जासूसों की जासूस, रजनी पंडित

किसी भी इंसान के अंदर जब भी कोई शंका पनपने की शुरुवात करती है, वैसे-वैसे वो इंसान जासूस की बनने की राह में एक कदम आगे निकल आता है. क्योंकि वो जासूस ही होता है, जो किसी भी इंसान के अंतरव्दन्द को पहचान पाता है. क्योंकि एक जासूस अपने हुनर और अपनी काबिलियत से सही और गलत की पहचान कर पाता है.

यही वजह है कि, एक लाईन इन सबमें सबसे ऊपर मानी जाती है की, जासूस जन्म से होता है, उसे कभी बनाया नहीं जाता है और हकीकत भी बस इतनी सी है. क्योंकि किसी भी इंसान में जो हुनर पैदा होने के साथ होता है. उसे फिर बनाने में सालों साल गुजार देने होते हैं और ऐसा कहना है, जासूसों की जासूस रजनी पंडित का…

रजनी पंडित आज एक ऐसा नाम है, जोकि भारत की सबसे बड़ी जासूस होने के साथ-साथ भारत की पहली महिला जासूस भी हैं. लगभग 60 साल की हो चुकी रजनी पंडित अब तक लगभग 80 हजार से ज्यादा केस सुलझा चुकी हैं.

अपने प्रोफेशन को लेकर रजनी पंडित का खुद कहती है कि, “हाँ मुझको मालूम है कि मैं कोई एक्टर या एक्ट्रैस नहीं हूं. हां, लेकिन अगर आपको जासूसों की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनानी है तो, आपको वो सबकुछ आना चाहिए. ताकि आपके आस-पास हालात कैसे भी क्यों न हो. आप उनसे निकल सकें और मामले का खुलासा कर सकें.”

महज 22 साल की उम्र से ही जासूस की दुनिया में कदम रखने वाली रजनी पंडित ने जिस समय अपना पहला केस सुलझाया था. उस समय वो एक कॉलेज की छात्र थी. रजनी पंडति के पिता सीआईडी में थे. यही वजह थी कि, बचपन से ही रजनी ने जासूसी के सारे गुण सीख लिए थे.

रजनी पंडित

कॉलेज में ही सुलझाया अपना पहला केस, रजनी

रजनी कहती है कि, मैंने अपना पहला केस अपने कॉलेज के फर्स्ट इयर में ही साल्व किया था. उस दौरान मैंने मेरे साथ पढ़ने वाली लकड़ी को जब देखा तो, वो थोड़ी असहज रहा करती थी. जोकि मुझको खटक गई और मैंने उसे फॉलो करना शुरू किया और आखिर में मैंने उसको देखा की वो हमारे सीनियर्स के चंगुल में फंस गई है. जिसके बाद मैंने ये बात उसके घर का पता लगा, उसके माता पिता को बताई. उस दौरान मैंने पहली बार उस लकड़ी के पिता से जासूस जैसा शब्द सुना था, क्योंकि उन्होंने मुझको जासूस कहा था.

उसके बाद मैंने जासूस बनने का ख्याल इस तरह सजाया कि, वो मेरा प्रोफेशन बन गया. उसके बाद मैंने ऐसे न जानें कितने ही केस साल्व कर डाले. इन केस को साल्व करने के लिए मुझको हर तरह का किरदार भी निभाना पड़ा.

अलग अलग किरदार निभाता है, जासूस

रजनी पंडित

जब भी हम कोई किरदार निभाते हैं तो ठीक हमको उसकी बारीकियां पकड़नी होती हैं, ताकि उसकी छाप सामने वाले पर पड़ सके. ठीक जासूस बनने के समय में भी इंसान यही करता है. क्योंकि एक इंसान, एक आम इंसान होने के साथ-साथ उस केस को साल्व करने के लिए हर तरह के मामले और हथकंड़े अपनाता है. जिस दौर में हमारे पास न तो इंटरनेट मौजूद था और न ही सोशल मीडिया, उस समय रजनी पंडति जासूस बन लोगों की समस्याऐं सुलझा रही थी.

हर कोई जानता है कि, एक जासूस की निजी जिंदगी हमेशा खतरों से भरी होती है, इसलिए शायद बहुत कम लोग ही होते हैं. जो जासूस बनने की सोचते हैं. यही वजह रही कि, शायद रजनी पंडति ने शादी नहीं की.

यहां तक की शुरुवाती समय में रजनी ने अपने काम के बारे में न तो अपने माँ को बताया और न ही अपने पिता को, क्योंकि उन्हें मालूम था कि, इस काम के लिए उनके घर का कोई भी सदस्या उन्हें इज़ाजत नहीं देगा. साथ ही रजनी कहती हैं कि, मुझको शुरुवात के समय में ही अपने काम से प्यार हो गया और यही वजह रही कि, मैंने इस काम को अपना करियर बना लिया.

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