नार्थ—ईस्ट घूमिए और महिलाओं के मार्केट में करिए शॉपिंग

मार्केट का मतलब हिंदी में बाजार होता है। यह बात तो हम सब जानते हैं और बाजार में हमारी जरूरत की चीजें बिकती हैं। लेकिन अगर आप मार्केट जाते हैं तो क्या एक बात नोटिस करते हैं कि, मार्केट की दुकानों पर कितनी संख्या में महिला दुकानदार हैं। शायद ही कभी नोटिस किया हो, दरअसल शुरू से देश के ज्यादातर हिस्सों में इस सेक्टर को लेकर भी एक रूढ़िवादी सोच हैं कि, दुकानों पर महिला दुकानदारों की क्या जरूरत! हां आज कल मॉल कल्चर के कारण कई सिंगल दुकानों के काउंटर पर भी लड़कियां या औरतें दिखने लगी हैं। लेकिन अभी भी बदलाव बहुत हद तक होने की जरूरत है। लेकिन क्या आप थोड़ा-सा अलग और यूनिक मार्केटिंग का मजा लेना चाहते हैं? अगर हां तो हम आपको कुछ ऐसे ही मार्केट के बारे में बताएंगें जहां आपको यह अनुभव मिलेगा।

वैसे मार्केटिंग का यह नया अनुभव लेने के लिए आपको देश से कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है। यह यूनिक एक्सपीरियंस आपको यहीं इंडिया में मिल जाएगा। बस थोड़ा टूर पर निकलना पड़ेगा। अगर आप घूमने के शौकीन हैं तो आप इस अनुभव को जरूर लेना चाहेंगे।

Mother Market- अनोखे मार्केट का अनोखा अनुभव

अगर आपको प्रकृति का आनंद लेना है और भारत के अनोखे कल्चर को एक्सप्लोर करना है तो नार्थ ईस्ट में कई अच्छी जगहें हैं। सात बहनें और इनका एक भाई मतलब भारत के ये आठ राज्य दुनिया की हर खूबसूरती को अपने अंदर समेटे हुए हैं। यहां घूमने के लिए काजीरंगा नेशनल पार्क और मानस नेशनल पार्क है जहां आपको रेड पांडा देखने को मिलेगा, तो वहीं यहां कई प्रकार की यूनिक वनस्पितियां हैं। वहीं यहां माजुली आइलैंड है। हिन्दू तीर्थ स्थल हैं जैसे कामाख्या मंदिर, युमथांग वैली,  युमेस्मडॉन्ग जिसे जीरो प्वांइट कहा जाता है, चोपटा वैली और माउंटेन कटावो जैसी कई खूबसूरत जगहें हैं।

इन जगहों पर अगर घूमने जा रहे हैं तो घूमने के साथ शॉपिंग भी जरूरी है। तो नार्थ ईस्ट में यूं तो कई मार्केट हैं। लेकिन एक मार्केट ऐसा है जैसा सिर्फ यहीं देखने को मिलेगा। यह मार्केट म्यांनमार सीमा से 70 कि.मी पहले पड़ता है। हम बात कर रहे हैं ईमा कैथा मार्केट की। वैसे इस मार्केट को ‘मदर मार्केट’ के नाम से भी जानते हैं। इस मार्केट में आप हर चीज की शॉपिंग कर सकते हैं और इसकी सबसे यूनिक बात यह है कि इस मार्केट की हर दुकान पर आपको महिला दुकानदार ही दिखेंगी। कोई मर्द नहीं मिलेगा! क्यों है न यूनिक।  इस मार्केट में करीब 4000 से अधिक महिला दुकानदार हैं। इस मार्केट में पूजा के समान से लेकर, खाने पीने का समान और कपड़े सब कूछ मिलता हैं।

Mother Market- आखिर कैसे हुई इस अनोखे बाजार की शुरूआत

ईमा कैथल मार्केट कितना पुराना है इसके बारे में कोई ज्यादा स्पष्ट सबूत तो नहीं हैं लेकिन एक बात स्पष्ट है कि यह मार्केट 16वीं सदी में यहां पर लगना शुरू हुआ था। ये 1533 के आस-पास का समय था जब इस बाजार का की नींव रखी गई थी। तब से लेकर आज तक इस मार्केट में महिलाएं ही दुकान लगाती हैं। इस बाजार में लगभग 4000 दुकानें है और इस बाजार में कोई भी पुरुष नहीं है। जिस समय इस मार्केट की शुरूआत हुई थी उस समय मुद्रा का चलन नहीं था ऐसे में यहां की महिलाएं सामान एक दूसरे के साथ अदला बदली करतीं थीं। मतलब यहां बाटर सिस्टम का दौर था। ये सबसे अनूठा बाज़ार है।

मणिपुर पर किए गए कई शोध लालुप-काबा नाम के एक पुराने सिस्टम का जिक्र करते हैं जो मणिपुर का एक तय मानक था। यानी पुरुष घर से दूर जाकर काम करेंगे और लड़ाइयां लड़ेंगे। वहीं महिलाएं घर में अपने खेतों में काम करेंगी और उससे आने वाला सामान मार्केट में बेचेंगी। उस समय से ही ऐसे बाज़ार बन गए जहां महिलाएं खरीद-फरोख्त करती थीं। अंग्रेजों का जमाना आने तक यह मार्केट स्थाई नहीं था, लेकिन अंग्रेजों ने मणिपुर पर कई तरह के टैक्स लगाए। आलम यह था कि हर लोकल सामान अंग्रेजों की बटालियन के पास चला जाता था। लोकल लोगों की जरूरतों का ध्यान नहीं दिया जाता था। ऐसे में मणिपुर की महिलाओं ने अंग्रेजों के इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई और 1939 में महिलाओं ने ‘नुपी लान’ यानी जंग छेड़ दी। 

ब्रिटिश राज के सख्ती के बाद भी यहां की महिलाओं ने कई रैलियां निकालीं, अपने हक की लड़ाई लड़ी और एक ऐसी जगह बनाई जहां महिलाएं अपना सामान बेच सकती थीं। इसी को नाम दिया गया ईमा कैथाल। अंग्रेजों ने इस मार्केट को तोड़ने की भी कोशिश की लेकिन महिलाओं के आगे एक न चली। तब से लेकर अब तक महिलाओं का यह मार्केट ऐसे ही चल रहा है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ये थोड़े समय के लिए बंद हुआ था लेकिन फिर से शुरू हो गया।

सिर्फ शादी-शुदा महिलाएं ही दुकान लगा सकती हैं 

इस मार्केट में दुकान लगाने के लिए सिर्फ शादीशुदा महिलाओं को ही इजाजत है। वहीं यहां की दुकानें पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर होती हैं। वही दूर दराज की महिलाएं अगर यहां स्टॉल लगाना चाहती हैं तो 40 से 60 रुपए में उन्हें जगह मिल जाती है। महिलाओं का अपना एक यूनियन भी है। यहां महिला दुकानदारों के लिए क्रेडिट सिस्टम भी है। महिलाएं सामान पहले लेकर बाद में उसकी रकम यूनियन को चुका सकती हैं।

मणिपुर का यह मार्केट जितना अनूठा है उतना ही यहां के कल्चर से भरपूर है। यह अनोखा बाज़ार वहां के कल्चर को दिखाता है और साथ ही इतिहास की रोचक झलक भी देता है। हर सुबह बेहद खूबसूरत ट्रडिशनल ड्रेस सैरोंग और शॉल में महिलाएं यहां आकर अपना काम करती हैं। इस मार्केट में आपको वह सब कुछ देखने को मिलेगा जो एक मार्केट में दिखता है जैसे पॉलिटिक्स की बातें, मार्केट की बातें, बड़ी चर्चाएं बस फर्क यही हैं कि ये सब करने वाली यहां महिलाएं हैं। अगर नार्थ—ईस्ट पहुंच रहे हैं तो इस मार्केट में शॉपिंग का लुत्फ तो जरूर उठाएं।

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