प्लाजमा डोनर ढूंढने में झेली परेशानी, दूसरों को ना हो दिक्कत इसलिए बना दी वेबसाइट

चीन से शुरू हुआ कोरोना वायरस अब पूरे विश्व को अपने चंगुल में जकड़ चुका है। भारत में इस वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या 4 लाख के पार जा चुकी है, जिसमें से 14 हजार से ज्यादा लोग अपनी जान गवां चुके हैं। अच्छी खबर ये है कि 2 लाख से ज्यादा लोग ठीक भी हो गए हैं। लेकिन एक सवाल कई लोगों के मन में है कि जब दवा नहीं है तो लोग ठीक कैसे हो रहे हैं? इसका जवाब है कि ज्यादातर लोग तो खुद ही ठीक हो जाते हैं, लेकिन जिनकी हालत क्रिटिकल हो रही है उनके लिए कई तरह की दवाइयों को मिलाकर यूज किया जा रहा है। वहीं प्लाजमा थेरेपी इस दौर में एक बड़ी आशा की किरण बन कर सामने आई है। दिल्ली में ज्यादा तर क्रिटिकल मरीजों के ईलाज के लिए प्लाजमा थेरेपी का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन क्या प्लाजमा थेरेपी करवा पाना हर मरीज के बस की बात है?

प्लाजमा थेरेपी के लिए डोनर ढूंढ़ना आसान नहीं

प्लाजमा डोनर

इस सवाल का जवाब उसी के पास हो सकता है जिसे इस दौर से गुजरना पड़ा हो। दिल्ली के ही रहने वाले अद्वितीय मल को प्लाजमा थेरेपी के प्रोसेस से गुजरना पड़ा। उनके सास और ससुर दोनों में 30 मई के दिन कोरोना से जुड़े सिम्टम्स दिखे। जब टेस्ट कराया तो टेस्ट पॉजिटिव आया, डॉक्टर की सलाह पर दोनों को होम क्वारांटीन होना पड़ा। अद्वितीय की मानें तो एक सप्ताह के अंदर उनकी सास तो ठीक होने लगीं लेकिन उनके ससुर की तबीयत बिगड़ती चली गई। उनके ब्लड में ऑक्सीजन की कमी होने लगी।

उसी दिन अद्वितीय ने अपने ससुर को साकेत के मैक्स अस्पताल में भर्ती करा दिया। लेकिन जब दिन-ब-दिन हालत बिगड़ती चली गई तो डॉक्टरों ने प्लाजमा थेरेपी करने कि बात कही। यहां आपको समझना होगा कि प्लाजमा थेरेपी कोई छोटी चीज नहीं है, ये ठीक समे ब्लड ग्रुप जैसे आदमी को ढूंढने जैसा है। जो डोनेट कर सके। यानि पहले तो ऐसा आदमी ढूंढ़ना होता है जो कोरोना पीड़ित था और फिर ठीक हो गया, इसमें ब्लड ग्रुप का भी ध्यान रखना जरूरी होता है। ये काम रेत में सुई खोजने के जिस है, कभी कभी तो ऐसा होता है कि, आपको जिसकी तलाश है वो मिल भी जाता है, लेकिन वो डोनेट करने के लिए तैयार नहीं होता।

अद्वितीय के संग भी ऐसे कई सारी परेशानियां आईं। अगले कई दिनों तक उनका परिवार ऐसे व्यक्ति की तलाश करता रहा को प्लाजमा डोनेट कर सके। उन लोगो ने सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म के जरिए भी लोगों से मदद मांगी। इस दौरान उन्होंने 200 से 300 के करीब डोनर्स से भी बात की। वे बताते हैं कि हमने इस दौरान इंसान के नेचर का एक्सट्रीम लेवल भी देखा, कई लोग ऐसे मिले जो कहते थे कि आप पैसे ट्रांसफर करों हम डोनेट करने आ जाएंगे। लेकिन उन्हें एक ऐसा डोनर भी मिला जो आर्थिक रूप से इतना मजबूत नहीं था वो खुद अपने पैसे से पहुंचा और ब्लड टेस्ट करवाकर प्लाजमा डोनेट किया।

अद्वितीय और उनकी फैमिली ने एक डोनर खोजा था वो डोनेट करने के लिए एलिजिबल नहीं हो सका क्योंकि वो एक गर्भवती महिला थी। ऐसे में उन्हें फिर से ये पूरा काम करना पड़ा, इसी बीच अस्पताल के पास भी एक डोनर पहुंचा जिसके प्लाजमा से उनके ससुर की थेरेपी कंप्लीट हुई। थेरेपी के संग ही उनको दो राउंड antiviral Tocilizumab का दिया गया और इसके कुछ दिन बाद उनके फादर इन लॉ ठीक हो गए और टेस्ट भी नेगेटिव आ गया।

प्लाजमा डोनर ढूंढने के संघर्ष से शुरू हुआ ‘dhoondh.com’

प्लाजमा डोनर

अद्वितीय के ससुर तो ठीक हो गए, लेकिन उसी समय उनके बचपन के दोस्त मुकुल पहवा के चाचा भी कोरोना पॉजिटिव हो गए। हालांकि उन्हें प्लाजमा थेरेपी की जरूरत नहीं पड़ी। पहवा और मल दोनों उस दौरान एक दूसरे से लगातार संपर्क में थे जब मल के ससुर के लिए डोनर की तलाश हो रही थी। कहते हैं न कि जिंदगी कभी कभी ऐसे दौर दिखा देती है कि उससे सिख लेकर इंसान अपने साथ साथ दुनिया के भलाई के लिए भी काम करने मै लग जाता है। दोनों ने उस दौर को देखा जब उन्हें एक प्लाजमा डोनर के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ा, ऐसे में कोरोना के बढ़ते मामले को देखकर दोनों ने आने वाले हालात का अंदाजा लगा लिया।

ऐसे में दोनों ने इस परिस्थिति से निपटने के लिए तकनीक का सहारा लिया। पहवा और मल दोनों ने अपनी सेंविग के जरिए 2 लाख से ज्यादा पैसे जुटाए और रातों रात एक ऐसी वेबसाइट बना डाली जहां एक प्लाजमा डोनर को पेसेंट के घर वाले आसानी से ढूंढ सकते थे। यानि प्लाजमा डोनर के लिए किसी भी जरूरतमंद परिवार को दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा। अद्वितीय और मुकुल के इस प्लाजमा डोनर सर्चिंग वेबसाइट का नाम dhoondh.com है।

कैसे काम करती है dhoondh.com

dhoondh.com वो वेबसाइट है जहां प्लाजमा डोनर और पेशेंट को मिलने का काम करती है। इस साइट पर डोनर और पेशेंट दोनों को रजिस्टर करना होता है, और फिर साइट जरूरत के हिसाब से डोनर को ये जानकारी देती है कि उसे जहन और किस पेशेंट के लिए प्लाजमा डोनेट करना है। इस वेबसाइट कि कितनी जरूरत थी आप इस आंकड़े से समझ सकते हैं कि इस साइट पर लॉन्च होने के 72 घंटे के अंदर 12000 से ज्यादा हिट्स आए, वहीं 1000 के करीब डोनर्स और पेशेंट दोनों ने ही यहां रजिस्ट्रेशन करने लगे थे। 15 जून तक इस साइट पर 150 के करीब पेशेंट और 190 डोनर्स रजिस्टर्ड हुए थे। वहीं आज के समय में यहां पर रेगिटर्ड मरीजों की संख्या 684 और डोनर्स की संख्या 176 है।

मल और पहवा के संग कुछ डॉक्टर्स भी जुड़े हैं जो उन्हें डोनर्स के लिए सही क्राइटेरिया निर्धारित करने में मदद करते हैं। दोनों के कई दोस्त इस साइट के लिए वॉलंटियर्स के तौर पर काम कर रहे हैं। इस साइट की बड़ी खासियत ये है कि डोनर्स और पेशेंट की प्राइवेसी को बरकरा रखा जाता है।

अद्वितीय कहते हैं कि हमें ये करना था क्योंकी ये एक समय था जिसको सॉल्व करना बहुत जरूरी था। अद्वितीय और उनके दोस्त मुकुल ने मिलकर कोरोना की इस लड़ाई में अपना बड़ा योगदान दिया है। इन्होंने ये बताया है कि, अगर तकनीक का सही इस्तेमाल हो तो हर प्रॉब्लम का एक अच्छा और बेहतर सॉल्यूशन निकला जा सकता है। कोरोना पूरे भारत की लड़ाई है जिसे हमे मिलकर लड़ना है और मिलने के लिए जुड़ना जरूरी है और dhoondh.com डोनर्स और पेशेंट को जोड़ कर इस लड़ाई को और कारगर बना रही है।

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