दुनिया का नया साल, हमारी पंरपरा नहीं

नया साल, नई शुरुआत…हर कोई आने वाले नए साल को बेहतर बनाना चाहता है और जाते हुए पुराने साल को वहीं लानत भेज रहा है कि बहुत बुरा था ये साल….। नए साल को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं, प्लान बनने लगें हैं.. कहां जाना हैं… क्या बनेगा… किसकी बली चढ़ेगी बकरे की या मुर्गे की… मतलब फुल डे नाइट पार्टी के लिए दुनियाभर के लोग तैयार हैं। लैकिन क्या सच में 1 जनवरी नया साल है? क्यों सवाल चौकाने वाला है न !

बेशक 1 जनवरी नया साल है. लेकिन असल में हमारे देश की संस्कृति में यह दिन नए साल के पहले महीने का पहला दिन नहीं है।

भारत और ग्रेगोरियन कैलेंडर

आपमें से कई लोग कहेंगे कि क्या यार… हर बात में ये संस्कृति, परंपरा, देश की बात क्यों घुसेड़ दी जाती है..? तो जवाब ये है क्यों, अगर हम अपनी संस्कृति के बारे में नहीं जानेंगे तो हमारी खुद की यह समृद्ध संस्कृति एक दिन विलुप्त हो जाएगी। बात अपने देश की करें तो हमारा नया साल वसंत पंचमी जो मुख्यरूप से फरवरी में आता है  से लेकर अप्रैल महीने तक के बीच में पड़ता है। जिसे आज कल हम धर्म की बाऊंड्री से घेर चुके हैं और हिन्दू नव वर्ष के नाम से जानते हैं। 1 जनवरी का नया साल ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से मनाया जाता है। जिसे पोप ग्रेगोरी (Pope Gregory XIII) ने शुरू किया था। इससे पहले जूलियन कैलेंण्डर वेस्ट में यूज होता था। जूलियन में कई गलतियां थी जिसे ग्रेगोरी में ठीक किया गया।

वहीं जब अंग्रेज अपने देश से दूसरे देशों में गए और वहां शासन किया तो अपनी संस्कृति के वर्चस्व के लिए उन्होंने अपने कैलेंडर भी लागू कर दिये। भारत में भी अंग्रेजों ने कुछ ऐसा ही किया। जब देश आजाद हुआ तो दुनिया में यह कैलेंडर प्रचलन में आ गया था। ऐसे में हमारे देश में भी इसी का चलन चलता रहा। अंग्रेजों के रहते हम इसी कलैंडर के आदी हो चुके थे और उनके जाने के बाद भी बने रहे क्योंकि बात जैसे ही संस्कृति पर होती थी। वो हमेशा धर्म के मामले पर अटक जाती थी। लेकिन भारत सरकार ने एक भारतीय कैलेंडर अपनाया जो भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है। इसे भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर या शैल्यवाहन शक् कैलेंडर के नाम से जानते हैं। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आदेश पर इसे 22 मार्च 1957 को भारत के अधिकारिक कैलेंडर के रूप में अपनाया गया।

भारत का अधिकारिक शैल्वाहन शक् कैलेंडर और नया साल

इंडिया के ऑफिशियल कैलेंडर के बारे में बात करें तो भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर जो शैल्यवाहन शक् कैलेंडर  भी कहा जाता है। उसमें भारतीय संस्कृति में प्रचलित 12 महीने हैं। महीनों के ये नाम पहले तो बुजुर्गो के मुंह से सुनने को मिल जाते थे। लेकिन आज के डेट में शायद ही कोई आम तौर पर इनका उपयोग करता हुआ मिले। इन महीनों को आज के दौर में समझने के लिए ग्रोगेरियन कैलेंडर का सहारा लेना होगा। इस कैलेंडर का महीना चैत्र माह से शुरू होता है… अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से कहें तो यह चैत्र महीना 21/22 मार्च से 22 अप्रैल के बीच होता है। ऐसे ही
वैशाख — अप्रैल से मई  
— ज्येष्ठ — मई से जून
— अषाढ़ — जून से जुलाई
— श्रावण — जुलाई से अगस्त
— भाद्रपद — अगस्त से सितंबर
— आश्विन — सितंबर से अक्टूबर
— कार्तिक — अक्टूबर से नवंबर
— मार्गशीर्ष — नवंबर से दिसंबर
— पौष — दिसंबर से जनवरी
— माघ — जनवरी से फरवरी
— फाल्गुन — फरवरी से मार्च


यानि भारत के अधिकारिक कैलेंडर के अनुसार हमारे देश के लिए नया साल मार्च महीने के तीसरे हफ्ते में शुरू होता है। शैल्वाहन शक् कैलेंडर की बात करें तो जब लीप ईयर होता है तो चैत्र का महीना 31 दिनों का होता है। यह कैलेंडर सूर्य पर अधारित है तो इसी कारण इसके आधे महीने 31 दिनों के और आधे महीने 30 दिनों के होते हैं। सीनियर इंडियन एस्ट्रोफिजिस्ट मेघानद साहा काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रीयर रिसर्च के कलैडर रिफॉर्म कमेटी के हेड थे, जिसे इस कैलेंडर को तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इस कमेटी के पास साइंटीफिक स्टडी के हिसाब से एक ऐसे कैलेंडर को तैयार करने की जिम्मेदारी थी। जिसे पूरे देश में यूज किया जा सके। इसके लिए कमेटी ने देशभर के 31 कैलेंडरों को जांचा और तब यह कैलेंडर तैयार किया। यह सोलर कैलेंडर है लेकिन इसमें महीनों के नाम भारत के ही लूनर कैलेंडरों से लिए गए हैं। इसका इस्तेमाल चैत्र 1, 1879 यानि की 22 मार्च 1957 से शुरू हुआ। भारत के अलावा शक् ऐरा का कैलेंडर जावा, बाली, इंडोनेशिया के हिन्दुओं के बीच यूज होता आ रहा है। वहीं नेपाली संवत् भी इसी से इंस्पायर है।  

अन्य भारतीय कैलेंडर और उनके हिसाब से नया साल

भारत में लयूनीसोलर कैलेंडर पाये जाते हैं। यानी ये चांद और सूरज दोनों की गती पर अधारित हैं। भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय कैलेंडर विक्रम संवत पर अधारित कैलेंडर है। इसी से हिन्दू नववर्ष मार्च में 21/या 22 तारीख को मनाया जाता है। लेकिन इसके अलावा तमिल कैलेंडर, शक् संवत अधारित कैलेंडर, शैलवाहन शक् कैलेंडर, बंगाली कैलेंडर…. ये सभी लूनर कैलेंडर हैं। ऐसे में इसमें नया साल स्प्रिंग सीजन यानी मार्च से जून के बीच प्रमुख त्योंहारों के अधार पर मनाया जाता है। वहीं केरल की तरफ जाएं तो उधर सोलर कैलेंडर होते हैं। जिन्हें मलयालम कैलेंडर कहते हैं… इसके हिसाब से नया साल ऑटोमन सीजन में मनाया जाता है यानि सितंबर से दिसंबर महीनों के बीच पड़ने वाले त्योंहारों पर।

हमारे देश के कैलेंडरों के हिसाब से होली, सरस्वती पूजा, महाशिव रात्री, वैशाखी, रथ यात्रा, नवरात्री, रक्षा बंधन, गणेश पूजा, पोंगल, ओनम, कृष्ण जन्माष्टमी, लक्ष्मी पूजा, रामनवमी, पना संक्राती, विशु और दिवाली पर क्षेत्रिय कैलेंडरों में नए साल मनाए जाते हैं।

एक ओर जहां आज के ग्रोगेरियन कैलेंडर एक दिन को अपने एक महीने में जोड़ता है ताकि 12 लूनर साइकिल में मिसमैच नहीं हो वहीं प्राचीन भारतीय कैलेंडर कुछ सालों पर कुछ कम्पलेक्स रूल्स के साथ अपने में एक पूरा महीना जोड़ता है। ताकि त्योंहार और फसल अधारित पर्व अपने निर्धारित समय और महीने में मनाए जा सकें। एक ओर जहां नए अंग्रेजी कैलेंण्डरों में साल के 365 दिन पूरे कराने में पसीने छूट जाते हैं तो वहीं हमारे प्राचीन कैलेंडरों फिर चाहें वे चांद पर अधारित हों या सूरज पर वे सारे 365 दिनों के होते थे। ये कैलेंडर कुछ काव्यों के सिद्धांतों पर अधारित थे। जिनमें इसके बारे में पूरी जानकारी थी।
 
भारतीय ग्रंथ        दिन
सूर्य सिद्धांत – 365 दिन,6 घंटे, 12 मिनट, 36.56 सेकेंड
प्यूलिका सिद्धांत  –   365 दिन, 6 घंटे,12 मिनट 36 सेकेंड  
आर्या सिद्धांत –      365 दिन, 6 घंटे ,12 मिनट, 31.50 सेकेंड
पाराकारा    –      365 दिन, 6 घंटे ,12 मिनट, 31.50 सेकेंड
लघु आर्या सिद्धांत  –  365 दिन, 6 घंटे ,12 मिनट, 30 सेकेंड
सिद्धांत शिरोमणि    – 365 दिन, 6 घंटे ,12 मिनट, 9 सेकेंड


दिनों के अलावा भी इन किताबों में विज्ञान से जुड़ी कई ज्ञानों का भंडार है। जैसे सूर्य सिद्धांत में सूर्य की दूरी तक की जानकारी दी गई है। खैर हम बात कैलेंडर की कर रहे हैं… इतना कुछ जानने के बाद आप कहेंगे कौन सा कैलेंडर मानों इससे अच्छा तो अंग्रजी ही है! तो हम यहीं कहेंगे कि भारतीय प्राचीन कैलेंडर्स हमें बताते हैं कि पूरे साल में कई नए साल हो सकते हैं…. लेकिन अगर आप और हम अगर कोई स्पेसिफिक आइडेंटीटी वाला न्यू ईयर मनाना चाहते हैं तो भारत सरकार के अधिकारिक कैलेंडर को हमें अपनाना चाहिए जो हमारी अपनी पहचान है। उदहारण के लिए आप और हम अपने पड़ोसी चीन से सीख सकते हैं। जिन्होंने ने अपने विकास का रास्ता अपने स्वदेशी चीजों में खोजा। हम यह नहीं कह रहे ग्रोगेरियन को न अपनाएं… हम बस इतना कह रहे हैं कि अपने इतिहास को न भूलें। 

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