नागा साधु : धर्म के वो रखवाले, जिनके आगे औरंगजेब की सेना ने भी घुटने टेक दिए

नागा…. नाम सुनते, सबके दिमाग में बड़ी—बड़ी जटाओं वाले बाबाओं की तस्वीरें सामने आ जाती हैं…. कुंभ का नाजारा दिखता हैं. जिसमें ऊछलते—कूदते निर्वस्त्र साधुओं का झुंठ नदी में स्नान करने के लिए जा रहा होता है. लेकिन सिर्फ कुंभ क्यों? क्योंकि कुंभ ही एक ऐसा समय होता है. जब नागा बाबा हमें हर तरफ टीवी स्क्रीन पर दिखाई देते हैं. साधुओं का यह झुंड कुंभ के बाद कहां चला जाता है. यह किसी को नहीं पता. इसके बाद ये कभी दिखाई तक नहीं देते. लेकिन ऐसा क्यों…?

आखिर ये नागा कौन हैं और कहां से आते हैं कहां चलें जाते हैं…? कौन लोग नागा बनते हैं और नागा बनने का तरीका क्या है…? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो नागा साधुओं को देखकर हर एक व्यक्ति के मन में उठते रहते हैं. लेकिन आज हम सनातन धार्मिक परंपरा के संन्यास जीवन के सबसे ऊचें पदों पर आसीन रहने वाले इन नागाओं की सीक्रेट को डीकोड करेंगे.

कौन है…नागा साधु?

नागा साधु

कहते हैं जब-जब सनातन धर्म पर संकट गहराता है और सारी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं.. तब सिर्फ एक ही आखिरी उम्मीद बचती है और वो उम्मीद नागा साधु हैं. जब सनातन धर्म पर खतरा गहराया है इन नागाओं ने शास्त्र के संग ही शस्त्र से भी उसकी रक्षा की है. लेकिन नागा हैं कौन…? राख से लिपटे हुए, बिना लिबास वाले,  माथे पे तिलक,  हाथों मे त्रिशूल और आंखों में हरदम एक अलग सा गुस्सा और जुबां पर हर दम ‘हर हर महादेव का नारा इन नागाओं की पहचान है. जो हमेशा कुंभ के समय गंगा घाटों पर हजारों की भीड़ के साथ उमड़ पड़ते हैं.

कहते हैं ये लोग कर्म से हठी और धर्म के रक्षक हैं, ये लोग संस्कृति की आन हैं और सभ्यता के पहरेदार हैं.

बात जब नागा साधु परंपरा के शुरूआत की आती है तो हमें दो तरह की जानकारी मिलती है. पहली ये कि यह त्रेता युग से ही शुरू हुआ था और इसे भगवान दत्तात्रेय ने शुरू किया था. भगवान दत्तात्रेय  हिन्दूधर्म के त्रिवेणी माने जाते हैं, जिन्होंने उस समय धर्म की स्थापना की थी. वहीं दूसरी जानकारी जगद्गुरु शंकराचार्य से जुड़ी है. जानकार कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय के ही काम को शंकराचार्य ने आगे बढ़ाया था.

कहते हैं कि भारत में अखाड़ों की परम्परा जगद्गुरु आदिशंकराचार्य के द्वारा ही शुरू की गई थी. शंकराचार्य ने सनातन धर्म को बचाने के लिए कई बड़े कदम उठाए. इसके लिए उन्होंने पूरे भारत वर्ष में चार जगहों पर पीठों की स्थापना की, जहां से सनातन धर्म के प्रत्येक क्रिया-कलापों को भारत के चारों दिशाओं में किया जाता था. ये थे गोवर्धन पीठ,  शारदा पीठ,  द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ. इसके अलावा उन्होंने 7 मठों महानिर्वाणी, निरंजनी, जूना, अटल, आवाहन, अग्नि और आनंद अखाड़े की भी स्थापना की. इन अखाड़ों के जरिए आदिगुरू ने मठों-मन्दिरों की सम्पत्ति को लूटने वालों और श्रद्धालुओं को सताने वालों से मुक़ाबला करने के लिए सन्यासियों को शास्त्र के साथ शस्त्र की शिक्षा भी देने का प्रावधान किया. ताकि वक्त आने पर वे आक्रमणकारियों का मुकाबला भी कर सकें.

इन अखाड़ों के सबसे प्रमुख साधु को महामंडलेश्वर कहा जाता है. इन्हीं अखाड़ों में हर तरह के साधु होते हैं और इन सभी साधुओं में सबसे ऊंचा स्थान नागा साधुओं का होता है. इसलिए कुंभ में सबसे पहले स्नान का हक इन्हीं नागाओं को मिलता है. अब तो अखाड़ों के नंबर भी बढ़ गए हैं. लेकिन जूना अखाड़ा जो सबसे पुराना अखाड़ा है,  उसमें नागा साधुओं की संख्या आज भी सबसे अधिक है. नागा भलें ही आपकों अलग इसलिए लगते हों क्योंकि ये लोग नग्न रहते हैं… लेकिन असल में एक नागा बनना इतना आसान नही है. कहा जाता है कि 12 साल की कठिन तपस्या के बाद ही एक आम इंसान नागा साधु बन पाता है.

कैसे कोई बनता है नागा साधु…?

नागा साधु

नागा साधु बनने के लिए लगभग 12 साल लग जाते हैं. नागा पंथ में शामिल होने के लिए किसी भी आदमी को जानकारी हासिल करने में हीं छह साल लगते हैं. इस दौरान जो नए सदस्य होते हैं वे एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते. कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर निर्वस्त्र रहते हैं.

नागा बनने के लिए सबसे पहली शिक्षा ब्रह्मचारी बनने की है. इस परीक्षा को पास करने के बाद महापुरुष दीक्षा होती है. बाद की परीक्षा खुद के यज्ञोपवीत और पिंडदान की होती है जिसे बिजवान कहा जाता है. अंतिम परीक्षा दिगम्बर और फिर श्रीदिगम्बर की होती है. दिगम्बर नागा एक लंगोटी धारण कर सकता है, लेकिन श्रीदिगम्बर को बिना कपड़े जीवनभर रहना होता है. ये नागा साधु ज्यादात्तर अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में रहते हैं. वहीं इनमें से कुछ हिमालय या ऊंचे पहाड़ों की गुफाओं में जीवन बिताते हैं. नागा साधु बनने के लिए किसी भी आदमी को तीन स्टेज फालों जरूर करने होते हैं. हम एक—एक करके इसके बारे में आइए जानते हैं.

पहली स्टेज – यह किसी स्कूल में एडमिशन की तरह है. स्कूल की तरह ही यहां भी जांच—पड़ताल और पेपर वर्क होता है. लेखा-जोखा रखने वाला मठ का आदमी ब्यौरा लेकर उसे नोट करता है. साधु बनने के इच्छुक व्यक्ति का नाम, गुरु का नाम, जॉइनिंग डेट इत्यादि ये सब नोट होता है. उसके बाद कैंडिडेट का सर मुंडवा दिया जाता है, फिर वह अपने मंत्र गुरु के पास पहुंचता है. जिसके बाद गुरु और शिष्य अग्नि के पास त्रिकोण बनाकर बैठते हैं और  ईश्वर को फूल और जल अर्पित करते हैं. इस अवसर पर चार और गुरु वहां मौजूद होते हैं. ये भावि नागा को विभूति (भस्म), लंगोटी, जनेऊ और रुद्राक्ष देते हैं. इसके बाद नागा साधु बनने के इच्छुक व्यक्ति के सर की चोटी भी हटा दी जाती है. अब मंत्र गुरु उसके कान में तीन बार मंत्र बोलते हैं. जिसके बाद उस व्यक्ति को नया नाम दिया जाता है. इस नए नाम के साथ पहली स्टेज पूरी होती है और उस व्यक्ति को अब से महापुरुष कहा जाने लगता है.

दूसरी स्टेज – नगा साधु बनने के दूसरे स्टेज में महापुरूष के संन्यासी बनने के पहले का प्रोसेस शुरू होता है. इस दौरान यज्ञ सबसे मुख्य होता है. विराज हवन नाम का एक यज्ञ होता है, जो मुख्य रूप से कुंभ मेले के समय पर होता है. इस दौरान जो व्यक्ति नागा साधु बनने आया है, उसे आखिरी चेतावनी दी जाती है कि यह अब भी जा सकता है. इसके बाद उसके कपड़े उतार कर कुछ कदम उत्तर दिशा की ओर चलने को कहा जाता है, यह एक तरह का सिंबल है हिमालय यात्रा की. सूरज ढलने के बाद महापुरुष अखाड़े में लौटता है. यहां चार कोनों में चार चिताएं जल रही होती हैं. इन्हीं चिताओं की आग में मुख्य यज्ञ शुरू होता है. इस समय ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त का उच्चारण किया जाता है. संत के मुताबिक इस सूक्त को हिंदूओं के अंतिम संस्कार के समय गाया जाता है.

नागा साधु

यानि यह वह प्रक्रिया होती है. जिसमें महापुरूष खुद का अंतिम संस्कार करता है. यानि अब से वो मान लेता है कि वो दुनिया के लिए मर चुका है… संसार से उसके सारे रिश्ते—नाते खत्म हो चुके हैं, उसका कोई मां, बाप, भाई और बहन आज के बाद इस दुनिया में नहीं होगा. यानी अब वो सन्यासी बनने के लिए तैयार है. सुबह-सवेरे आधे पानी में कुछ और संस्कार होते हैं और फिर सन्यासी बनने की ये प्रक्रिया पूरी हो जाती है.

तीसरी स्टेज – इसे नागा साधु बनने की प्रक्रिया का अंतिम चरण माना जाता है. सन्यासी से नागा बनने का प्रोसेस सबसे ज्यादा कठिन होता है. यह घड़ी कठिन परीक्षा की होती है. इतना ही नहीं यह परीक्षा ली जाती है रात के घने अंधेरे में, कीर्ति-स्तंभ के सामने. कीर्ति-स्तंभ अखाड़े के बीचों-बीच एक लंबा खंबा होता है. संन्यासी चार श्रीमहंतों के साथ कीर्ति-स्तंभ के सामने पहुंचता है….. यहां एक आचार्य जल का लोटा लिए खड़े रहते हैं. आचार्य सन्यासी के ऊपर जल चढ़ाते हैं और फिर पूरी ताकत से उसका लिंग खींचते हैं. यह प्रक्रिया तीन बार होती है. इसे टांग तोड़ संस्कार भी कहते हैं. 

ऐसा माना जाता है कि टांग तोड़ में सन्यासी के लिंग के नीचे का मेम्ब्रेन तोड़ दिया जाता है जिससे उसका लिंग कभी भी उत्तेजित अवस्था में नहीं आता। इससे उसके अंदर की काम की इच्छा ही मर जाती है वह वासना और काम के किसी भी किस्म से मुक्त हो जाता है। इससे उसके अंदर की काम की इच्छा ही मर जाती है वह वासना और काम के किसी भी किस्म से मुक्त हो जाता है। लेकिन इस तरह से वे केवल शारीरिक रूप से ही काम वासना से अलग होते हैं मानसिक रूप से खुद को इससे दूर करने के लिए उन्हें कई सालों तक घोर तप करना होता है।

“महिला नागा साधु”

कुंभ में नागा साधुओं के अलावा महिला नागा साधु  कुंभ में लोगों के कौतूहल का विषय रहती हैं। लेकिन हम आपको बता दें कि नागाओं में महिला नागा साधु जेसा कोई शब्द ही नहीं है। इन महिलाओं को इस परंपरा में ‘माई’ कहा जाता है। यानि इन्हें मां का दर्जा दिया गया है। महिलाओं को भी पुरूषों की तरह ही कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ता है। बता दें कि पहले यह परंपरा केवल नेपाल में देखने को मिलती थी… लेकिन बाद में यह परंपरा दंनिया भर में फैली। आज विदेशों से ज्यादात्तर महिला और पुरूष नागा साधु बनने के लिए आ रहे हैं. 

जब धर्म की रक्षा के लिए लड़े नागा साधु

नागा साधु

जब शंकराचार्य ने धर्म की रक्षा के लिए चार पीठों की स्थापना की तो उन्होंने साधुओं को शास्त्र के साथ ही शस्त्र विद्या के लिए भी प्रेरित किया था. तब से ही नागा साधु दोनों विद्याओं में दक्ष होने लगे. जिसका परिणाम कई बार देश के इतिहास में दिखा. हालांकि हमारे इतिहासकारों ने इनके बलिदान को वो तवज्जों नहीं दी. लेकिन जब भी देश के मंदिरों और सनातन धर्म पर बाहरी आक्रमण का खतरा मंडराया तब ये लोग आखरी और सबसे मजबूत दीवार की तरह उनके सामने खड़े रहे.

जोधपुर को बचाया :— जब काबुल और बिलोचिस्तान की और से आक्रमण कर मुसलमान जोधपुर तक आए तो उस समय नागाओं ने ही इस जगह को बचाया था. कहा जाता है कि उस समय मंदिर तोड़े जा रहे थे और कत्लेआम का माहौल था. मुस्लिम शासकों ने हर व्यक्ति पर भारी कर लगा दिया था. तब अटल सन्यासियों ने मुस्लिमों को परास्त किया था.

औरंगजेब से भिड़े थे नागा:— 1666 ईस्वी के हरिद्वार कुंभ मेला के अवसर पर सम्राट और औरंगजेब के सैनिकों ने आक्रमण किया. जिनका मुकाबला नागा संन्यासियों के साथ मिलकर साधु-संतों ने किया. इस लड़ाई में संतों की धर्म-ध्वजाएं देखकर मुगल सेना के मराठे भी संतों के साथ दल में मिल गए. औरंगजेब को भारी पराजय का मुंह देखना पड़ा. इसके पहले 1664 में औरंगजेब की सेना ने जब काशी विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था तब उसे नागाओं ने ही मुंह तोड़ जवाब दिया था. इसे बैटल ऑफ ज्ञानवापी कहा जाता है. इस बैटल में भी औरंगजेब की सेना को मुंह की खानी पड़ी थी. 

अब्दाली से लड़े :—  दशनामी अखाड़ों का जन्म ही धर्म और देश की रक्षा करने के लिए हुआ था. मुस्लिम शासक एक के बाद एक भारत पर आक्रमण कर रहे थे और लोगों पर जुल्म कर रहे थे. तब साधू संतों ने हथियार उठा लिए थे. इसका एक बड़ा उदहारण अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण के समय मिलता है. दिल्ली और मथुरा पर आक्रमण करता हुआ अब्दाली गोकुल पहुंच गया. लेकिन यहां उसके सामने नागा साधु दीवार बनकर खड़े हो गए. कुछ 5 हजार साधुओं की सेना कई हजार सैनिकों से लड़ गई. पहले तो अब्दाली साधुओं को मजाक में ले रहा था किन्तु तभी उसे मालूम हुआ कि ये लोग असाधारण लोग हैं. इस लड़ाई में 2000 नागा साधू वीरगति को प्राप्त हुए थे. लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही थी कि दुश्मनों की सेना चार कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी और भाग खड़ी हुई.

इनकी लड़ाई का एक जिक्र गजेटियर्स में भी मिलता है. 1751 में अहमद खां बंगस ने उस समय प्रयागराज कुंभ पर आक्रमण किया था. तब नागा साधु स्नान कर रहे थे. जिक्र आता है कि पहले साधुओं ने सारे संस्कार पूरे किए फिर उसके बाद उन्होंने बंगस की सेना से लड़ाई की, तीन महिने की लड़ाई के बाद बंगस की सेना साधुओं के सामने नतमस्तक हो गई.

सन्यासी विद्रोह और नागा:—  संन्यासी विद्रोह की शुरुआत 1770 में उत्तरी बंगाल से हुई थी. 1757 और 1764 की लड़ाई जीतकर अंग्रेज मजबूत हो गए थे. अब उन्होंने भूमिहीन किसानों व दस्तकारों का शोषण करना शुरू कर दिया था. तीर्थ यात्रियों के तीर्थ स्थलों पर यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा दिया. जिसके कारण यह आंदोलन भड़क गया. संन्यासी लोग हिन्दू नागा तथा गिरी के सशस्त्र संन्यासी थे जो पूर्व में सेनाओं में सैनिक रहे थे. सन्यासियों के विरोध में किसानों व दस्तकारों ने उनका पूरा साथ दिया. मंजर शाह, भवानी पाठक, मूसा शाह व देवी चौधरानी आदि प्रमुख आंदोलनकारी थे. यह आंदोलन मुख्य रूप से 1770 ई० में शुरू होकर 1800 ई० तक चला और पूर्णतया 1820 में जाकर खत्म हुआ जब अंग्रेजों ने बर्बता की हदें पार कर दीं. संन्यासी विद्रोह का विस्तृत वर्णन बंकिमचंद्र चटर्जी की किताब ‘आनन्द मठ’ में मिलता है. ‘आनन्द मठ’ को क्रांतिकारियों का बाईबिल कहा जाता है. हमारा राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ भी इसी पुस्तक से लिया गया है.

नागाओं के इन्हीं तप और बलिदानों के कारण ही इन्हें पूज्यनीय माना जाता है. ये वो लोग हैं जिन्होंने जीते जी अपने मौत को गले लगा लिया है और संपूर्ण जीवन धर्म के नाम कर दिया. अक्सर कई लोग इनके निर्वस्त्र होने का मजाक उड़ाते हैं और इन्हें असभ्य कहते हैं. लेकिन भगवान शिव के उपासक इन नागाओं को लोगों की सोच से कोई फर्क नहीं पड़ता, इनके लिए प्रकृति ही इनका वस्त्र है और धर्म ही इनका जीवन. 

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