पलायन नहीं, पढ़ाई से बदलेगा राज्य- Kislay Shrama

पलायन देश के गरीब राज्यों में एक बड़ी समस्या है। अच्छी पढ़ाई, लाइफ, करियर या काम के कारण गांव या छोटे शहरों या राज्यों के लोग आमतौर पर पलायन करते हैं। पलायन का दर्द पलायन करने वालों ही जानते हैं। लेकिन पलायन करने वाले सभी लोग अपने घर वापस आ पाते हैं, ऐसा नहीं है। कई तो दोबारा वहां जाने तक की नहीं सोचते, क्योंकि उनकी लाइफ सेट हो गई होती है। अब बिहार की ही बात कर लें तो यहां से पलायन का सिलसिला बहुत पुराना है। इसके अपने कारण हैं, बिहार से लोग  नौकरी और पढ़ाई इन्हीं कारणों से दिल्ली या देश के किसी अन्य राज्यों की ओर या देश से बाहर पलायन करते हैं।

पलायन करने वालों में ज्यादातर यह तो मानते हैं कि उनके राज्य की स्थिति खराब है, लेकिन जब वे इस काबिल हो चुके होते हैं कि अपने राज्य के लिए कुछ करें, तब ज्यादातर लोग वापस नहीं लौटते। लेकिन इनमें से ही कुछ ऐसे होते हैं, जिनका सपना अपने राज्य को तरक्की करते देखना होता है। ऐसे लोग अपने राज्य के लिए कुछ करने को बेताब होते हैं और शायद इन्हीं में से एक हैं पटना के किसलय शर्मा। जिनके पास कभी मौका था की वे न्यूयॉर्क में सेटल हो जाते या भारत आने पर भी मुंबई और बैंगलोर जैसे शहरों में अच्छी नौकरी कर सकते थे। लेकिन उन्होंने इस सबसे इत्तर चुना अपने राज्य में जाकर, वहां के बच्चों को शिक्षित करने का काम।

Kislay Shrama: दुनिया बातों से नहीं, प्रयासों से बदलती है

किसलय बताते हैं कि जब वे पटना साइंस कॉलेज में थे। उन्हें ग्रेजुएशन के बाद मास्टर्स के दौरान न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में 5 महीने के लिए इंटर्नशिप का मौका मिला था। वे बताते है, ”लेकिन मैं 4 महिनों में वापस आ गया क्योंकि यहां एग्जाम देना था, हालांकि इंटर्नशिप यहां आने के बाद भी जारी रहा”। किसलय मैथेमेटिक्स के पार्शियल डेरिवेटिव सबजेक्ट में रिसर्च के लिए न्यूयॉर्क गए थे। वापस आने के बाद किसलय के पास बड़ा मौका था कि वे देश के किसी बड़े सेक्टर में अच्छी और मोटी सैलरी वाली जॉब कर सकते थे। लेकिन किसलय ने जो रास्ता चुना वो चुनौतीपूर्ण था, लेकिन यह ऐसा काम था जिससे फायदा बिहार और बिहार के उन बच्चों को मिलता जो बेहतर भविष्य का सपना तो देख सकते थे लेकिल आर्थिक तंगी और जागरूकता की कमी के कारण उसे पूरा नहीं कर पाते।

किसलय कुमार जो पटना के रहने वाले हैं, वो कहते हैं — घर में पढ़ने और पढ़ाने का माहौल था। इसी माहौल का नतीजा था कि मुझे मौका मिला बाहर जाने का और इंटर्नशिप करने का। लेकिन मेरे मन में इसी समय एक सवाल भी था। मैं देखता था कि कई बच्चे जो पढ़ने में अच्छे थे, लेकिन उसके मुताबिक उन्हें सफलता नहीं मिलती थी। मैने इसके कारणों के बारे में जाना तब पता चला कि जागरूकता की कमी है। उन्हें पता ही नहीं चलता था या उन्हें कोई बताने वाला ही नहीं था। कॉलेज टाइम से ही यह बात मन में थी, मैं अमेरिका तक पहुंचा, लेकिन मेरे दोस्त जो मुझसे भी अच्छे थे वे नहीं पहुंचे। इसीलिए अमेरिका से आकर मैने यहां के वैसे बच्चे जो फाइनेसियली वीक हैं, उन्हें मुफ्त में पढ़ाने का काम शुरू किया।

 Kislay Shrama ने बताया, आखिर क्या है “Jagriti A Social Awakening”

किसलय की मानें तो ‘जागृति अ सोशल अवेकिंग’ की शुरूआत तो पहले ही साल 2013 में हो गई थी। मैं भी बिहार के अन्य बच्चों की तरह था, जो पढ़ने के साथ पढ़ाने का काम भी किया करते थे। उस समय ज्यादा समय नहीं दे पाता था, लेकिन अमेरिका से वापस आने के बाद इस पर और जोर देकर मैनें काम करना शुरू किया। किसलय ने हमें बताया कि अमेरिका से वापस आने के बाद जागृति को उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए पूरी तरह से खोल दिया। जो भी बच्चा जो आर्थिक तंगी से जूझ रहा है, लेकिन अगर वो पढ़ना चाहता है, पढ़कर आगे बढ़ना चाहता है उसका जागृति संस्थान दिल खोल कर स्वागत करती है।

यह पता करने के लिए कि पढ़ाई करने के लिए आया छात्र गरीब है या नहीं इसके लिए किसलय अपने लेवल पर जांच भी करते हैं, ताकि संस्थान की इस व्यवस्था का लाभ जरूरतमंद बच्चों को ही मिल सके। वे कहते हैं ‘बच्चे तो नादान होते हैं, वे कुछ भी कह सकते हैं इसलिए ऑथेंसिटी के लिए हम  डायरेक्ट उनके पैरेंट्स से बात करते हैं और जाकर उनकी कंडीसन भी देखते हैं।’ जागृति संस्थान बच्चों की पढ़ाई का हर एक खर्च उठाती है। साथ ही यहां पढ़ने के लिए बच्चों के पास कोई स्पेसिफिक केटोगरी नहीं है। यानी ऐसा नहीं है कि बड़ी जाती का बच्चा है तो यह मान लिया जाता है कि वो गरीब नही होगा। अगर गरीब है तो उसकी भी पढ़ाई का खर्च हम उठाते हैं।

कैसे काम करती है Kislay Sharma की संस्था?

जागृति के बारे में इतना कुछ जानने के बाद एक सवाल बनता है कि आखिर इसका खर्च यह संस्था उठाती कैसे है? यह सवाल हमने भी किसलय से पूछा। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है की यहां सिर्फ गरीब बच्चों को ही पढ़ाया जाता है। यह संस्थान हर बच्चों के लिए है। जो बच्चे फीस का खर्च उठा सकते हैं वे प्रॉपर फीस देकर पढ़ाई करते हैं। तो हम उन्हीं बच्चों की फीस से फ्री में पढ़ रहे छात्रों का खर्चा उठाते हैं। अपने संस्थान में किसलय और उनके पिता दो अन्य टीचरों के साथ बच्चों को पढ़ाते हैं।

वे कहते हैं ‘मेरा पूरा फोकस बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता को भी जागरुक करने पर रहता है। हम 8वीं कक्षा से 12वीं कक्षा तक कोचिंग दे रहे हैं। इन पांच सालों में अगर इनकी अच्छी शिक्षा और मार्ग दर्शन हो जाएगी तो आगे के जीवन के बारे में यह बच्चे बेहतर निर्णय ले सकेंगे।

“Jagriti a Social Awakening” को शुरू कर सचमुच किसलय ने एक मिशाल कायम किया है। लेकिन कहते हैं न किसी भी चीज को बनाने के बाद असल चुनौती होती है उसे टिका कर रखना। जागृति को चलाने में और इसके बारे में बच्चों तक जानकारी फैलाने किसलय का सफर आसान नहीं है। बिहार में हाल ही में बढ़े क्राइम रेट से एक बार फिर से व्यपारियों से लेकर शिक्षक वर्ग में भय का माहौल है। किसलय बताते हैं कि कई बार रंगदारी मांगने वालों के कॉल्स आए हैं। लेकिन मैं अपने काम में लगा हुआ हूं।

किसी ने कहा है कि मरी मछलियां ही सागर के बहाव की दिशा में तैरती हैं, जिंदा तो लहरों के विपरीत तैरती हैं। पलायन का दंश झेल रहे बिहार में किसलय शर्मा जैसे नौजवान भी हैं जो सभी दिक्कतों के होने के बावजूद बिहार में ही रहकर अपने भविष्य की चिंता किए बगैर बिहार के आने वाले भविष्य को सवांरने में लगे हैं। किसलय को उनके काम के लिए बिहार सरकार की ओर से 2017 में स्किल अवार्ड भी मिल चुका है। साथ ही वे बताते हैं कि अब पटना से निकलकर कर वे “Jagriti a Social Awakening” को बिहार के अन्य जिलों तक भी ले जाएंगे ताकी अधिक से अधिक बच्चों को इसका लाभ मिल सके।

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