प्रकृति और मनुष्य के आपसी प्रेम और सदभाव का पर्व हैः छठ

भगवान सूर्य, जिन्हें आदित्य के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में वर्णित देवों में से वे एकमात्र  देव हैं जिन्हें आम इंसान प्रत्यक्ष रूप से देख सकता है। सूर्य इस धरती के हर क्रिया-कलाप का हिस्सा है। बिना सूर्य के, उनकी रोशनी के हमारी धरती का लाइफ साइकल नहीं चल सकता। धरती पर बसने वाला या रहने वाला हर जीव सूर्य पर डायरेक्ट या इन डारेक्टली तौर पर निर्भर है। सूरज के कारण ही धरती पर फल, फूल, अनाज, अंड और शुक्र का निर्माण होता है। इसी के कारण बारिश होती है मौसम का साइकल चलता है। यानि सीधी सी बात है कि, अगर कल को सूर्य की चमक खत्म हो जाए तो धरती, जीवन भूमि की जगह पूरी की पूरी मरूभूमि बन जाए।

यानि हमारे जीवन के लिए सूरज का होना जरूरी है। इसी गुण के कारण हमारे शास्त्रों और वेदों में सूरज को भगवान माना गया है। अब जब सूरज की हम पर इतनी कृपा है तो इंसानों का भी तो कुछ फर्ज बनता है। सूर्य के प्रति हमारी श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता को दर्शाने के लिए ही सूर्य षष्ठी या छठ व्रत का पर्व मनाया जाता है। इस महापर्व में भगवान सूर्य नारायण के साथ देवी षष्ठी की पूजा भी होती है। छठ व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। करीब तीन दिन तक महिलाएं भूखी रहकर छठ का व्रत पूरा करती हैं।

भगवान सूर्यदेव को समर्पित यह विशेष पर्व भारत के कई हिस्सों में मनाया जाता है। खासकर बिहार, पूर्वी यूपी और झारखंड में इसे महापर्व माना जाता है। अगर हम छठ व्रत के इतिहास पर गौर करें, तो यह आज के हिन्दू कल्चर में मनाए जाने वाले सबसे पुराने त्योहारों में से हैं। इसे बड़ी ही शुद्धता, स्वच्छता और पवित्रता के साथ मनाया जाता है। छठ व्रत कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। भविष्य पुराण में इस बात का जिक्र है कि, इस समय सूर्य षष्ठी के रूप में होते हैं। ऐसे में इस दिन छठी माता की पूजा होती है और उनसे संतान प्राप्ति और उसकी रक्षा का वर मांगा जाता है।

छठ व्रत की प्रचलित कथाएं।

पहली कथा — छठ व्रत की महिमा से जुड़ी कई कथाएं हैं जो आदी काल से चली आ रही हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार एक समय में प्रियव्रत नाम के एक राजा हुआ करते थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। राजा को कोई संतान न होने से वह और उसकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। इसी बीच महर्षि कश्यप की मदद से राजा ने संतान प्राप्ति की इच्छा से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फल स्वरूप रानी गर्भवती हो गई।

नौ महीनों के बाद राजा के घर में संतान तो आई मगर जब रानी को बच्चा हुआ तो वह मरा हुआ था। इस घटना से राजा टूट से गए। संतान शोक में राजा आत्महत्या करने ही वाले थे कि इसी दौरान उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं। देवी ने राजा को बताया कि मैं षष्ठी देवी हूं। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी।

देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया। राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्ठी तिथि के दिन पूरे विधि-विधान से देवी षष्ठी की पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उनके घर एक सुंदर संतान का जन्म हुआ। तभी से छठ का पावन पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई।

दूसरी कथा — छठ व्रत से जुड़ी एक दूसरी कथा महाभारत काल की है। इसके अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए थे तब द्रौपदी ने अपने परिवार को दरिद्रता से निकालने के लिए छठ व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उसकी मनोकामनाएं पूरी हुई साथ ही महाभारत में पांडवो की विजय हुई और राजपाट वापस मिल गया।

तीसरी कथा रामायण काल से जुड़ी है। छठ व्रत का एक प्रसंग रामायण में आता है। ऐसा वर्णन है कि लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने के बाद माता सीता ने अपने पिता के घर जनकपुरी(नेपाल) मे छठ व्रत किया। तभी से ये पर्व पूर्वी भारत और नेपाल मे पूरी निष्ठा से मनाया जाने लगा।

छठ व्रत विधि

छठ का व्रत तीन दिनों तक रखा जाता है। इस महापर्व में देवी षष्ठी माता और भगवान भाष्कर की कृपा पाने के लिए स्त्री और पुरूष दोनों ही व्रत रखते हैं। छठ के तीनों दिनों का अपना अलग—अलग महत्व होता है। छठ व्रत को लेकर बहुत ही सावधानी बरती जाती है। इस महापर्व की तैयारी दीपावली के ठीक बाद ही शुरू हो जाती है। भैया दूज के दिन लोग घर मे मिट्टी का चूल्हा बनावाकर रख लेते हैं। इसी चूल्हे पर छठी मैया का प्रसाद बनता है। इसके बाद अन्य उपयोगी वस्तुओं को इकट्ठा करने की तैयारी शुरू हो जाती है।

पहला दिन

छठ का पहला दिन शुरू होता है चतुर्थी से, इस दिन आत्म-शुद्धि की महत्ता होती है, पारंपरिक हिन्दू मान्यतों के अनुसार गंगा नदी में स्नान कर आत्मा की शुद्धि होती है। इस दिन भी गंगा नदी में छठ पूजा करने वाली व्रतियां डुबकी लगाकर स्नान करती हैं और गंगा तट पर पूजा करती हैं। लेकिन वैसे लोग जो गंगा किनारे नहीं बसे या गंगा से दूर हैं, वो अपने पास की नदियों, पोखर और तलाबों मे गंगा जल डालकर वहां स्नान कर आत्म शुद्धि करते हैं। व्रत करने वाले इस दिन को केवल अरवा खाते हैं यानि  शुद्ध आहार लेते हैं। इस दिन को गंगा में स्नान के बाद व्रत करने वाले लोग गंगा के पानी से ही सेंधा नमक में लौकी की सब्जी बनाते हैं और उसे भात के साथ खाते हैं। इसीलिए इस दिन को नहाय—खाय के नाम से जाना जाता है।

दूसरा दिन

दूसरा दिन यानि पंचमी को ‘खरना’ पड़ता है। इस दिन शाम में गुड़ और साठी के चावल यानि नये चावलों की खीर बनती है। फिर खीर के साथ ही फल और मिठाई चढ़ा कर घर में छठी माता की पूजा की जाती है। इसके बाद इसी को प्रसाद के रूप में कुंवारी कन्याओं को और ब्राह्मणों के साथ ही अन्य लोगों में बांटा जाता है।

तीसरा दिन

तीसरा दिन, षष्ठी का दिन होता है। इस दिन को ही शाम में छठ घाटों पर व्रतियां डूबते हुए सूर्य को अर्घ देती हैं। लेकिन इससे पहले लोगों के घरों में चहल—पहल सुबह के 2 बजे से ही शुरू हो जाती है। सुबह दो बजे ही लोगों के घरों में आंच जल जाती है और शुरू हो जाता है छठ का सबसे उत्तम प्रसाद का बनना। घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ ‘ठेकुआ’ बनाने का काम शुरू हो जाता है। ठेकुआ आटे से भी बनता है और मैदे से भी, इसके अलावा इसमें मिठास के लिए चीनी या गुण दोनों में से किसी का भी प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन चढ़ावे के लिए खासतौर पर गुड में बने ठेकुआ का ही इस्तेमाल होता है। यह काम 8 बजे तक समाप्त हो जाता है।

इसके बाद शुरू होता है इस दिन व्रत के लिए उपयोगी वस्तुओ को साफकर उन्हें सुखाने का काम जो खरना के दिन ही खरीद कर रख लिए जाते हैं। इनमें सूप, डाला, फल, गन्ने, सब्जियां जैसे मूली, बोड़ी, मटर, चावल इत्यादि को धोकर धूप में सूखाया जाता है। फिर इसे डाले में एक—एक अर्घ के रूप में सजा दिया जाता है। इसके बाद शाम में घर के सभी सदस्य नहाकर नए कपड़े पहनते हैं और घर का कोई भी एक व्यक्ति अपने सिर पर डाले को उठाकर नंगे पांव उसे लेकर छठ घाट तक पहुंचता है। वहां पहुंचकर व्रत करने वाले पहले डूबते सूर्य को अर्घ देते हैं, इसके बाद शाम ढ़लने तक छठी के पास बैठकर लोकगीत गाते हैं, फिर अपने घर वापस आ जाते हैं। रात भर घरों में जागरण का माहौल रहता है। 

कोसी भरने की परंपरा

छठ में कोसी भरने की परंपरा है। लोग पहले साल मनोकामना मांगते हैं और उसके बाद पूरा होने पर अगले साल अपनी श्रद्धा के हिसाब से कोसी भरते हैं। कोसी सभी अपनी इच्छा और सामर्थ के हिसाब से भरते हैं। एकहरा यानि 12गन्ने, दोहरा यानि 24 गन्ने और ऐसे ही 36 गन्नों तक की कोसी भरी जाती है। गांवो मे गन्ना तो असानी से मिल जाता है। मतलब इतनी असानी से कि, अगर आप किसी के खेत में जाकर सिर्फ इतना कह दें कि छठ के लिए गन्ना चाहिए तो कोई मना नहीं करेगा।

कोसी दो तरीके से भरी जाती है पहली शाम के समय जब अर्घ दिया जाता है तो उसी समय घाट पर कोसी भर दी जाती है फिर घर पर आकर भरी जाती है। दसरे तरीके में पहले घर पर भरी जाती है और अगले दिन 2 से 3 बजे के करीब सुबह में छठ घाट पर कोसी भरी जाती है।

चौथा दिन

सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में फिर से लोग छट घाट पर पहुंचते हैं और छठी के पास बैठकर सूर्योदय की बाट जोहते हैं। सूर्योदय के समय सभी लोग सूर्य को अर्घ देते हैं। इसके बाद अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कही और सुनी जाती है। कथा के बाद प्रसाद बांटा जाता है और सभी अपने घर वापस लौट आते हैं। व्रत करने वाले इस दिन घर लौटने के बाद परायण करते हैं यानि शुद्ध भोजन करते हैं।

इस महान पर्व को लेकर मान्यता यह है कि, जो कोई भी इस दिन षष्ठी माता और सूर्य देव से इस दिन आप मांगोगे आपकी मनोकामना जरूर पूरी होगी। मनोकामना पूरी होने पर लोग माता के प्रति भी अपनी श्रद्धा अपने तरीके से दिखाते हैं। कुछ लोग घाट पर बाजा बजवाते हैं तो कुछ लोग घर से ही सूर्यदेव को दंडवत प्रणाम करते हुए घाट तक पहुंचते हैं। इस दौरान पहले वे अपने कुल देवी या देवता को प्रणाम करते हैं फिर वहां से दंडवत प्रणाम करते हुए घाट तक पहुंचते हैं। दंड की प्रक्रिया इस प्रकार से है — पहले सीधे खड़े होकर सूर्य देव को प्रणाम किया जाता है फिर पेट के बल लेटकर हाथ की छड़ी से जमीन पर एक रेखा खींची जाती है। यही प्रक्रिया घाट तक पहुंचने तक दोहराई जाती है।

छठ अपने आप मे एक अनूठा पर्व है। यह एक ऐसा पर्व है जिसमें इंसान से प्रकृति का जुड़ाव मजबूत होता है। इसके अलावा इंसान से इंसान का, परिवार के बीच आपसी सामंजस्य बनाने और एक दूसरे का महत्व समझने का भी त्योहार है। प्रकृति हमारी जननी है और सूर्य इस प्रकृति के जनक। इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य और इसकी पूजा ही हमारा धर्म। ‘जय हो छठी मैया’।

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