पहाड़ों की गुमनाम योद्धा, जिसने बना डाला अपना जंगल

आपने कटते पेड़, खत्म होते जंगल और उजड़ते बगीचो के देखा होगा, इसके अलावा अगर बात करें तो शायद उन चंद नेताओं को तस्वीर देखी होगी जो एक पेड़ लगाते हैं और अखबार से लेकर मीडिया तक की सुर्खियां बन जाते हैं. लेकिन बाद में उस पेड़ का क्या हुआ किसी को कुछ मालूम नहीं होता. क्योंकि अखबार में नाम आया ये काफी है…हां मगर आपने ऐसे लोगों को नहीं देखा होगा जो अपने दम पर एक एक पेड़ या दो पेड़ नहीं, पूरा जंगल तैयार कर दें.

अगर वाकई आपने किसी ऐसे इंसान को नहीं देखा तो हम आपको मिलाने आए हैं एक ऐसी ही हिम्मती और जुनूनी महिला से जिन्होंने अपने दम पर पहाड़ों की बंजर जमीन पर भी हरा-भरा जंगल तैयार कर दिया.

पिछले पचास सालों से जंगलों को सहेज रही प्रभा देवी सेमवाल

पिछले पचास सालों में जंगलों को सहेजने में जी-जान से जुटी ये महिला का नाम प्रभा देवी सेमवाल है. जहां एक तरफ विकास के नाम पर हम अपने जंगलों को खत्म कर रहे हैं, वहीं प्रभा देवी अकेले अपने दम पर जंगल तैयार कर रही हैं. लेकिन अफसोस गुमनामी के दौर में खोई प्रभा देवी को आज शायद ही कोई जानता होगा. क्योंकि मीडिया से लेकर टीवी चैनल्स को इनके लिए वक्त नहीं है. लेकिन इनके पास शायद बहुत वक्त है. तभी तो पिछले पचास साल से प्रभा देवी जंगल को हरा भरा करने में लगी हुई हैं.

उत्तराखंड में मौजूद केदारघाटी के पसालत गांव की रहने वाली प्रभा देवी सेमवाल आज वो शख्सियत हैं, जिन्होंने अपने हौसलों से ये साबित कर दिखाया है की विकास के बीच में हरियाली को साथ लेकर चला जा सकता है. बिना जंगलों को काटे ही सब कुछ किया जा सकता है. यही नहीं आज प्रभा देवी हिमालय की उन अडिग हस्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो हिमालय को बचाने और उसे खूबसूरत बनाने का काम कर रहे हैं. उम्र के 66 पड़ाव पर कर चुकी प्रभा देवी सेमवाल का आज खुद का जंगल है, जिसे इन्होंने खुद लगाया है, लगाया ही नहीं उसे पाला भी है. इसके साथ इस उम्र में भी प्रभा देवी की दिनचर्या अपने खेत, जानवरों और पेड़ों के आस पास ही घूमती है.

इसको लेकर प्रभा देवी खुद कहती हैं कि सालों पहले गांव जब यहां अवैध कटाई का काम जोरों पर, वहीं अक्सर होते भूस्खलन के कारण जंगल से रोजमर्रे की जिंदगी जीने में काफी परेशानी आने लगी थी. मैंने उस समय यहां के जंगलों को सिमटते देखा था, हरियाली को खत्म होते देखा था. जिससे यहां रहने वाले जानवरों की भी परिस्थितियां बिगड़ने लगी थी. यहीं से मैंने अपने जीवन में जंगल की उपयोगिता को समझते हुए जंगल को बचाने का संकल्प लिया और इसकी शुरुवात मैंने अपने ही खेत से की. अपने खेत में मैंने पेड़ लगाए और जंगल सहेजने की शुरुवात कर डाली.

मेरी मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी, और मेरे खेत एक हरे-भरे जंगल में तब्दील हो गए. उम्र के इस पड़ाव में मैं अब तक पांच सौ से अधिक पेड़ लगा चुकी हूं. इन पेड़ों में इमारती लकड़ियों से लेकर, बांझ, बुरांस, दालचीनी और कई स्थानीय पेड़ हैं.

जंगलों की बचाना ही जिंदगी का उद्देश्य-प्रभा देवी सेमवाल

आपको बता दें कि, प्रभा देवी के तीन बेटे और तीन बेटियां हैं और सभी लोग देश-विदेश में अच्छी तरह सेटल हैं. सभी बच्चों ने प्रभा देवी को अपने पास कई बार बुलाया, लेकिन जंगलों से प्यार और पहाड़ों की हरियाली है की प्रभा देवी का कहीं और मन नहीं लगने देती. उम्र के 66 पड़ाव पार कर चुकी प्रभा देवी चाहती हैं उनकी जिंदगी सुकून से यहीं उनके पेड़ों के बीच कटे.

जाहिर है जिस तरह का अटूट प्रेम और परवाह प्रभा देवी को पेड़ों और जंगलों से है, उसका आधा प्रतिशत भी हमें होता तो शायद हम न तो अपने जंगलों को यूं खत्म होते देख पाते और न विकास का नाम देने वाले लोगों को खत्म करने देते. आज हम नौकरियों की तलाश में अपने गांवों से पलायन कर रहे हैं. लेकिन हमें अपने बदलते परिवेश की शायद बिल्कुल भी चिंता नहीं है. आज वक्त है बरसों से पड़ी आईने की धूल को साफ कर उन लोगों को पहचान दी जाए, जो इसके असल हकदार हैं. न की उन लोगों को जो एक पेड़ लगाकर फोटों खिंचाकर भूल जाते हैं. ऐसा करने से शायद हमारे रियल हीरोज को नई पहचान मिल सके. लोगों तक उनकी बातें पहुंच सके….

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