तभी आप इस टेकनिक के असली मास्टर कहे जाएंगे। लेकिन शाओलिन और वहां के कूंग—फू का भारत से एक गहरा नाता है। यूएन के वर्ल्ड हेरिटेज साइटों में शामिल चीन का शाओलिन टेंपल को चीन में भारत के ही एक Buddhist Monk ने बनवाया था। उस भिक्षु का नाम था ‘बोधिधर्मा या बोधिधरमन’।

Shaolin Temple का इंडिया से है ऐतिहासिक रिश्ता

कहा जाता है कि, बोधिधर्मा साउथ भारत के उस समय के पल्लवाज राजा के तीसरे बेटे थे जिनकी मान्यता महायान बुद्धिज्म में थी। वे जब चीन पहुंचे तो यहां के शाओलिन के जंगलों में उन्होनें सबसे पहले शाओलिन मोनेस्ट्री या टेंपल की स्थापना की। जहां उन्होंने बौद्ध धर्म के चान परंपरा की शुरूआत की। इस टेंपल में बोधिधर्मा ने भिक्षुओं के फिजिकल फिटनेस के लिए उन्हें कुछ एक्सरसाइज के बारे में बताया जिसे ‘यिजिन जिंग’ कहा जाता है, इसे आज तक फॉलो किया जाता है और यहीं आगे चलकर शाओलिन कूंग—फू के नाम से जाना गया। बोधिधर्मा की ओर से दी गई यह फिजिकिल ट्रेनिग आश्रम के सुरक्षा के काम में भी आई, कयोंकि उस दौर में कई बार शाओलिन टेंपल पर अटैक हुए थे जिसमें इसे तोड़ दिया गया था। लेकिन बोधिधर्मा की फिजिकल ट्रेनिंग का ही नतिजा था कि, यहां के बोद्ध भिक्षु हमेशा आक्रमणकारियों से लोहा लेते थे।

Shaolin Temple

जो ज्ञान भारत से चीन गया वो ज्ञान चीन में खूब फला—फूला लेकिन भारत में बुद्धिज्म के अंत के साथ ही यह ज्ञान लोगों के बीच से जाता रहा। ऐसे में हम आज सोचते हैं कि शाओलिन शुद्ध चाइनिज तकनीक है जसका ईजाद चाइना में हुआ और कूंग—फू का नाम सूनते ही हमारे दिमाग में जैकी चेन और ब्रूसली की तस्वीर सामने होती है। लेकिन कभी भारत से चीन पहुंची यह फिजिकल फिटनेस की तकनीक आज फिर भारत पहुंची है। जिसे सिखने के लिए आज दुनिया भर से लोग भारत के ‘शाओलिन गुरूकुल’ में पहुंचते हैं। शाओलिन टेंपल और भारत की गुरूकुल में एक बात जो सेम—सेम दिखती है वो है यहां कि गुरू—शिष्य वाली परंपरा। बोधिधर्मा के अलावा चीन और भारत का यह एक दूसरा भी कनेक्शन है। 

Shaolin Temple से Shaolin Gurukul की पूरी कहानी

शाओलिन गुरूकुल भारत में एकलौता गुरूकुल है जहां आपको शाओलीन कूंग फू की तकनीक सीखने का मौका मिलता है। यह गुरूकुल नैनीताल में स्थित है जिसे चलाते हैं शिफू कनिष्क शर्मा। इस गुरूकुल की बेवसाइट की माने तो यह भारत की एकलौती शाओलिन तकनीक सिखाने वाली संस्था है जिसे चीन के शाओलिन टेंपल के मठाधीश Shi Yong Xin से चलाने की मान्यता मिली हुई है। शाओलीन मार्शल आर्ट को भारत लेकर आने से पहले शिफू कनिष्क शर्मा ने खुद 15 सालों तक इसकी पूरी ट्रेनिंग वहां के शाओलिन टेंपल में ली है। शाओलिन सीखने की अपनी चाह के बारे में बताते हुए कनिष्क कहते है कि, कूंग—फू को लेकर उनकी चाह तब बढ़ी जब उनके ड्राइवर ने उन्हें एक फिल्म दिखाई थी। कनिष्क कहते हैं कि, इसके बाद ही उन्होंने शाओलिन जाने की बात मन में ठानी थी। लेकिन तब ऐसा नहीं था कि, भारत में आकर मुझे शाओलिन मास्टर बनना है।

Shaolin Temple

हर दिन आठ घंटे तक कनिष्क ने एक ऐसी जगह पर ट्रेनिंग ली जहां की भाषा उनकी जान पहचान की नहीं थी ना ही जहां का क्लाइमेट भी उनके हिसाब का नहीं था और न ही वो देश ही उनका अपना था। हर दिन आठ घंटे कठोर शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक प्रशिक्षण उन्हें लेना पड़ता था। शाओलिन मंदिर का आधिकारिक शिष्य बनने के बाद कनिष्क ने शाओलिन के संदेश को फैलाने के लिए दुनिया की यात्रा की और कई तरह के मार्शल आर्ट में महारत हासिल की, जिसमें कूंग फू से लेकर कराटे और भारत के कालरीपयथु भी शामिल है। उन्होंने कई फिल्मी हीरो जैसे कि अक्षय कुमार, अनिल कपूर, संजय दत्त, माधुरी दीक्षित को ट्रेनिंग भी दी है।

भारत आने के बाद कनिष्क ने नैनीताल में एक शाओलिन गुरूकुल की स्थापना की। आज यह गुरूकुल कूंग—फू का इंटरनेशनल स्टडी हब बन रहा है। दुनिया भर से लोग यहां शाओलिन सीखने के लिए आज इंडिया में आ रहे हैं। असल में कहें तो शाओलिन टेंपल जिसे कभी भारत से गए बोधिधर्मा ने बसाया था और शाओलिन कूंग फू को शुरू किया था उस शाओलिन टेंपल से इस पद्धति को सीख कर कनिष्क आज भारत लेकर आए हैं। असल में यह एक इंडिजिनियस कल्चर का फिर से इंडिया में कमबैक है।

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