प्लास्टिक छोड़िए ‘पत्तल’ की ओर चलिए, क्योंकि दुनिया कर रही है हमारी कॉपी

आज से 10-11 साल पहले अगर आप किसी दावत में खाना-खाने और खिलाने के बारे में सुनते होंगे या देखा होगा या फिर खुद अटेंड किया होगा तो आपको याद होगा कि कैसे एक पात (कतार) में बैठाकर लोगों को खाना खिलाया जाता था। तब प्लास्टिक से बनी पत्तलों का ट्रेंड नहीं था। उस समय ज्यादातर लोग पुरइन, केले के पत्ते से लेकर बरगद के पत्तों की बनी प्लेट पर खाना खाते थे। ये वो दौर था, जब ये पेड़-पौधे आराम से घरों के आस-पास उपलब्ध होते थे। धीरे-धीरे इन पत्तों को एक आकार में सिलकर प्लेट बनाया गया। इससे कई लोगों को स्वरोजगार भी मिला। दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में यह लघु रोजगार आज भी चल रहा है।  

पत्तलों में ही कई ब्लॉक होते थे, जिसमें सब्जी, सालाद, पापड़ वगैरह रखा जा सकता था। वहीं खीर या दाल रखने के लिए अलग से पत्तों का बना दोना भी आता था। लेकिन ये कल्चर अब खत्म हो गया है। पत्तलों की जगह प्लास्टिक और फोम की प्लेटें आ गई हैं। प्लास्टिक का चलन बढ़ गया है तो पियो-फेको ग्लास भी मार्केट में हैं। इन सभी नए प्लास्टिक की चीजों को लेकर कहा गया ‘पियो, फेंको और निश्चिंत रहो’। लेकिन हमारी इसी आदत के कारण यह प्लास्टिक आज हमारे लिए बड़ी दिक्कत बन गई है।

पत्तलों का इतिहास

भारत में पत्तल बनाने और इसमें भोजन करने की परंपरा कब शुरू हुई, इसका कोई प्रामाणिक इतिहास नहीं है। लेकिन यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह जानकर किसी को भी हैरत हो सकती है कि, देश में किसी दौर में 20 हजार से ज्यादा किस्म की वनस्पितयों की पत्तियों से पत्तल बनाए जाते थे। लेकिन आधुनिकता की बढ़ती होड़ ने इस उद्योग को समेट दिया। अब खासकर शहरी इलाकों में पत्तल पर भोजन की परंपरा खत्म हो गई है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी केले के पत्तल पर खाना खाने की परंपरा का जिक्र किया गया है।

भारतीय संस्कृति का हिस्सा है बनस्पतियों से बने पत्तल

भारत में सदियों से विभिन्न वनस्पतियों के पत्तों से बने पत्तल संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन भारत में अब इन पत्तलों की लोकप्रियता घटती जा रही है। एक वक्त था, जब भारत में कोई भी सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक उत्सव इनके बिना पूरा नहीं होता था। लेकिन अब पूजा कार्यक्रमों में भी इनकी जगह प्लास्टिक ने ले ली है।

भारत में पत्तलों का व्यवसाय

पत्तल उद्योग असंगठित सेक्टर में आता है। इस काम से आज भी लाखों मजदूर, खास तौर पर महिलाएं जुड़ी हुई हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान ऐसे राज्य हैं, जहां इसका चलन सबसे ज्यादा है। तो वहीं दक्षिण भारत में आज भी केले के पत्तों पर लोग खाना खाते हैं। लेकिन अब इसका चलन धीरे-धीरे कम होने लगा है। यह शायद अकेला ऐसा उद्योग है जिस पर नोटबंदी की मार नहीं पड़ी है। ऐसे में हम यह कह सकते हैं कि इको-फ्रेंडली होने के बाद भी भारत में इस उद्योग के गुमनामी में खोने की वजह बस ये है कि, ये आधुनिकता की मार सह नहीं पाया है। गांव से लेकर शहरों तक, अब विभिन्न समारोह में बुफे पार्टी सिस्टम में पत्तों से बने पत्तलों की जगह अब चीनी मिट्टी के प्लेटों और फोम के प्लेटों ने ले ली है और एक बार फिर पत्तल व्यवासायी पहले की तरह बेबस नजर आ रहे हैं।

विदेशों में बढ़ रहा, पत्तल का क्रेज
किसी ने सही कहा है कि भारत के लोग पश्चिम की ओर भाग रहे हैं और पश्चिम के लोग भारत की ओर। पत्तल के मामले में भी कुछ ऐसा ही है। भारत के लोग आज अपनी पुरानी, नेचर फ्रेंडली और स्वस्थ आदत को छोड़ आधुनिकता की होड़ में लगे हैं तो वहीं इसी आधुनिकता की होड़ में गच्चा खा चुके विकसित देश भारत की पुरातन संस्कृति की कॉपी करने लगे हैं। फिर चाहे वो योग हो, खान पान हो या खाने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले पत्तल ही क्यों न हो। महंगे होटलों और रेस्टोरेंटो में भी प्लटों पर केले के पत्ते रख कर भोजन करने की परंपरा विदेशों में बढ़ रही है।

यूरोप के प्रमुख देशों में से एक जर्मनी की अगर बात करें तो आज वहां पहले के भारत की तरह ही पत्तलों पर भोजन करने की परंपरा काफी लोकप्रिय हो रही है। पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए वहां इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है और अब उसकी देखा-देखी दूसरे यूरोपीय देश भी पत्तलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। जर्मनी में पत्तल बनाना आज के दिनों में एक बड़ा कारोबार है। अब तो ये पत्तल डिजाइनर के जरिए डिजाइन तक किए जाते हैं।

ये बना रहे हैं पत्ते से पत्तल
जर्मनी में हाल ही में ‘लीफ रिपब्लिक’ के नाम से एक स्टार्टअप खुला है। ये स्टार्टअप पत्तों से पत्तल बनाने का काम कर रहे हैं। इसके लिए फंडिंग का जुगाड़ भी हुआ है। इन लोगों ने पहले पत्तल बनवाने के लिए पत्ते इम्पोर्ट करवाए। फिर सब काम धाम छोड़ के लग गए पत्तल बनाने। भारत में आपने पत्तल की फैक्ट्री के बारे में कम सुना होगा लेकिन इन लोगों ने एक फैक्ट्री डाल रखी है, सिर्फ पत्तल बनाने के लिए। जहां इनकी मशीनें पत्ते से प्लेट-कटोरी सब बनाती हैं।

पत्तल के फायदे
पत्तल पर भोजन करने के कई फायदे हैं। इससे पर्यावरण पर असर नहीं होता न ही पानी की बर्बादी होती है। वहीं इसे बनाने में केमिकल का इस्तेमाल भी नहीं होता। ऐसे में इस पर रखे खाने में रसायन घुलने का भी डर नहीं होता। वहीं ये पत्तल बायोडिग्रेडेबल हैं, तो इनसे खाद भी बनाया जा सकता है। जर्मनी में पत्तल के बढ़ते क्रेज के पीछे ये सब बड़े कारण हैं। इस बात को जर्मनी वाले तो समझ रहे हैं लेकिन भारत के लोग अपनी इस इजाद को खुद ही नाकार रहे हैं।  

अपने पत्तल उद्योग को देना होगा बढ़ावा
आज भारत के पास अपना जो है उसकी कीमत कुछ नहीं है। कहते हैं ना घर की मुर्गी दाल बराबर, बस यहीं हाल है। आपको याद होगा कि कैसे बासमती चावल की अनदेखी के कारण अमेरिका ने इसे अपने नाम से पेटेंट करा लिया था। ऐसा ही हाल योग के साथ भी करने की कोशिश की गई। ऐसे में जरूरत है कि भारत के लोग अपनी परंपरा और अपनी चीजों को ज्यादा तवज्जों दें। क्योंकि भारत की संस्कृति के विकास के मूल में ही प्राकृति का योग है। आज दुनिया जब ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकटों और प्लास्टिक कचरों से जूझ रही है, ऐसे में भारत अगर अपनी पुरातन परंपरा को अपनाता है तो दुनिया भारत के पीछे खड़ी होगी।

इसमें सिर्फ सरकार के सहयोग से काम नहीं बनेगा। काम बनेगा तो हमारे और आपके सहयोग से, हम अगर आज से ही स्टैडर्ड और दिखावे के नाम पर प्लास्टिक के बजाए पत्तलों को बढ़ावा दें तो हमारे पर्यावरण का काफी भला हो जाएगा, प्लास्टिक कचरे का बढ़ना थम जाएगा, आप और हम हर रोज प्लास्टिक के कण खाने से भी बचेंगे, नदियों का भी भला होगा, खेती के लिए खाद भी बना सकेंगे साथ ही हमारे गांव में इस काम को करने वाले लघु व्यपारियों को इसका लाभ मिलेगा। सोचिए जो सेक्टर लुप्त होने के कागार पर होने के बाद भी नोटबंदी के असर से बचा रहा अगर वो मेन मार्केट का हिस्सा बनता है तो देश के आर्थिक ग्रोथ में भी कितना सहयोग करेगा। यानि असल में खाओ, पियो फेको और निश्चिंत रहो की कहावत पत्तल पर ही जंचती है। अगर भारत में प्लास्टिक के बजाए पत्तल का उपयोग बढ़ता है तो हम गर्व से कह सकेंगे’ कॉपी दैट’।

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