डोम : हिन्दू समाज की वो जाति जिसे मुर्दो के कारण मिलती है इज्जत

भारत को लेकर अगर किसी से एक निगेटिव बात पूछी जाए तो जो सबसे पहला जवाब आता है वो है जातिवाद.. जातियों में बटां यहां का समाज और इस आधार पर इन समाजों में होने वाले मतभेद। वैसे अगर धर्मग्रंथों को पढ़ें तो हमे पता चलता है कि, भारत का समाज चार स्तर पर है, जिसमें  ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र आते हैं। यह डिवीजन कभी कर्म यानि कि, इंसान के काम के आधार पर हुए थे। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बदला यह जातियों का भेद रूढ हो गया और जातियां जन्म के आधार पर डिसाइड होने लगीं। मतलब आप ब्राह्मण के घर जन्में तो आप जन्म से ब्राह्मण और डोम के घर जन्में तो आप डोम। ऊपर का वर्ग अपने से नीचे वाले को खुद से छोटा समझने लगा और छोटे वाले का जीना और मरना बराबर है। मगर इस समाज में सब कुछ नहीं बदला, बस वक्त-वक्त की बात होती हैं। जहां कई बार बड़ों को भी छोटो के आगे झुकना पड़ता है। तो वहीं ऐसी ही एक घड़ी होती है मौत की घड़ी.. जब बड़ी जाति के प्रकांड आदमी को भी एक छोटी जाति के व्यक्ति के सहारे ही मुक्ति मिलना संभव होता है।

डोम

डोम को लेकर है कई पौराणिक गाथाएं

आप अगर बनारस गए होंगे या बनारस के ही साइड के होंगे तो आपको यह बात तो पता होगी कि, बनारस के घाट पर चिताएं डोम जलाते हैं। वैसे तो ये समाज के सबसे छोटे वर्ग के लोग हैं। लेकिन बनारस में डोम ही राजा है। बिना उसके आपके लिए मुक्ति का मार्ग नहीं खुलेगा। ऐसी बातें परंपराओं से बनारस में सुनने को मिलती रही हैं। डोम को लेकर बनारस में कई कहानियां हैं जिनमे एक कहानी है कि, एक बार भगवान शिव और पार्वती मणिकर्णिका घाट के पास नहाने पहुंचे, इसी दौरान उनका एक कुंडल गिर गया जिसे कालू नाम के एक राजा ने अपने पास छिपा लिया। कई लोग कालू को ब्राह्मण बताते हैं। खैर कहानी पर आते हैं। जब बहुत तलाश के बाद भी कुंडल नहीं मिला तो शिवजी क्रोध में आ गए और श्राप दे दिया कि, जिसके पास भी कुंडल होगा वह नष्ट हो जाएगा। यह बात जानकर कालू कांप उठा और दौड़कर शंकर जी के पास गया और माफी मांगी। अब भोले तो भोले हैं। तो उन्होंने भी अपना श्राप वापस ले लिया और उसको बदले में श्मशान पर काम करने और इसके लिए पैसे लेने का काम दे दिया। मतलब उसे एक रोजगार दे दिया। उसी कालू के वंश का नाम डोम पड़ गया।

मगर ये कोई अकेली कहानी नहीं है, इसी तरह की एक और कहानी है जो राजा हरिशचंद्र से जुड़ी हुई है। जिसमें उन्हें एक डोम के यहां नौकरी करनी पड़ी थी और अपने ही बेटे के कफन के लिए अपनी पत्नी से पैसे मांगने पड़े थे। ऐसी कई और कथाएं डोम को लेकर कही सुनी जाती हैं। वैसे एक बात आपको बता दें कि, डोम शब्द में हिन्दू मान्यता के पवित्र शब्द ओम का साउंड भी आता है। आधुनिक इतिहास की मानें तो, डोम सबसे छोटी जातियों में आते हैं। इनका काम अंतिम संस्कार करना होता है। वाराणसी में डोम ही चिता जलाने के लिए संतान के हाथ में आग देते हैं, साथ ही अंतिम क्रियाकर्म के लिए होने वाला सारा काम डोम ही करते हैं।

डोम

डोम जिन्दा लोगों के बीच नहीं मौत के बीच का राजा है!

बनारस में अंतिम संस्कार करने वाले डोम राजा कहे जाते हैं। लेकिन क्या इन राजाओं की जिंदगी सच में राजाओं की तरह होती है? यह सवाल आते ही मुंह से निकल जाता है नहीं। हाल ही में एक मूवी ‘मसान’ जिसमें एक्टर विक्की कौशल ने डोम जाति के एक युवा का किरदार निभाया है। इन लोगों का समय सिर्फ लाशों के साथ बीतता है। लाश अपने आप में ही एक निगेटिव चीज है। ऐसे में इसके साथ दिनभर इसके बीच रहना कैसा होता है इसका अहसास आप कर सकते हैं। भले ही डोम को राजा कहा जाता हो। लेकिन यह समुदाय सामाजिक रूप से बेहद पिछड़ा हुआ है। अनुसूचित जाति में आने के बावजूद ये आरक्षण का कोई लाभ नहीं उठा पाते और समाज में आज भी छूआछूत का ये शिकार होते हैं।

सिर्फ मौत के समय ही डोम की जरूरत ऊंची जातियों को नहीं होती। बल्कि इसके अलावा विवाह के समय इनके हाथ के बने मऊर या कई चीजें बारात में ले जाना जरूरी माना जाता है। वहीं जनेऊ के समय इनके हाथों से बांस के बने सामान बहुत जरूरी चीज मानें जाते हैं और इन दिनों पर इन्हें मुंह मांगी चीज देने का भी रिवाज है। लेकिन यह सब होने के बाद भी समाज में इस समुदाय के संग छूआछूत आम है।

ये समुदाय जो गंदगी का काम करते हैं, जैसे नाली साफ करना, मैला साफ करना जैसे काम या लाश जलाने का। यह ऐसा काम है जिसे करना और इसके बीच बिना किसी सेफ्टी मेजर के टिका रहना पॉसिबल नहीं हैं। ऐसे में ये लोग ज्यादातर नशे में रहते हैं इसके आदी भी हो जाते हैं। इस वजह से भी समाज इन्हें दुत्तकार देता है। लेकिन यह बात आज हमारे भारतीयता के लिए सही नहीं हैं, जहां सभी लोग एक समान माने जाते हैं। ऐसे में अगर डोम को राजा माना जाता है तो यह बात व्यवहार मे भी दिखनी चाहिए।

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