Bru tribes : कौन हैं ये लोग और आखिर कैसे भारत में बन गए ये शरणार्थी

ब्रू जनजाति.. इनके बारे में क्या जानते हैं आप? यह जनजाति भारत में शरणार्थी है। लेकिन आज इनके बारे में अचनाक मीडिया में खबरें आ रही हैं। क्योंकि भारत सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने इस जनजाति के लोगों को बसाने का फैसला लिया है। क्रेंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और त्रिपुरा के ब्रू शरणार्थियों के प्रतिनिधियों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत ब्रू शरणार्थी की समस्या का समाधान किया गया है। सरकार ने त्रिपुरा में लगभग 30,000 ब्रू शरणार्थियों को बसाने का फैसला लिया है। इसके लिए वो 600 करोड़ रुपये खर्च करेगी। अब इस खबर के बाद आप सोच रहे होंगे कि, सीएए में तो इस जनजाति का कोई जिक्र नहीं है। फिर यह कैसे कर दिया अमित शाह ने। तो आपको बता दें कि, यह मामला सीएए से नहीं जुड़ा हुआ। जी हममें से कई लोग 30 साल पुराने कश्मीरी पंडितों के पलायन की कहानी तो जानते हैं, लेकिन हममें से ज्यादात्तर लोग ब्रू जनजाति के पलायन की कहानी नहीं जानते। यह जनजाति कहीं बाहर की नहीं है। यह भारत के ही लोग हैं जिन्हें कश्मीरी पंडितों की तरह ही, अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह जिंदगी गुजारनी पड़ रही है।

Bru tribes

Bru tribes का इतिहास

ब्रू जनजाति के लोग आखिर अपने ही देश में शरणार्थी कैसे बने इस बारे में जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि, ये लोग कौन है और भारत के किस हिस्से में रहते आ रहे थे, जहां से इन्हें भगा दिया गया? ब्रू जनजाति के लोग भारत के नार्थ—ईस्ट हिस्से में लगभग हर जगह फैले हुए हैं। लेकिन मुख्यरुप से ये लोग असम, मिज़ोरम और त्रिपुरा में रहते आ रहे हैं। इन्हें रेयांग के नाम भी जाना जाता है। किवदंतियों पर अगर विश्वार करें तो माना जाता है कि, त्रिपुरा का एक राजकुमार था,  जिसे राज्य से निकाल दिया गया था। जिसके कारण वो अपने कुछ सर्मथकों के संग मिज़ोरम में जाकर बस गया। वहां उसने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। यह राज्य लुसाई हिल्स के पास के मायानी थालांग के इलाके में था। ब्रू समुदाय के पूर्वज उसी राजकुमार के समर्थक थे।

जैसा कि, कभी-कभी होता है, एक समय ऐसा आया कि, राजगद्दी पर बैठने के लिए उत्तराधिकारी ही नहीं हुआ। लगभग इसी समय यहां कुछ झगड़े और आंतरिक प्रतिशोध इस जनजाति के भीतर हुए। इन जनजातियों की चार उपजातियों ट्विकुलुहा, योंगसिका, पैइसिका, तुइब्रुहा ने त्रिपुरा राज्य की ओर वापस पलायन करने की सोची जो कि, एक लंबी और कठिन यात्रा थी। वे लोग यहां के अपने घर—बार छोड़ कर त्रिपुरा जाने के लिए प्रयास करने लगे और डोम्बुर पहाड़ी पर सफलतापूर्वक अपना रास्ता बना लिया। उस समय महेंद्र माणिक्य का राज त्रिपुरा में था। प्रमुखों ने शरण मांगने के लिए राजा तक पहुंचने के कई प्रयास किए। वे राजा के साथ बैठक की व्यवस्था में मदद के लिए मंत्रियों, नौकरशाहों और दरबारियों के पास पहुंचे, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

इस प्रयास में उनका रसद भी खत्म हो गया था। लेकिन राजा का ध्यान अभी भी उनकी ओर नहीं आया था। अंत में हताश होकर उन्होंने गुमटी नदी के बांध को तोड़ दिया, जहां पूजा करने के लिए लागे इकट्ठा होते थे। यह एक गंभीर अपराध था और उन सभी को तुरंत पकड़ लिया गया और राजा के सामने लाया गया। अपराध गंभीर था तो उनको मृत्युदंड दिया गया। लेकिन राजा के आदेश से पहले ही ये लोग रानी गनोबोटी तक अपनी बात पहुंचाने में कामयाब हो गए। रानी ने राजा से उन्हें माफ करने को कहा। जिसके बाद इन लोगों को माफी मिली और रिगन यानी ब्रू लोगों ने रानी और राजा के सामने शपथ लेकर राज्य में बसने की अनुमति ले ली। ऐसा कहा जाता है कि, रानी ने ब्रास के एक पैन में इन लोगों को अपना दूध दिया था। जिससे उन्होंने यह विश्वास दिलाया था कि, आज से ये लोग उनकी संतान हैं। वहीं रानी की ओर से मिली कई अन्य चीजों को आज तक इस जनजाति ने संभाल कर रखा हुआ है।

Bru tribes का कल्चर और धर्म

ब्रू या रियांग लोगों के के बारे में कहा जाता हैं कि, ये लोग ‘वैष्णव’ संप्रदाय से आते हैं और खुद को क्षत्रिय कुल का मानते हैं। लेकिन आज की डेट में इस समुदाय के लोग क्रिश्चन धर्म को भी फॉलो कर रहे हैं। जिनकी अच्छी खासी तादाद है। त्रिपुरा के बाकी समुदायों की तरह ही ये लोग भी पॉलिथीसीस है मतलब बहुत से भगवानों में विश्वास करते हैं। वहीं इनके मुख्य त्योहार भी वहीं है जो त्रिपुरा में बाकी कम्यूनिटी के लोग मनाते हैं जैसे कि, बुइसी, केर, गोंगा, गोंगा मताई, गोरिया, चित्रागुपरा, होजागिरी, कतांगी पूजा, लंपरा इत्यादि। वहीं इन लोगों के बीच लक्ष्मी पूजा भी काफी फेमस है।

ये सारे त्योहार जनजाति की चीफ के मीटिंग के बाद ही मनाए जाते हैं। इस दौरान समाज के विकास को लेकर पॉलिटिकल, सोशल ओर धार्मिक मामलों पर चर्चा भी होती है। त्योहारों के रिचुअल्स एकदम त्रिपुरा के दूसरे ट्राइब्स के जैसी ही है। एक बांस को देवता का रूप माना जाता हैं, जिसके आगे कई तरह के जानवरों जैसे कि, बकरी, सुअर, तीतर इत्यादि। पूजा की जगह मुख्य रूप से गांव से बाहर कुछ दूरी पर होता है।

ये लोग ब्रू भाषा बोलते हैं जिसे स्थानीय तौर पर कौआ ब्रू कहते हैं। दूसरे त्रिपुरा वासियों की तरह ही इनका ट्रडिशनल ड्रेस प्लेन होता है। ये लोग हाथों से बुनी हुई लॉयन क्लोथ पहनते हैं और एक कपड़े को ये शरीर के ऊपरी हिस्से पर बांधते हैं। वहीं महिलाएं मनआई नाम का एक लंबा कपड़ा पहनती हैं और रसा नाम का कपड़ा ससीना ढ़कने और रिकटू नाम के कपड़े से शरीर के ऊपरी हिस्से को ढ़कती हैं। हालांकि अब मॉडर्निटी के कारण ज्यादात्तर लोग अपने पारंपरिक कपड़ों में दिखाई नहीं देते।

Bru tribes

क्यों शरणार्थी बन गए ये लोग?

मिजोरम को मुख्यरूप से मिजो जनजातियों का घर माना जाता है। लेकिन यहां ब्रू जनजाती के लोग भी कई सदियों से रहते हुए आ रहे थे। लेकिन 23 साल पहले यहां कुछ हुआ और ब्रु लोगों को पलायन करना पड़ा। दरअसल यह बात तो हम सब जानते हैं कि नार्थ—ईस्ट में जनजातियां अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए अक्सर आंदोलन करती हैं। जैसे की बोडो लैंण्ड की मां गाक लेर बोडो लोग करते हैं। वैसे ही कभी मिजोरम में हुआ था। मिजो लोगों ने अपना कब्जा बनाए रखने के उग्रवाद के जरिए यहां की कई दूसरी जनजातियों को निशाना बनाया, जिन्हे वे बाहरी समझते थे। साल 1995 में यंग मिजो एसोसिएशन और मिजो स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने ब्रू जनजाति को बाहरी घोषित कर दिया। मिज़ो स्टूडेंट्स एसोसिएशन यह मांग रखी कि ब्रू लोगों के नाम राज्य की मतदाता सूची से हटाए जाए क्योंकि वे मूल रूप से मिज़ोरम के निवासी नहीं हैं। जिसके बाद इन लोगों के खिलाफ मिजों को हिंसात्मक रूख दिखने लगा। साल 1997 के अक्टूबर महिने में ब्रू लोगों के खिलाफ मिजों उग्रवादियों ने जमकर हिंसा की। जिसमें दर्जनों गावों के सैकड़ों घर जला दिए गए।

इस घटना के बाद करीब 37 हजार ब्रू लोगों को मिज़ोरम छोड़ना पड़ा। जिसके बाद इन लोगों को त्रिपुरा में शरणार्थी शिविरों में रखा गया। तब से अभी तक लगभग 5,000 ब्रू लोग वापस मिज़ोरम लौटे लेकिन बाकी लोग वापस नहीं गए। ये लोग केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली राहत सामग्री के तहत गुजारा कर रहे हैं। स्थाई निवास न होने की वजह से उनके पास आधार कार्ड, वोटर आईडी तथा राशन कार्ड आदि नहीं हैं। इसकी वजह से उन्हें घर, बिजली, स्वच्छ पानी, अस्पताल तथा बच्चों के लिये स्कूल जैसी कई बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहना होता है।

साल 2018 में ब्रू समुदाय के नेताओं ने केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा दो राज्य सरकारों (त्रिपुरा व मिज़ोरम) के साथ दिल्ली में एक समझौता किया। इसके अनुसार, केंद्र सरकार ने ब्रू जनजातियों के पुनर्वास के लिये आर्थिक मदद तथा घर निर्माण के लिए ज़मीन देना स्वीकार किया। साथ ही इस समुदाय को झूम खेती करने की अनुमति, बैंक अकाउंट, राशन कार्ड, आधार कार्ड, अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र आदि देना भी तय हुआ। जिसके बाद केवल 5,000 लोग ही वापस गए। इन लोगों ने कहा कि यह समझौता हमारी सिक्योरिटी को सुनिश्चित नहीं करता है। इन्होंने सुरक्षा के साथ ही मांग रखी की इन्हें एक साथ समूहों में ही बसाया जाए।

अब सरकार से समझौता हुआ है?

लेकिन अब सरकार के संग हुए ब्रू लोगों के समझौते से इस समस्या का स्थाई हल हो गया हैं। इसके जरिए सरकार करीब 34000 परिवारों को त्रिपुरा में ही बसाएगी। सरकार उन्हे फाइनेसियली तौर पर हैल्प करेंगी इसके लिए 600 करोड़ रूपये भी खर्च करेगी। सरकार हर परिवार को दो सालों तक 5000 रूपये महिना और घर बनाने के लिए 40 गुणा 30 स्क्वॉयर फीट की जमीन के साथ ही 1.5 लाख रूपये देगी।

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