पोलियो का दम घोटने वाली फातिमा !

पोलियों एक ऐसी संक्रमित बीमारी है, जिसकी वजह से शरीर का कोई भी अंग लकवे से ग्रसित हो जाता है। और आज हमारे देश को पोलियो से छुटकारा पाए हुए तकरीबन 8 सालों से भी ज्यादा हो चुके हैं। लेकिन शायद आपको ये जानकर हैरानी होगी, कि एक वक्त पर भारत में हर साल करीब 50,000 बच्चे इस बीमारी का शिकार होते थे। लेकिन साल 2011 में भारत ने इस बीमारी से मुक्ति पा ली थी।

लेकिन क्या आप जानते हैं, कि हमारे देश को पोलियो जैसी संक्रमित बीमारी से छुटकारा दिलाने के पीछे किसका हाथ था? कौन थी वो महिला जिसकी वजह से आज हमारा देश पोलियों मुक्त देश बनने में सफलता हासिल कर पाया है।

दरअसल, इस महिला का नाम है, फातिमा इस्माइल, 4 फरवरी 1903 में दिन में जन्मी फातिमा मशहूर गाँधीवादी नेता उमर सोभानी की बहन थीं। जिसके चलते उन्हें बचपन से ही अपने घर में एक राजनीतिक माहौल देखने को मिला, और यही एक वजह भी है कि, वो बचपन से ही समाज में सुधार लाने के बारे में सोचा करती थी।

फातिमा ने अपनी इस कड़ी में सबसे पहले महिलाओं की शिक्षा की तरफ ध्यान देना शुरू किया, और फिर महिलाओं के लिए खोले गए औद्योगिक प्रशिक्षण में पठाना शुरू कर दिया। जिसके कुछ समय बाद फातिमा साल 1936 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की शिमला शाखा की सचिव भी बनी। हालांकि, इन सबके बीच भारत में अंग्रेजों के खिलाफ स्वंतत्रता की लड़ाई भी जोरो पर थी।

जहां एक तरफ फातिमा ने समाज के लिए कुछ करने की चाह थी, तो वहीं दूसरी अपनी मंजिल को पाने के लिए फातिमा स्वंतत्रता आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए भी तैयार थी। दरअसल, उनके बम्बई के घर पर कांग्रेस के कई नेता अक्सर नाम बदल कर रूका करते थे, और वहां मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनाया करते थे। और इन नेताओं में जयप्रकाश नारायण और अरुणा आसफ अली का नाम सबसे ऊपर था।

जैसे ही अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई तेज हुई वैसे ही साल 1942 में गांधी जी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत भी हो गई। हालांकि, इस वक्त तक फातिमा इस्माइल ने भी निकाह कर लिया था। और वो एक बेटी की मां भी बन चुकी थी। लेकिन साल 1945 में जब उन्हें पता चला कि, उनकी बेटी पोलियो की मरीज है, और अगर जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो हालात और बद्तर हो सकते है। बच्चे का मोह मां-बाप से कुछ भी करा लेता है, तो बस फातिमा की ममता ही थी, जिसके चलते उन्होंने पूरे देश की सैर भी की। लेकिन देशभर में घुमने के बाद उन्हें पता चला कि, बेटी की हालत में ज्यादा कुछ सुधार नहीं किया जा सकता, मगर इसके बाद भी फातिमा ने कभी हार नहीं मानी।

Fathema Ismail- बेटी के इलाज के लिए देशभर में भटकी फातिमा

दरअसल, देशभर में अपनी बेटी के पोलियो इलाज ढूंढ़ने निकली फातिमा को इल दौरान ना जाने कितने ही बच्चे पोलियो से जूझते दिखे। और देश में इन्ही हालातों को देखकर फातिमा ने ठान लिया कि, अब वो ना सिर्फ अपनी बेटी की हालत सुधारेंगी, बल्कि इन बच्चों की भी मदद करेंगी।

हालांकि, इसी बीच फातिमा के पति का ट्रांसफर ईरान में हो गया मगर फातिमा ने अपने पति के साथ जाने की बजाय भारत में ही रहने का फैसला किया। जिसके बाद उन्हें पता चला कि, भारत के मद्रास में एमजी कीनी नाम के एक डॉक्टर है, जो उनकी बेटी का इलाज कर सकते हैं, और बस फिर क्या था, फातिमा तुंरत निकल पड़ी मद्रास की ओर।

मद्रास पहुंचने के बाद पहले को उस डॉक्टर ने फातिमा की बेटी का इलाज करने से साफ इंकार कर दिया मगर फातिमा के बार-बार कहने के बाद आखिर में उन्होंने हामी भर ही दी, जिसके बाद करीब 8 महीनों तक उनकी बेटी का इलाज चला, हालांकि, इस इलाज के बाद फातिमा की बेटी को फिजियोथेरेपी की जरूरत थी। जिसके लिए फातिमा अपनी बेटी को लेकर पुणे आ गई। पुणे में फिजियोथेरेपी का एक केंद्र था, जहां पर अंग्रेज सैनिकों के घायल हो जाने पर उनका इलाज किया जाता था। और बस वहीं पर उनकी बेटी को फिजियोथेरेपी के जरिए सही करने की इजाजत मिल गई।

और बस अपनी बेटी की हालत में सुधार देखकर फातिमा ने फैसला किया कि, वो पोलियो से जूझ रहे बच्चों की मदद करेंगी। साल 1947 की बात है जब देश बस आजादी के आखिरी दहलीज पर पहुंचने ही वाला था।  और तभी फातिमा ने भी मुंबई के चिकित्सा समुदाय के प्रमुख लोगों पोलियो से ग्रसित बच्चों के लिए एक क्लीनिक खोलने की गुजारिश की। मगर आर्थिक संसाधनों की कमी के चलते ये संभव नहीं हो पाया।

Fathema Ismail- पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुकी है फातिमा

इसी बीच मुंबई के डॉक्टर एवी बलीगा ने फातिमा को अपना क्लीनिक दे दिया। तो वहीं पुणे के केंद्र से फिजियोथेरेपी और वहां काम करने वाले डॉक्टर और कर्मचारी भी इसी क्लीनिक में आ गए। पुणे का ये केंद्र अंग्रेजों के जाने के साथ ही बंद होने वाला था, जिसके चलते फातिमा के लिए क्लीनिक में डॉक्टरों का बंदोबस्त करना और आसान हो गया।

और इसके बाद मई 1947 में इस क्लीनिक ने काम करना शुरू किया और एक साल के अंदर ही यहाँ करीब 80 बच्चों का इलाज होने लगा। इस क्लीनिक को अखबार के माध्यम से चर्चा में आने का मौका मिला जिसके बाद फातिमा ने अमेरिका और इंग्लैंड में भाषण के जरिए पोलियो से ग्रसित बच्चों के लिए एक अस्पताल खोले जाने की जरूरत पर भारत सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचा

फातिमा के भाषणों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने 1953 में खुद एक ऐसे ही अस्पताल का उद्घाटन किया हालांकि, इसके बाद 1959 में फातिमा ने पोलियों से पीड़ित बच्चों के लिए एक स्कूल भी खोला, और इसके बाद तो धीरे-धीरे फातिमा ने करीब 300 ऐसे ही स्कूलों की लाइन लगा दी।

फातिमा अपनी पूरी जिंदगी के दौरान ये सभी काम बिना किसी मतलब से किए, जिसके चलते उन्हें 1958 में पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। ये फातिमा के ही मेहनत और लगन का फल है जिसके चलते ना सिर्फ उनकी बेटी बल्कि 2011 में पूरा देश पोलियों से मुक्त हो पाया है।

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