भारत में यहां के लोग पहनते हैं उल्टी घड़ियां, इसके पीछे है कड़ा संदेश

काश समय उल्टा चल पड़ता! यह हर इंसान सोचता है। कई बार तो हम इस सोच में घर की घड़ी को भी उल्टा घुमाने लगते हैं। हां वहीं घड़ी जिसे समय का पता लगाने के लिए हम अपनी कलाई पर बांधते हैं या घरों की दीवार पर टांगते हैं। इस घड़ी में तीन सुईयां होती हैं और तीनों ही एक डायरेक्शन में घूमती हैं और इस तरह से हमें पता चलता है कि, आज के दिन के 24 घंटे समाप्त हो गए। घड़ी की सूई जिस डायरेक्शन में घूमती है उसे क्लॉकवाइज और उसके उलट वाले डायरेक्शन को एंटी-क्लॉकवाइज कहते हैं। लेकिन सोचिए कि, अगर घड़ी की सुई उल्टी घूमने लगे तो, या फिर एक नहीं बल्कि सारी की सारी घड़ियों की सुईयां उल्टे डायरेक्शन में चलें तो, उस डायरेक्शन को क्या कहेंगे क्लॉकवाइज या एंटी क्लॉकवाइज? 

Anti-Clock

Anti-Clock – इन जगहों के लोग पहनते हैं उल्टी चलने वाली घड़ियां

आपमें से बहुत लोग सोच रहे होंगे कि, आखिर हम कहना क्या चाहते हैं या कइयों को अंग्रेजी फिल्म ‘द क्यूरियस केस ऑफ बेंजामिन बटन’ का वो सीन याद आ गया होगा जिसमें दीवार पर एक घड़ी है जो दुनिया की घड़ी के ठीक उल्टी है। सुई भी उल्टी घूमती है और नंबर भी उल्टे हैं, लेकिन टाइम बिल्कुल सही है। हालांकि यह तो सिर्फ एक डायरेक्टर का इमेजिनेशन भर था। लेकिन क्या ऐसा सही में हो सकता है। मतलब क्या ऐसा हो सकता है कि, दुनिया में ऐसी घड़ियां हो जो उल्टी चलती हैं। या कोई ऐसा गांव या शहर हो सकता है जहां के लोग ऐसी ही घड़ियां यूज करते हों? क्यों सोच में पड़ गए न, तो ज्यादा मत सोचिए आप इंडिया में हैं। दुनिया की हर अनोखी चीज यहां मिलती है। हमारे देश में एक राज्य है छत्तीसगढ़, इसी सूबे में एक गांव ऐसा है जहां एक नहीं, दो नहीं, बल्कि पूरे के पूरे गांव में उल्टी चलने वाली घड़ियां दीवारों पर टंगी हुई दिखेंगी।

आमतौर पर जिन घड़ियों का इस्तेमाल हम और आप करते हैं उनके कांटे बाईं से दाईं ओर घूमते हैं लेकिन छत्तीसगढ़ के कोरबा, कोरिया, सरगुजा, बिलासपुर और जशपुर ज़िलों में आदिवासी कई सालों से उल्टी दिशा में चलने वाली घड़ी का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इन घड़ियों के कांटे दाईं से बाईं ओर घूमते हैं। यह परंपरा यहां से शुरू हुई और आज मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में लोकप्रिय हो चुकी है। गुजरात में कई जगहों पर इन घड़ियों को स्पेशियली बनाने के लिए फैक्ट्रियां भी हैं। इन जगहों पर इन घड़ियों का चलन कब से बढ़ा इस बात की कोई सही जानकारी नहीं है। लेकिन कहते हैं कि, जब आदिवासी इलाकों में गोंडवाना आंदोलन ने जोर पकड़ा तो उसी दौरान इन घड़ियों को लोगों के बीच बांटा गया था, इसके बाद से ही आदिवासी समाज इन घड़ियों को यूज कर रहे हैं। ये लोग बताते हैं कि पहले तो थोड़ी दिक्कत हुई लेकिन आज ऐसा हो गया कि इनके लिए इस घड़ी के अलावा दूसरी किसी घड़ियों में टाइम का पता लगाना मुश्किल होता है।

Anti-Clock- क्या है इन घड़ियों के उल्टे चलने की थ्योरी

घड़ियों के उल्टे चलने की बात तो आपने जान ली। लेकिन अब यह भी जान लीजिए कि, यह घड़ियां उल्टी क्यों चलती हैं। इन घड़ियों को पहनने वाले और इसका प्रचार प्रसार करने वाले लोगों के पास इसे लेकर एक थ्योरी है। जिसे सुनकर पहले तो आप कहेंगे कि, क्या बेकार की बात है। लेकिन असल में जब बात की गहराई में जाएंगे तो आपके पास इनके थ्योरी को काटने का कोई सही तर्क नहीं होगा।

Anti-Clock

दरअसल इस घड़ी को लेकर गोंडवाना आदिवासियों का मानना है कि, उनकी ही घड़ी सही घड़ी है, जो दुनिया के अनुसार चलती है। ये लोग तर्क देते हैं कि, दुनिया की हर चीज राइट टू लेफ्ट है, यह पूरा ब्रह्मांड, इसमें बसे सूरज और तारे यह सब राइट टू लेफ्ट ही घूमते हैं, हमारी धरती और ज्यादातर ग्रह भी इसी दिशा में घूमते हैं। इन लोगों का तर्क है कि, नेचर में सारे काम दाईं से बाईं डायरेक्शन में होते हैं। यहां तक की खेती के लिये चलाये जाने वाले हल-बैल भी जुताई के लिए दाएं से बाएं ही घूमते हैं। जंगलों में लताएं दाईं से बाईं ओर ही घूमती हुई बढ़ती हैं,  खेत-खलिहानों की लिपाई-पुताई, अनाजों को पीसने वाली हाथ चक्की, विवाह और मृत्यु के समय लिए जाने वाले फेरे, यह सब कुछ दाएं से बाएं ओर होते हैं। ऐसे में दाईं से बाईं दिशा में घूमने वाली घड़ी गलत कैसे होगी? वे कहते हैं कि यह घड़ी ही प्राकृतिक घड़ी है। कई लोग तो सिंधु घाटी की लिपि तक का जिक्र कर देते हैं।

बहुत बड़ा संदेश छुपा है इन घड़ियों में

आप भले इन घड़ियों को लेकर कुछ भी सोचें, लेकिन आदिवासियों के लिए यह घड़ियां उनका कल्चर हैं। वे मानते हैं कि, आदिवासी प्रकृति के नजदीक हैं और प्रकृति के हिसाब से ही इंसानों को चलना चाहिए। असल में यह घड़ियां दुनिया के लिए एक संदेश हैं कि, अगर धरती पर इंसानों के फेवरेबल चल रहे टाइम को बनाये रखना है तो नेचर के हिसाब से ही दुनिया के लोगों को जीना होगा। नहीं तो नेचर की उल्टी दिशा में जाने में दुनिया के साथ ही इंसानों के लिए भी दिक्कतें बढ़ जाएंगे, जैसा कि हाल में ग्लोबल वार्मिंग जैसा खतरा हमारे सामने हैं। असल में दुनिया की घड़ियों के अपोजिट डायरेक्शन में चलने वाली ये घड़ियां समय नहीं बल्कि हमारे फ्यूचर टाइम के प्रॉब्लम के संकेत और इसके प्रति सतर्क होने का संदेश दे रही हैं।

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