बुधिया सिंह : वो बच्चा जो दौड़ने के लिए पैदा हुआ था लेकिन….

ऐसा कहा जाता है, कि भाग्य सबसे बली होता है, लेकिन क्या भाग्य को बदला जा सकता है? यह सवाल भी इसी वाक्य के साथ सामने आता है। मगर आज हम आपको जिस बच्चे की कहानी बताने जा रहे हैं उसे भगवान जगन्नाथ का वरदान माना गया। दरअसल, ऐसा माना गया है कि, जब वो बड़ा होगा तो भारत के लिए ओलंपिक गोल्ड मेडल लेकर आएगा। उसे उड़ीसा का गौरव और न जाने क्या-क्या कहा गया। लेकिन एक ही पल में उसके संभावित भाग्य को पलट दिया गया। बुधिया सिंह एक बच्चा जो दौड़ने के लिए पैदा हुआ था उसकी रफ्तार को धार देने वाले उसके गुरू को पहले उससे दूर किया गया और फिर उसकी रफ्तार को धीरे—धीरे धीमा कर दिया गया।

खैर, कंफ्यूज होने की जरूरत नहीं, है इससे पहले कि हम आपको इसके आगे की कहानी बताएं, उससे पहले आपका ये जानना जरूरी है कि, आखिर कौन है बुधिया सिंह, और आखिर ये करता क्या है?

दरअसल, साल 2005 और 2006 में उड़ीसा का यह बच्चा मीडिया सेंसेशन हुआ करता था। जहां भी वो जाता था वहां मीडिया के कैमरे, हजारों—लाखों लोगों की भीड़ और पुलिस की सुरक्षा उसके लिए खड़ी रहती थी। लेकिन अचानक से सब बदल गया। वो बुधिया सिंह, जिसमें सबको भारत का भविष्य दिखता था, जिसे भारत का पहला मैराथन रनर समझा जा रहा था वह अचानक कहीं गायब हो गया। शोर थम गया, मीडिया भी चुप हो गई। लेकिन किसी ने भी ये जानने की कोशिश तक नहीं की, आखिर ऐसा हुआ क्या? यह सबसे बड़ा सवाल है। तो चलिए आज हम आपको इस बारे में बताते हैं।

बुधिया सिंह और उसके कोच विरंची दास

बुधिया का जन्म वर्ष 2002 में उड़ीसा के एक छोटे से गाँव में हुआ। वो यहीं की स्लम बस्तियों में पलकर बड़ा हुआ था। बुधिया इसी स्लम के बच्चों की तरह ही एक आम बच्चा था जो भूख और ग़रीबी से मर रही भीड़ का एक हिस्सा मात्र ही था। 2 वर्ष की उम्र में उसके सिर से पिता का साया भी उठ गया. पिता के गुज़र जाने के बाद उसकी माँ के लिए अपने तीन बच्चों का पेट भरना एक बड़ी मुसीबत बन गया था। उसके घर की हालत इतनी खराब थी कि एक दिन उसकी मां ने उसे सिर्फ 800 रुपये के लिए बेंच दिया। एक चैनल को दिए अपने एक इंटरव्यू में बुधिया ने बताया था कि वो उन दिनों को याद तक नहीं करना चाहता है, जब उसे उसकी मां ने बेंच दिया था।

यहीं पर बुधिया की कहानी में एंट्री हुई स्लम के पास ही बच्चों को जुडो कराटे की ट्रेनिंग देने वाले कोच विरंची दास की। विरंची दास के बारे में कहा जाता है कि वह उन दिनों गरीब और असहाय बच्चों को अपने घर में जगह देते थे और उन्हें जुडो—कराटे की ट्रेनिंग देते थे। वहीं उनका अपना बिजनेस भी था जिसके पैसे से वो स्लम के बच्चों को एक बेहतर जिंदगी देने का प्रयास करते थे। विरंची को जब पता चला कि बुधिया को उसकी मां ने बेच दिया है तो वे उसे खरीदने वाले आदमी के पास से वापस ले आए। जिसके बाद विरंची ने अपनी पहचान की बदौलत बुधिया की मां को मेड की एक नौकरी भी दिला दी। लेकिन इसी दौरान बुधिया की मां ने विरंची से बुधिया को अपने यहां रखने की बात कही और कहा की विरंची ही उसका ख्याल रखें। जिसके बाद विरंची बुधिया को लेकर अपने घर आ गए जहां पहले से ही कई बेसहारा बच्चे रहा करते थे।

स्लम के माहौल में रहा बुधिया ने गाली देना सीखा था। एक बार विरंची ने उसे सुधारने के लिए दौड़ते रहने की पनिशमेंट दी। गुस्से में विरंची ने कह दिया कि जब तक मैं न बोलू बुधिया दौड़ता रहेगा। इतना बोलकर बुधिया के कोच बाहर चले गए। जब शाम को लौटकर घर आएं तो देखा की बुधिया दौड़ ही रहा था। इसके बाद विरंची उसे लेकर डॉक्टर के पास पहुंचे, लेकिन वहां बुधिया की हालत बिल्कुल ठीक थी। इसके बाद ही विरंची समझ गए की बुधिया गॉड गिफ्टेड बॉय है जो दौड़ने के लिए ही पैदा हुआ है।

विरंची ने इसके बाद बुधिया की ट्रेनिंग शुरू की। वहीं पहली बार बुधिया का परफॉरमेंस उड़ीसा के सीएम संग उड़ीसा के लोगों ने एक परेड के दौरान देखी। इस दौरान उडीसा के सीएम ने उसे प्राउड ऑफ उड़ीसा कहा था। इसके बाद बुधिया भागता रहा, भागता रहा और सारी दुनिया में उसका नाम पहुंच गया। इसी दौरान बुधिया को दिल्ली के हाफ मैराथन में दौड़ने के लिए बुलाया गया। साढ़े तीन साल के इस लड़के की दौड़ देश का हर नागरिक देखना चाहता था। बुधिया को लेकर विरंची दिल्ली तो पहुंचे लेकिन बुधिया दौड़ में भाग नहीं ले सका। वजह बनी उसकी उम्र। कहा गया कि मैराथन में 14 साल से कम उम्र के बच्चे हिस्सा नही ले सकते।

जब बुधिया सिंह ने बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड

बुधिया के दिल्ली में मैराथन नहीं दौड़ने के बाद उसके कोच विरंची ने कई लोगो की मदद से ओडिशा में ही मैराथन का आयोजन करवाया। 02 मई 2006 को पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार से दौड़ शुरू हुई। लगभग 200 सीआरपीएफ़ जवानों के बीच दौड़ रहे मात्र साढ़े चार साल के बुधिया पर सबकी निगाहें टिकी हुई थीं. दौड़ चलती रही लोग थक कर रुकते रहे, किन्तु बुधिया दौड़ता रहा। लोग चिल्लाते रहे भाग बुधिया भाग और बुधिया दौड़ता रहा। 7 घंटे 2 मिनट की दौड़ के बाद बुधिया ने पुरी से भुवनेश्वर की 65 कि.मी की दूरी को पूरा कर लिया। ऐसा करने वाला बुधिया दुनिया का सबसे कम उम्र का धावक था। इस करनामें के बाद उसका नाम ‘लिम्का गिनीज़ वर्ल्ड रिकार्ड’ में दर्ज किया गया।

अचानक गुमनाम बन गया बुधिया
बुधिया को बहुत नाम मिला, शोहरत मिली लेकिन बस कुछ पल के लिए। उसके बाद सब खत्म हो गया। विरंची पर पहले से ही चाइल्ड वेलफेयर डिपाटमेंट की नज़र तो थी ही। लेकिन बाद में केन्द्र की सरकार की ओर से भी इसमें दखल दे दिया गया। विरंची दास पर कई बाल कल्याण संस्थाओं और बुधिया की माँ सुकांति देवी द्वारा इल्जाम लगते रहे. उन पर बुधिया से कम उम्र में इस तरह का कठिन परिश्रम कराने और शारीरिक यातनाएं देने के अपराध का मुक़दमा चलाया गया. सुकांति देवी ने तो अपने और बुधिया के लिए सुरक्षा दिए जाने की भी मांग की।

विरंची दास लाख इंकार करते रहे लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी। उन्हें 13 अगस्त 2007 को गिरफ्तार भी किया गया। ऐसा कहा गया कि उसने यह सब नाम कमाने के लिए किया है। विरंची की गिरफ्तारी के बाद सरकार ने बुधिया का संरक्षण अपने हाथों में लेकर उसे सरकारी स्पोर्ट्स हॉस्टल में भेज दिया।

विरंची दास की हत्या
13 अप्रैल 2008 की शाम को बक्सी जगबंधु विद्याधर कॉलेज में दास की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस के अनुसार, हमले के समय विरंची दास दोस्तो के साथ जूडो सेंटर के भीतर थे। हालांकि, पुलिस ने इस बात से साफ इंकार किया कि विरंची की हत्या का लिंक बुधिया सिंह से जुड़े थे। दास के हत्यारो संदीप आचार्य (उर्फ राजा) और उसके सहयोगी अक्षरा बेहरा, (उर्फ छागला) को दिसंबर 2010 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

बुधिया सिंह पर बनी फिल्म
हाल ही में बुधिया और विरंची दास की कहानी पर एक फिल्म भी आई थी जिसका नाम था ‘बुधिया सिंह : बॉर्न टू रन’। फिल्म में सुपरस्टार मनोज वाजपेयी ने विरंची दास का किरदार निभाया था तो वहीं बुधिया के किरदार में मयूर दिखे थे। फिल्म को काफी सराहना भी मिली। फिल्म की रिलीज से बुधिया एक बार फिर से मीडिया की नज़रो में आया। आज का बुधिया बड़ा हो गया है। लेकिन वह पहले जैसा दौड़ नहीं सकता, उसकी वह रफ्तार कहीं गुम हो गई है।

कही हम तो नहीं जिम्मेदार?
बुधिया की गुमनामी की वजह कहीं हम तो नहीं है या फिर हमारा यह सिस्टम। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योकि हमारे जैसे खेल प्रेमियों ने ही तो एक स्लम से निकले बच्चे को पलकों पर बिठाया था और फिर अचानक भूल गए। दोषी यह सिस्टम भी तो है। जिसे हर दिन भुख से मर रहे बुधिया की कोई चिंता ही नहीं हुई। लेकिन जैसे ही किसी विरंची ने उसे गोद लेकर उसके अंदर भारत का भविष्य बनने का दम भरा, इस सिस्टम को यह चुभ गया। बुधिया जैसे कई बच्चे हैं जिन्हें अच्छा खाना तक नसीब नहीं होता लेकिन उनके दरवाजे पर कोई वेलफेयर वाला उनकी केयर करने नहीं पहुंचता। मगर जब वही बच्चा कुछ बड़ा करता है तो चाइल्ड वेलफेयर से जुड़ी संस्थाओं को अधिकारों का हनन याद आ जाता है।

उठते हैं कई सवाल
सवाल उठता है। क्योंकि बुधिया कोई पहला बच्चा नहीं है जिसने कम उम्र में अपनी काबीलियत से दुनिया को चौकाया हो। बुधिया की तरह ही भारत की 6 साल की करीना बावला ने न्यूजीलैण्ड में 10 कि.मी की दौड़ पूरी की थी, भारत का 6 साल 11 महीने का पीयूष दर्शन सबसे कम उम्र का स्काई ड्राइवर है, तब कोई इनकी उम्र नहीं पूछता लेकिन इनकी तरह का ही बुधिया जब कम उम्र में कुछ करना चाहता है तो उसे यह कह कर रोक दिया जाता है कि वो तो अभी बहुत छोटा है।

खैर यहां हम मनोज वाजपेयी की एक बात को रखना चाहेंगे, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी फिल्म को लेकर हुए एक इंटरव्यू में किया था, कि भारत में पूल क्रिएट करने की कोई सुविधा नहीं है। अमेरिका और चीन ओलंपिक में ज्यादा मेडल इसलिए लेकर आते हैं क्योकि वो अपने प्लेयरों का बचपन से ही एक पूल तैयार करते हैं और इसी में से बेस्ट को चुन कर भेजते हैं। लेकिन भारत वो देश हैं जहां लेग पुलिंग ज्यादा है। मनोज वाजपेयी की बात भले ही थोड़ी खराब लगे लेकिन बात तो सौ आने सच है।

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