दरगाह जहां कृष्ण जन्माष्टमी पर लगता है मेला, एक साथ गूंजती है अजान और आरती

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हर साल पूरे देश में धूमधाम से मनाई जाती है। इस बार कृष्ण जन्माष्टमी दो दिन मनाई जा रही हैं। इस दिन मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ी रहती है। वैसे तो विशेष दिनों पर मंदिरों की सजावट और रौनक देखते ही बनती है। मगर जन्माष्टमी की छटा सबसे अलग होती है। इस दिन मंदिरों को सुन्दर झांकियों से सजाया जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, मंदिरों और घरों में भजन कीर्तन किया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी मनाने के पीछे एक बेहद ख़ास वजह है दरअसल अपने मामा कंस के अत्याचारों से परेशान होकर, उनके विनाश के लिए, भगवान कृष्ण ने भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जन्म लिया था। कृष्ण भगवान का जन्म मथुरा में आधी रात को हुआ था। शास्त्रों के मुताबिक 5 हज़ार 243 साल पहले भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा की भूमि पर हुआ था। इसलिए ही मथुरा और वृन्दावनवासियों के लिए ये त्यौहार और भी ज़्यादा ख़ास होता होता है। मगर एक और जगह है जहां कृष्ण जन्माष्टमी बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है।

Krishna Janmashtami : राजस्थान में नरहड़ की दरगाह में जन्माष्टमी पर लगता है मेला

आज के समय में जहां धर्म को लेकर लोग आपस में नफरत फैला रहे हैं वहीं एक जगह ऐसी भी जो दो कृष्ण जन्माष्टमी पर दो मज़हबों को जोड़ती है। जी हाँ एक दरगाह ऐसी भी है जहां पर जन्माष्टमी का मेला पिछले सात सौ सालों से लगाया जा रहा है। ये दरगाह राजस्थान के झूंझनू जिले के नरहड़ कस्बें में है। ये दरगाह हाजीब शकरबार शाह की दरगाह है। सबसे ख़ास बात तो ये है कि इसके अलावा यहां सभी धर्मों के अपने अपने अनुसार पूजा कर सकते हैं। यहां धर्म या मज़हब कभी आड़े नहीं आता बल्कि हर धर्म के लोग यहां साथ मिलकर पूजा करते हैं। यही नहीं इस मेले में हिंदूओं के साथ देशभर के मुसलमान भी शामिल होते हैं। इस मेले में राजस्थान, पंजाब, गुजरात, हरियाणा,उत्तर प्रदेश दिल्ली,आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र से लोग आते हैं। इस मेले में अष्टमी की सारी रात सूफी संत सूफी गीत गाते हैं। दरगाह में भगवान कृष्ण के जन्म पर आयोजित होने वाला जन्माष्टमी उत्सव सांस्कृतिक और धार्मिक समागम की अनोखी मिसाल है।

Krishna Janmashtami

Krishna Janmashtami : दरगाह में एक साथ अजान और आरती गूंजती है

दरगाह में एक ही समय मौलवी अजान लगाता है तो पंडित घंटियाल नगाड़ों के साथ आरती करते हैं। जिससे यहां का माहौल ही अलग हो जाता है। जहां मेले पर विशेष तौर पर दरगाह की सजावट होती है तो वहीं दूसरी तरफ छप्पन भोग की झांकी सजाई जाती है। जन्माष्टमी की रात यहां रतजगा होता है। जिसमें एक तरफ भजन तो साथ में ही कव्वालियां पेश की जाती हैं। इस रात मुस्लिम और हिन्दू दोनों ही जगह जगह भंडारे लगाते हैं। भंडारा खाने वाले भी हिन्दू मुस्लिम दोनों ही होते हैं। शायद ही देश में इससे खूबसूरत नज़ारा कहीं और देखने को मिलता हो। नरहड़ में जन्माष्टमी मेले की परम्परा कब और कैसे शुरू हुई इस बारे में कोई ख़ास जानकारी तो नहीं है लेकिन इतना जरूर है कि कहीं भी संप्रदाय, धर्म-मजहब के नाम पर भले ही हालात बनते बिगड़ते हों मगर नरहड़ में हमेशा हिन्दू मुस्लिम एक साथ नज़र आते हैं।

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