देश का पहला ‘चप्पल-बैंक’, 8000 नंगे पैरों को दी चप्पल की सुरक्षा

सामाज के लिए वेलफेयर का काम और वो भी बिना किसी हेल्प के, यह बात सही नहीं लगती। क्योंकि वेलफेयर का काम सीमित धन में सीमित समय तक हो सकता है। लेकिन आज की स्टोरी इस कॉन्सेप्ट से थोड़ी अलग है और इसी नए कॉन्सेप्ट के कारण इसका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज है। कहानी से पहले आपको बता दें कि हम जिसके बारे में बात कर रहे हैं वो संस्था भारत का पहला ‘चप्पल बैंक’ चलाती है। जी हां, ‘चप्पल बैंक’, क्यों है ना शानदार नाम। नाम के ही जैसे इसका काम भी है। इस संस्था ने अपने ‘चप्पल बैंक’ से ऐसे कई गरीब बच्चों के नन्हें पांवों को चप्पल की सुरक्षा दी है। करीब आठ हजार नंगे पांव घूमने वाले बच्चों को इस बैंक के जरिए चप्पल पहनाई गई है।

लेकिन चप्पल बैंक तो इस संस्था के कई कामों में से सिर्फ एक काम है। इसके अलावा यह संस्था मिशन एजुकेशन, मिशन एडमिशन, ओरल हेल्थ अवेयरनेस मिशन, नो स्मोकिंग कैंपेन और गर्ल सेफटी जैसे कई काम करती है। हम जिस संस्था की बात कर रहे हैं वो मानवता के एक मूल सिद्धांत पर काम कर रही है यहीं कारण है कि इस पूरे ग्रुप का नाम ‘मानवता ग्रुप’ है। भारत में यह अपने तरह की शायद पहली और एकमात्र संस्था है। जो पब्लिक वेलफेयर का काम तो करती है लेकिन बिना किसी बाहरी फंड के। फिर सवाल उठता है कि आखिर मानवता ग्रुप वेलफेयर इस काम को अकेले कैसे कर लेता है?

चप्पल-बैंक

मानवता ग्रुप- मांगो नहीं कमाओं कॉन्सेप्ट से आगे बढ़ रहा ये ग्रुप

इस सवाल का जवाब है एक स्टार्टअप जिसका नाम है ‘चॉकलेट फॉर चैरिटी’। ‘मानवता ग्रुप’ ने पब्लिक वेलफेयर के लिए एक सिद्धांत बनाया है

और यह सिद्धांत ही इनके लिए एक नया कांसेप्ट है। यह कांसेप्ट है ‘मांगो नहीं कमाओं’। इस कांसेप्ट के जरिए जो भी इस ग्रुप से जुड़ा हुआ है वो स्वयं सहयोग करते हैं साथ ही मानवता ग्रुप अपने स्तर ‘चॉकलेट फॉर चैरिटी’ के जरिए पैसे जुटाता है।

2 वर्ष पहले मात्र 13,000 रुपयों से शुरू ‘चॉकलेट फॉर चैरिटी’ नाम स्टार्टअप का टर्नओवर आज हर साल लगभग 4 लाख रूपये है। इसका उद्देश्य स्वयं और संस्था को इंडिपेंडेंट बनाना है, जिससे फण्ड लेकर किसी पर निर्भर होने की बजाय सेल्फ डिपेंडेंट होना है।

चप्पल-बैंक

वहीं मानवता ग्रुप के सभी साथी अपनी पॉकेट मनी से भी सहयोग करते हैं और जो प्रशंसक हैं वे भी कभी-कभी सहयोग करते हैं। इस ग्रुप का आजतक का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि इसने किसी से कभी भी फंड नहीं मांगा क्योंकि इन्हें कभी कमी ही नहीं हुई।

मानवता ग्रुप के बारे में हम इतना तो जान गए लेकिन एक सवाल कह लें या जिज्ञासा मान ले वो अभी भी मन में रह गई है कि इसकी शुरूआत किसने और कैसे की? तो चलिए इस बारे में भी आपको बता देते हैं। ‘मानवता ग्रुप की शुरूआत ग्वालियर के रहने वाले आयुष बैध ने तब की थी जब वे मात्र 18 साल के थे। आयुष और उनकी टीम के इस ग्रुप ने पहले ही साल उस बस्ती के बच्चों के बीच अपनी पहुंच बनाई जहां किसी का ध्यान नहीं जाता था। ग्वालियर की कृष्णनगर बस्ती। आयुष के प्रयासों का ही फल था कि यहां पहला स्कूल खुला और बच्चों की पढ़ाई शुरू हो सकी। इसके बाद इस ग्रुप ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मानवता ग्रुप- जो निभा रहा है मानवता की सेवा का धर्म

आयुष की माने तो “मानवता ग्रुप एक संस्था नहीं बल्कि एक परिवार है निस्वार्थ भाव से सामाज के लिए कार्य करने वालों का। जहां कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं, किसी का कोई पद नहीं। किसी की कामयाबी पर हम कोई पार्टी नहीं करते, एक भी पैसा व्यर्थ में बर्बाद नहीं करते और न ही किसी तरह का कोई प्रदर्शन करते हैं। सब मिलकर एक साथ अपना योगदान देते हैं। वे बताते हैं कि 2015 में हुई शुरूआत में मुझे मेरे माता पिता का भी सहयोग मिला, अगर ऐसा नहीं होता तो मानवता ग्रुप भी शायद न होता क्योंकि उस समय मेरी उम्र केवल 18 साल थी। धीरे-धीरे मानवता की टीम बड़ी हुई और हौसला मजबूत। एक-एक करके 6 अलग-अलग अभियान भी शुरू हुए जिनके जरिए यह ग्रुप आज बिना रूके काम कर रहा है।

सच में आयुष बैध की मानवता की यह टीम सही मायने में मानवता की सेवा का धर्म निभा रही है। यह अपने आप में भारत की पहली पब्लिक वेलफयर का काम करने वाली संस्था है जो बिना किसी सहायता के बच्चों का भविष्य सवांरने के साथ ही समाज सुधार का काम भी कर रही है और युवाओं को अपने स्टार्टअप के जरिए भी सेल्फ वर्क करने और कामयाबी की गाथा लिखने का संदेश दे रही है।

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