दिव्यांगों के लिए मंच पर कल्पना का सार रचते, भारत रत्न भार्गव

एक शख्स जिसने अपनी मेहनत से गाढी कमाई कि, घर बनाया पैसे इकट्ठा किया. राजधानी दिल्ली में अपनी मेहनत से अपना नाम बनाया और फिर एक दिन सबकुछ यहीं छोड़कर गुलाबी नगरी जयपुर चला गया और एक शांत माहौल देखकर गुलाबी नगरी के कोठारीगढ़ में ही हमेशा हमेशा के लिए बस गया.

वो शख्स है भारत रत्न भार्गव, जिनकी उम्र इस समय 80 साल है, भारत रत्न भार्गव ने गुलाबी नगरी जाकर नेत्रहीन बच्चों के लिए दिव्यांग कलाश्रम खोला. यही नहीं इस दिव्यांग कलाश्रम में उन्होंने उन बच्चों को वो भाव दिया की जो बच्चे अपनी आंखों से दुनिया नहीं देख पाते वो इस समय रंगमंच का ककहरा सीख रहे हैं साथ ही ये बच्चे ब्रेल लिपि में पढ़ाई कर रहे हैं. इसके साथ भारत रत्न भार्गव इन बच्चों की आंखों की इलाज के लिए भी पैसों का बंदोबस्त भी कर रहे हैं.

दिव्यांग कलाश्रम में रंगमंच की तालीम देते, भारत रत्न

80 साल के भारत रत्न भार्गव आज के समय में उन बच्चों को नाटक की वो तालीम दे रहे हैं, जो शायद बिना आंखों के कल्पना करना भी मुमकिन नहीं है. इसके लिए भार्गव खुद कहते हैं कि, इन्हें अभिनय सिखाना आसान नहीं था, जो खुद अपनी आंखों से देख नहीं सकते, उन्हें पहाड़ों, नदियों, तितलियों, आसमान, प्रकृति जैसी आकृतियों से परिचित कराना काफी मुश्किल था. हालांकि हमने तय किया है कि, हम इस तरह का नाटक इन बच्चों को सिखाएंगे, जिसमें मूल मानवीय संबंधो के मार्मिक प्रसंग सभी से जुड़े हों. कुछ ऐसा जिससे जुड़ा हुआ हर बच्चा खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर सके. यही वजह है कि, हमें इसके लिए ड्रैमेटिक रिलीफ का सहारा लेना पड़ा.       

जाहिर है संगीत, सुर-लय और अभिनय से सभी चीजें एक इंसान के लिए काफी परेशानी भरी होती हैं, क्योंकि इन्हें सीखने में बहुत से लोगों को उमर निकल जाती है, यही वजह है कि, इन नेत्रहीन बच्चों को भी अभिनय सिखाना और मुश्किल भरा काम था. लेकिन मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी, हालांकि इस दौरान मेरे सामने एक ही चुनौती थी. ये की सभी बच्चे मंच पर अभिनय कैसे करेंगे?

हालांकि वो कहते हैं न अगर इरादे बुलंद हो तो, रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाता है. आज भार्गव जी कहते हैं कि, उनके कलाश्रम में इनोवेटिव तरीके से बच्चों को अभिनय के गुण सिखाए जाते हैं. जो बच्चे अपनी आंखों से दुनिया को देख नहीं सकते. उन्हें मंच पर किस तरह आगे बढ़ना है, कहां से मंच से निकलकर बाहर आना है या फिर कब-किस दिशा में मुड़ना है, सब कुछ हम सिखाते हैं, उन्हें सिखाने के लिए वॉयस प्रॉम्पटिंग का सहारा लिया जाता है.

बच्चों को ट्रेंड करने के लिए अनोखा तरीका अपनाते हैं-भार्गव

जब भी कोई प्रोग्राम होता है, या फिर उसकी तैयारी होती है तो उन्हें तैयारी के दौरान थाप दी जाती है, जो उनके लिए रुकने का एक इशारा होता है…यहीं नहीं उन्हें आगे कैसे बढ़ना है, पीछे कैसे आना है इसके लिए संकेत दिया जाता है. इसके लिए हम अलग-अलग तरह के संगीत का सहारा लेते हैं, जिसमें खंजरी, मंजरी, खड़ताल का इस्तेमाल किया जाता है. ताकि उन्हें निर्देशित किया जा सके.

भार्गव जी कहते हैं कि, मैंने महसूस किया है..दिव्यागं बच्चों में गंध को लेकर भी काफी संवेदनशीलता होती है. यही वजह है कि ये बच्चे उसी गंधी के सहारे अपनी वेशभूषा से लेकर अपने अपने वाद्यों और प्रॉप्‍स को पहचानते हैं. इसके अलावा उनका स्पर्श बेहद अलग होता है, इसी स्पर्श के सहारे ये बच्चे एक दूसरे को समझते हैं. स्पर्श ही हर दिव्यांग बच्चे को भाव को समझने का जरिया होता है. इसलिए इन बच्चों को सीखाने से पहले इनका मनोविज्ञान समझना हर इंसान के लिए जरूरी होता है. क्योंकि बिना इनको जाने हम इन्हें कुछ सिखा नहीं सकते.

यही नहीं भार्गव कहते हैं कि, आज के समय में दिव्यांग बच्चों को कलाश्रम में लाने को लेकर उनके घरवाले भी आना-कानी नहीं करते, क्योंकि यहां उनके बच्चे को महीने भर तक मुफ्त रहने-खाने और प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है. इसके अलावा उन्हें 500 रुपये नकद देने की व्यवस्था की जाती है. यही वजह है कि, कलाश्रम के चलते इस समय इन बच्चों का हुनर भी लोगों को दिखाई दे रहा है.

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