दम भर लो, घुटने के दिन आ गए

महज कुछ दिन ही बचे हैं, दीपावली आने के..  वो दीपावली जिस समय पुरुषोत्तम राम अपनी अयोध्या नगरी में 14 साल का वनवास काट कर अपनी पत्नी सीता और लक्ष्मण के साथ वापस आए थे।  ये वो दौर था, जिस समय लोगों ने राम के आने की खुशी में अपने घरों से लेकर हर जगह दीप जलाकर राम का स्वागत अभिनंदन किया था. कुछ यही वजह है कि, हमने भी दिपावली यानि की दीपों का पर्व मनाना शुरू कर दिया. क्योंकि जहां एक तरफ राम वनवास काट कर वापस आए, वहीं दूसरी तरफ किसानों की खेतों में पकी फसल भी कटकर उनके घर को आती है. खैर कुछ भी हो, त्यौहार एक है, त्यौहार हर्षों उल्लास का, त्यौहार दुनिया को संदेश देने का कि हमारा देश एकता में विविधता का देश है।

वहीं अगर दूसरी तरफ की बात करें तो, राम का दौर खत्म हुआ, चीजें बदल गई, या यूं कहें कि, दुनिया ही बदल गई है, हमने त्यौहारों को मनाने का पूरा रूप ही बदल लिया है। जहां पहले हम अपने घर की मुंडेरों पर, घरों की चौखटों पर दीये रखते थे आज वहीं पर मोमबत्ती रखते हैं आज हम अपने घरों को सजाने के लिए झालरें लगाते हैं और शायद खुशी जाहिर करने के लिए पटाखे जलाते हैं।

वहीं किसान अपने फसलों को काटकर घरों में लाने के बाद उसकी बची पराली खुशी-खुशी खेतों में जला देता है। क्योंकि जहां एक तरफ हम पटाखे जलाते वक्त ये भूल जाते हैं कि, इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है, वहीं दूसरी तरफ किसान भी शायद ये भूल जाते हैं कि पराली जलाने की वजह से लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

Air Pollution- धुएं में जीता दिल्ली शहर

पहले के सालों की बातें अगर छोड़ दें तो, पिछले 4-5 सालों से हर साल यही होता है। जब भी दीपावली आने को होती है. वैसे-वैसे सरकारें अपनी मुस्तैदी का सबूत देती है कि, इस बार दिल्ली घुटेगी नहीं और दूसरी तरफ जैसे-जैसे सर्दियों के दिन आते हैं वैसे-वैसे हल्की ठंड और शीत के साथ फॉग की तो नहीं लेकिन स्मॉग की एंट्री हो जाती है.

पर्यावरण इतना बदल जाता है कि, खुली हवा में सांस लेना भी जानलेवा हो जाता है। लोगों को घरों से निकलने के लिए मास्क का इस्तेमाल करना पड़ता है। सरकारों को स्कूल बंद करने पड़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट को दीपावली पर पटाखे जलाए या नहीं इस पर बहस करनी पड़ती है और न जानें कितना कुछ…

Air Pollution- सांस लेना भी होता है खतरे भरा सौदा

लेकिन उसके बाद भी दिल्ली में प्रदूषण के स्तर में कोई बदलाव देखने को नहीं मिलता या यूं कहें कि, हमारे पूरे देश का हाल जस का तस ही बना रहता है. क्योंकि हमारे देश में किस्सा ही कुछ ऐसा है। जहां एक तरफ हमारे देश के 10 शहर हमेशा कुछ इस तरह घुटते रहते हैं कि, जहां सांस लेना भी खतरे भरा सौदा होता है। वहां इस तरह के सरकारी उपाय भी महज चंद रोज के लिए करती है।

क्योंकि बाकि दिनों की तो लोगों को आदत सी पड़ गई है या यूं कहें कि, रोग तो हम सबको हो गया है, बस वो जानलेवा न हो जाए, इसके लिए महज चंद दिनों की तैयारियां हम और हमारी सरकार करती है। उसके बाद फिर साल भर की मोहलत मिल जाती है.

खैर इसे देखकर और इसके बारे में सोचकर ऐसा लगता है कि, इन सभी चीजों के हम आदि हो चुके हैं, क्योंकि न तो हम समझदार हैं और न ही होना चाहते हैं। हालांकि बकैतियां जरूरी बनाना चाहते हैं. जिससे हमारा परिवेश तो बेहतर नहीं हो सकता, हां लेकिन उससे हमको संतुष्ठि जरूर मिल जाएगी.

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