बेजुबानों के लिए आशियाना बना रहे एनिमल लवर्स, 17 साल पहले शुरू की थी छोटी सी कोशिश!

चाहे बात शहरों की करें या फिर गांवों की आवारा जानवरों की मुसीबत से रूबरू हर इंसान होता है. लेकिन क्या कभी हमने सोचा कि, जिन जानवरों को हम आवारा जैसा नाम देते हैं. जिन जानवरों को हम यूं ही सड़को गली-मोहल्लों में तड़पता छोड़ देते हैं. वो जानवर कितने बेबस होते होंगे यू सड़कें पर रहने के लिए. अक्सर हम अपने आस पास घायल या बीमार जानवरों को देखकर दो पल का अफसूस मनाकर भूल जाया करते हैं. लेकिन उनके लिए कुछ करते नहीं.

लेकिन ऐसे बहुत से लोग हैं जो उनके बारे में सोचते भी हैं और उनके लिए काम भी करते हैं. ऐसी ही है नन्दनी कक्कड़, अपने कॉलेज के दिनों को याद कर नन्दनी बताती हैं कि, ‘मैंने इसकी शुरुवात 2002 में की थी. जिस समय कॉलेज कैंपस में रहने वाला एक कुत्ता बीमार हो गया था. कुत्ते की हालत देखकर मैं और मेरे दोस्त काफी परेशान हुए थे. हमने तुरंत पैसे इकट्ठे किये और उस कुत्ते का इलाज करवाया, जिससे कुछ ही दिनों में वो कुत्ता ठीक हो गया. उस दिन एक अलग खुशी महसूस हुई थी. मैं और मेरे दोस्त काफी खुश हुए. हम लोगों में जानवरों के प्रति प्यार सेवा-भाव पहले से ही मौजूद था, जो आज के समय में अलग रूप में सामने आ रहा है.

नन्दनी कक्कड़ और उनके दोस्तों को लोग कहते हैं, “एनिमल लवर्स”

आपको बता दें कि, आज के समय में नन्दनी और उनके दोस्त घायल जानवरों का इलाज कराने के साथ-साथ उनकी देखभाल करते हैं. यही वजह है की कॉलेज से लेकर आसपास के पूरे एरिये में नन्दनी और उनके दोस्तों को सभी एनिमल लवर्स के नाम से जानते हैं.

जाहिर है 2002 से शुरु हुआ ये सफर आज एक संगठन के रूप में तब्दील हो गया है. इस संगठन का नाम भी एनिमल लवर्स एसोसिएशन है.

एनिमल लवर्स एसोसिएशन के बैनर तले बन रहे बेजुबानों के मसीहा

अपने संगठन को लेकर नन्दनी कहती हैं कि, ‘हम करीब 10 ही लोग थे जब हमने बेसहारा जानवरों के लिए काम करने की ठानी थी. हमारे मन में जानवरों के लिए गहरी भावना थी. लेकिन काम महज़ भावना के सहारे ही नहीं होता. इसलिए हमको संगठन बनाने की जरूरत पड़ी. क्योंकि संगठन के बैनर तले इकट्ठा होकर ही लोग बेहतर काम कर पाते हैं. इसलिए हमने एनिमल लवर्स एसोसिएशन बनाया.’

आज के समय में एनिमल लवर्स एसोसिएसन चंडीगढ़, मोहाली से लेकर पंचकूला और अपने आस-पास के इलाकों में सक्रिय है. 2002 के बाद से ही शुरू हुआ सफर आज बिना किसी गैर-राजनीतिक, गैर-लाभकारी तरीके से बेसहारा जानवरों के लिए कर रहा है.

वहीं एसोसिएशन के और सभी सदस्यों की मानें तो वो कहते हैं कि, हम बीमार घायल और बेसहारा जानवरों के लिए काम ही नहीं करते बल्कि उनके रहने का भी इंतजाम करते हैं. हमने क्राउड फंडिंग के माध्यम से बेसहारा जानवरों के लिए होस्टल बनवाया है. ताकि वहां जानवरों को रख सके. इस समय अगर बात करें तो यहां लगभग 60 जानवर हैं. ये जानवर घायल हैं, जिनका उपचार चल रहा है. इन जानवरों में बहुत से जानवर पालतू हैं, जिन्हें उनके ही मालिकों ने आवारा भटकने के लिए छोड़ दिया है. यही वजह है की हम ऐसे जानवरों का इलाज करते हैं साथ ही नए मालिकों की तलाश करते हैं. इसके अलावा हम इन्हें गोद लेने के लिए मुहिम चलाते हैं.

लोगों को बदलना होगा अपना नजरिया-नन्दनी कक्कड़

यही नहीं हम सभी पशु कानून को लागू करवाने के लिए, ‘हम लोगों को जानवरों के प्रति नैतिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए और पालतू जानवरों की दुकानों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के लिए भी अभियान चलाते हैं.’

हमारे होस्टल में जानवरों के लिए कमरों के अलावा, इलाज के लिए मेडिकल रूम और जानवरों के लिए खाने से लेकर दवाइयों का भी इंतजाम है. जानवरों की बात करें तो, यहां कुत्ते, गाय, गधे, घोड़े और बैल भी हैं. जिनका इलाज चल रहा है.

जाहिर है, जहां एक तरफ एनिमल लवर्स एसोसिएशन जानवरों के इलाज के लिए काम कर रहा है. वहीं ये संगठन सभी जानवरों को गलियों से लेकर सड़कों से उठाकर लाते हैं. जिनमें कई जानवर पैरालाइज्ड हैं. वहीं कुछ जानवर अंधे हैं. अभी तक हम अपने संगठन के माध्यम से 105 जानवरों की सर्जरी करवा चुके हैं.  

इसका खर्च हम सभी लोग खुद मिल-बांटकर करते हैं, हालांकि हमारे कुछ नियमित दानकर्ता भी हैं. जो समय-समय पर यहां मौजूद जानवरों के लिए दवाइयां और दलिया भेज देते हैं.

हमारा संगठन जानवरों के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाने के लिए पिछले कई सालों से काम कर रहा है, ताकि धीरे-धीरे लोग हमारे साथ जुड़ सकें. यहां हमारे साथ आकर जानवरों के बीच अपना जन्मदिन मना सकें जानवरों का ख्याल रखना सीख सकें.

हम चाहते हैं की हम लोगों में जानवरों को अपनाने की जागरुकता का अभियान चलाए. क्योंकि यहां सड़कों पर, गली मुहल्लों में देसी नस्ल के कुत्तों की सबसे ज्यादा दुर्गति होती है. अक्सर देसी कुत्तों कूड़दान में खाना खाते हैं अपनी जिंदगी यूं ही रोड़ पर गुजरता हैं और इसी के चलते घायल भी हो जाते हैं या फिर गाड़ियों के नीचे आकर मर जाते हैं.

आज हमारा संगठन विशेष रूप से बच्चों को जागरूक करने की कोशिश कर रहा है. यही वजह है की हम आस पास के स्कूलों और संगठनों में अपने वॉलन्टियर्स भेजकर बच्चों को जागरूक करते हैं.

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