बोल्ट का रिकॉर्ड तोड़ने वाले ‘श्रीनिवास’ और ‘कंबाला रेस’

रफ्तार किसे पसंद नहीं है, हर कोई अपनी लाइफ में रफ्तार चाहता है। लेकिन जब बात खेल की आती है तो रफ्तार का सीधा संबंध होता है दौड़ से। दौड़ना हर कोई चाहता है, लेकिन रनिंग ट्रैक पर दौड़ना.. वो भी सबसे तेज, तो भैया बड़े-बड़े पिछूवा जाते हैं। क्योंकि इस सब में तो एक ही नाम सबसे आगे है और वो है ‘उसेन बोल्ट’। बोल्ट तो जैसे आज के युग में तेज दौड़ने का पर्याय बन गए है। उनसे तेज कोई दौड़ ही नहीं सकता। उन्होंने तो कई रिकॉर्ड बनाए हैं लेकिन उसे कोई तोड़ ही नहीं पाया है। लेकिन पिछले कई दिनों से एक बात सोशल मीडिया में छाई हुई है। यह चर्चा भी बोल्ट से जुड़ी है लेकिन चर्चा का केन्द्र बोल्ट नहीं बल्कि कर्नाटक का एक युवा है। दावा है कि, इस शख्स ने दौड़ने के मामले में उसेन बोल्ट का इंटरनेशनल रिकॉर्ड तोड़ दिया है। हालांकि यह किसी ओलंपिक रेस या किसी राष्ट्रीय दौड़ की बात नहीं है, यह कारनामा एक पारंपरिक खेल के दौरान हुआ है। तो चलिए इस दावे के बारे में और इस खेल के बारे में जानते हैं जहां एक नहीं कई ‘उसेन बोल्ट’ सदियो से हिस्सा लेते आ रहे हैं।

कर्नाटक के श्रीनिवास जो दौड़ते है बोल्ट से भी तेज

ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया पर इन दिनों कर्नाटक के एक गांव के युवा की चर्चा है जिनका नाम है श्रीनिवास गौड़ा। श्रीनिवास कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के मोडाबिद्री इलाके के रहने वाले हैं। ट्विटर यूजर्स के दावे की माने, तो श्रीनिवास ने एक पारंपरिक दौड़ वाले खेल (जिसे भैंसों की दौड़ कहा जाता है) में उसेन बोल्ट का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। दरअसल, ये पारंपरिक दौड़ लगभग 142.50 मीटर की थी। जिसमें 28 वर्षीय श्रीनिवास गौड़ा ने भैसों के संग दौड़ लगाते हुए 13.62 सेकंड में दौड़ को पूरा कर लिया। उनकी इस रफ्तार ने 30 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। इतने कम समय में दौड़ लगाकर वो कर्नाटक के इस पारंपरिक खेल में अब तक के सबसे तेज दौड़ने वाले धावक बन गए हैं। ऐसे में ट्विटर यूजर्स दावा कर रहे हैं कि, श्रीनिवास ने इस दौड़ में 142.50 मीटर की दूरी 13.62 सेकंड में पूरी की। इसका मतलब हुआ कि, उसने 100 मीटर की दूरी सिर्फ और सिर्फ 9.55 सेकंड में पूरी की। जो उसेन बोल्ट के इंटरनेशनल रिकॉर्ड 9.58 से कम भी कम है। यूर्जस दावा कर रहे हैं कि, श्रीनिवास ने बोल्ट का रिकॉर्ड तोड़ा है।

कंबाला रेस

श्रीनिवास के इस कारनामें के बाद मांग उठ रही है कि, उन्हें ओलंपिक में भेजा जाए। वहीं आनंद महिन्द्रा ने भी इस बारे में ट्वीट कर श्रीनिवास को आलंपिक के लिए तैयार करने की गुजारिश सरकार से की। उनके ट्विटर पर खेल मंत्री किरण रिज्जू ने लिखा कि, वे जल्द ही श्रीनिवास से बात करेंगे। वे सुनिश्चित करेंगे कि, भारत का कोई भी टैलेंट पीछे न छूट जाए। वहीं जब इस बारे में मीडिया ने खुद श्रीनिवास से बात की तो उन्होंने शुक्रिया तो अदा किया ही लेकिन उसेन बोल्ट से उनकी तुलना पर बहुत ही हंबल होते हुए कहा कि — उसेन बोल्ट तो वर्ल्ड चैम्पियन हैं और मैं तो केवल कीचड़ वाले खेतों में दौड़ता हूं।’

कितना पॉपुलर स्पोर्ट है कंबाला रेस

श्रीनिवास जिस पारंपरिक खेल में हिस्सा लेते हैं उसे लोग कंबाला नाम से जानते हैं और रेसर के तौर पर उनको कहा जाता है कंबाला जॉकी। श्रीनिवास के एजुकेशन की बात करें तो वे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं। स्कूल में ही पढ़ाई छूट गई और इसके बाद वो मजदूरी में लग गए। लेकिन इसी बीच उनका इंट्रेस्ट बढ़ा पारंपरिक रेस कंबाला में और श्रीनिवास ने करीब 6 साल पहले इसमें शामिल होने का निर्णय लिया और खुद को तैयार करना शुरू कर दिया। यह रेस कितनी पॉपुलर है इसके बारे में अंदाजा इसी से आप लगा सकते हैं कि, एक कंबाला जॉकी को भैंसों को ट्रेनिंग देने और एक सत्र में दौड़ में हिस्सा लेने के लिए 1-2 लाख रुपए मिलते हैं। अगर कोई कंबाला जॉकी पुरस्कार जीतता है तो भैंसों के मालिक उन्हें नकद इनाम भी देते हैं। भैंसों के साथ दौड़ऩे वाले जॉकी के लिए कंबाला अकादमी भी बने हैं जहां इन्हें फ्री में ट्रेनिंग दी जाती है।

इस साल के कंबाला दौड़ में श्रीनिवास तीन भैंसों के जोड़े के संग मैदान में उतरे थे। वे बातते हैं कि, इन तीनो भैसों के मालिक अलग—अलग हैं। श्रीनिवास ने बताया कि उन्होंने इस सत्र के शुरू होने के 4 सप्ताह पहले ही अपनी भैंसों को ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया था और जब ऐकला गांव में रेस हुई तो 30 साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़ दिया। श्रीनिवास से पहले अलादनगाडी ने सबसे कम मिनट में रेस पूरा करने का रिकॉर्ड बनाया था। श्रीनिवास की काबिलियत आप इसी से समझ सकते हैं कि इस साल की प्रतियोगिता में उन्होंने 12 दौड़ में हिस्सा लिया है और 29 अवार्ड अपने नाम किए। यह भी इस खेल का एक यूनिक रिकॉर्ड है जो उनके नाम पर है।

ये कंबाला रेस क्या है?

नवंबर से मार्च महीने के बीच कर्नाटक में भैंसों की सालाना दौड़ होती है इसी को ‘कंबाला रेस’ के नाम से जाना जाता है। यह खेल कर्नाटक के उस हिस्से में ज्यादा होता है जो केरल से सटे हुए हैं। दक्षिण कन्नड़ और उडुपी में इसका बहुत क्रेज है। इन पांच महीनों में कर्नाटक के अलग—अलग हिस्सों में इस खेल को आयोजित किया जाता है। पहले तो रेस जीतने वाले कंबाली जॉकी को नारियल अवॉर्ड के तौर पर दिया जाता था लेकिन वक्त बदला समय बदला और अब गोल्ड मेडल और ट्रॉफी ने नारियल को रिप्लेस कर दिया है। वहीं खेल के नियम भी पहले से आधुनिक हो गए हैं। कीचड़ से सने ट्रैक पर होने वाली इस रेस के लिए कई अंपायर होते हैं। दौड़ में वीडियो रेफरल की भी सुविधा होती है। पूरे साल में 45 से ज्यादा कंबाला रेस ऑर्गनाइज किए जाते हैं।

कंबाला पारंपरिक रूप से एक साधारण खेल है जो ग्रामीण लोगों के मनोरंजन के लिए आयोजित किया जाता है। इस खेल के लिए दो ट्रैक बनाए जाते हैं, दोनों में मिट्टी वाला पानी भरा होता है। दोनों पैरलल ट्रैक्स पर रेसर्स अपने एक जोड़ी भैसों के संग पहुंचते हैं और फिर रेस शुरू होती है। भैसों को दौड़ाने के लिए जॉकी कभी—कभी चांबुक या डंडे का भी इस्तेमाल करते हैं। कंबाला रेस जलीकट्टू की तरह ही एक ऑर्गनाइज्ड रेस है जिसे आयोजित कराने से लेकर इसके समापन तक का काम कंबाला कमेटी देखती है। इस रेस में कई सारी कैटेगरी भी होती हैं। कई कैटेगरी ऐसी है जो भैसों के आउटफिट पर अधारित होती हैं, जैसे

  • नेगिलु (हल) — जिसमें भैंस के पीछे हल बंधा होता है। लेकिन यह भारी नहीं होता हल्का होता है।
  • हग्गा (रस्सी) — जिसमें एक रस्सी सीधे भैंसों से बंधी होती है, जिसे पकड़कर जॉकि रेस में भैसों के संग दौड़ता है।
  • एडा हेलेज— (क्रॉस लकड़ी का ब्लॉक) — इसमें क्रॉस लकड़ी का ब्लॉक भैंसों से बंधा होता है, जिस पर जॉकी खड़ा होता है।
  • केन हेलेज(गोल लकड़ी के ब्लॉक)— इसमें जॉकी गोल लकड़ी के ब्लॉक पर एक खड़ा होकर भैंसों को हांकता है।

इसमें जूनियर और सिनियर डीविजन भी होते हैं। यह खेल इतना लोकप्रिय है कि, हजारों और लाखों में लोगों की भीड़ जुटती है। लोग रेसिंग पर बेट लगाते हैं और खेल के दौरान अपनी भैसों को चीयरअप करते हैं। कई जगहों पर यह खेल रात में भी ऑर्गनाइज करवाया जाता है। इस रेस में जो भैंस इस्तेमाल होते हैं, उनकी अच्छे से देखभाल की जाती है और उनकी फीडिंग अच्छे से होती है।

कंबाला रेस

कंबाला रेस का इतिहास

इस खेल का आयोजन धान की दूसरी फसल काटने के बाद होता है। आधुनिक कंबाला की शुरुआत 1969 में बाजागोली से हुई थी। इसे लव-कुश कंबाला कहा गया। वहीं एक कादरी कंबाला भी होता है। मैंगलोर के कादरी में इसका आयोजन होता है। इसे देवारा कंबाला (भगवान का कंबाला) कहा जाता है क्योंकि यह उस शहर में श्री मंजूनाथ मंदिर के साथ जुड़ा हुआ है। इस खेल को 300 साल पहले मैंगलोर के अलुपा राजाओं ने संरक्षण दिया था इसलिए इसे अरासु कंबाला (राजा का कंबाला) भी कहते हैं। वहीं एक मान्यता के मुताबिक, कर्नाटक के कृषक समुदाय के बीच 800 साल पहले से यह खेल खेला जा रहा है। यह पर्व भगवान शिव के अवतार कहे जाने वाले भगवान मंजूनाथ को समर्पित है। कहा जाता है कि, इस खेल के जरिए अच्छी फसल के लिए भगवान को खुश किया जाता है।

जब हुई इस खेल को बंद कराने की पहल

जलीकट्टू की तरह ही इस खेल को भी बंद कराने की कोशिश हुई थी। पेटा की याचिका पर 2016 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने कंबाला पर बैन लगा दिया था। पेटा की इस याचिका में कहा गया था कि इस खेल में पशुओं पर क्रूरता होती है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जलीकट्टू पर आए आदेश के मद्देनजर इस खेल पर बैन लगा दिया था। कंबाला कमिटियों ने बैन का विरोध किया है। जब 2017 में जलीकट्टू पर से राज्य सरकार ने ऑडिनेंस लाकर बैंन हटा दिया तो कंबाला को लेकर भी ऐसी ही मांगे तेज हो गईं। जिसके परिणाम में पशु क्रूरता रोकथाम नाम का एक संसोधन अध्यादेश 2017 में कर्नाटक की सरकार लेकर आई और कंबाला पर से बैन हट गया।

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