जानिए क्या है कलरीपायट्टु : मदर ऑफ ऑल मार्शल आर्ट की कहानी

प्राचीन भारतीय स्कूलों के बारे में बात करें तो इसमें टीचरों की ओर से बच्चों को दो तरह की टीचिंग मिलती है। पहला शास्त्र और दूसरा शस्त्र। माना जाता है कि, एक विद्यार्थी के लिए इन दोनों ही चीजों की नॉलेज होनी चाहिए। तभी वो अपनी जिंदगी में हर तरह के हालातों से निपट सकता है। लेकिन वो परंपरा गुरूकुल की थी जो आज देखने को नहीं मिलती है। शास्त्र का ज्ञान तो आज भी पुराने तरीकों से आपको देश के कई हिस्सों में मिल जाएगा लेकिन प्राचीन शस्त्र और सेल्फ डिफेंस की विद्या सीखनी हो तो शायद ही कोई ऐसी जगह आपको आज भारत में देखने को मिले और शायद ही हमें उनमें से किसी एक का नाम याद हो। इन्हीं प्राचीन शस्त्र विद्याओं में से एक है कलरीपायट्टु।

मार्शल आर्ट का जिक्र आते ही हम लोग सोचते हैं कि, यह कोई बाहरी ईजाद है। हममें से ज्यादात्तर लोग चाइनीज मार्शल आर्ट (जिसे हम कूंग—फू के नाम से जानते हैं) की ओर अट्रैक्ट होते हैं। लेकिन हमने अपने एक आर्टिकल में आपको यह बात बताई थी कि, कैसे कूंग—फू की विद्या भारत से चीन पहुंची थी। यानि की कूंग—फू से पहले भी इंडिया में कोई मार्शल आर्ट प्रैक्टिस में हुआ करता था। मार्शल आर्ट की इस विद्या का नाम ही कलरीपायट्टु है। कलरीपायट्टु को ‘मदर ऑफ ऑल मार्शल आर्ट’ भी कहा जाता है। यानि यही वो मार्शल आर्ट की तकनीक है जिससे बाकी सारी मार्शल आर्ट्स का जन्म हुआ। आज कलरीपायट्टु को दुनिया की सबसे पुरानी मार्शल आर्ट तकनीक माना जाता है और आज भी यह कला दक्षिण भारत के केरल में जिंदा है, जिसे सीखने और सिखाने वालों की कमी नहीं है।

कलरीपायट्टु,Martial Arts

कलरीपायट्टु- वो कला जिसे जानने वाले होते हैं कुशल योद्धा

कलरीपायट्टु मार्शल आर्ट के कुशल लड़ाकों को तैयार करने की दुनिया की सबसे बेमिसाल तकनीक है। कलरीपायट्टु के नाम से ही इस विद्या का अर्थ पता चलता है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है, पहला कलरी जिसका मतलब ‘स्कूल’ या ‘व्यायामशाला’ होता है और दूसरा शब्द है पायट्टु जिसका अर्थ होता है ‘युद्ध या व्यायाम करना’। इस कला के बारे में कहा जाता है कि, कलरीपायट्टु एक ऐसी विद्या है जिसे सीखने में कई साल लग जाते हैं। यह न सिर्फ आपको युद्ध की कला में परांगत करता है बल्कि, यह अपने आप में एक जीवनशैली की तरह है जो आपके स्वभाव में डिसीप्लिन लाता है। वहीं यह चिकित्सा की कला सीखने का भी एक जरिया है।

कलरीपायट्टु की प्रैक्टिस ‘कलरी’ (जिसे इसका अखाड़ा कहते हैं) में की जाती है। वहीं इसमें एक ओर पुत्तरा बना होता है जो ईश्वर का स्थान होता है। बताया जाता है कि, इसे सीखने वालों की ट्रेनिंग सात साल की उम्र में ही शुरू हो जाती है। यानी उस उम्र में जब इंसान के अंदर सीखने और अपने आप का एक व्यक्तित्व तैयार करने की सबसे ज्यादा संभावना होती है। यह उम्र कच्ची मिट्टी की तरह होती है जिसे किसी भी रूप में ढ़ाला जा सकता है।

कलरीपायट्टु- कैसे होती है कलरी की ट्रेनिंग?

कलरीपायट्टु के प्रशिक्षण यानि की ट्रेनिंग की बात करें तो जैसा कि, हमने आपको बताया कि, यह एक रेगुलर प्रोसेस है जो 7 साल की उम्र से शुरू हो जाता है और काफी सालों तक जारी रहता है। इसके अलावा कलरी की ट्रेनिंग मुख्य रूप से तीन पार्ट में होती है। मिथारी, कोल्थारी और अंक्थरी। सबसे पहले बात हम मिथारी की करते हैं।

एक अच्छा लड़ाका बनने के लिए सबसे जरूरी होता है कि, शरीर सबसे ज्यादा मजबूत हो, ताकि हर वार को झेल सके। ऐसे में सबसे पहले शरीर की मजबूती और ताकत को बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। इसके लिए कई तरह की एक्सरसाइज कराई जाती है।

इसके बाद का पार्ट है कोल्थरी का। इस समय हथियारों के यूज करने की विद्या सिखाई जाती है। हालांकि यहां असली हथियार नहीं दिए जाते। यहां लकड़ी के हथियार इस लिए दिए जाते हैं क्योंकि पहली बार में ही अगर असली हथियार दिए जाएंगे तो सीखने वाले बच्चे जो इनसे अंजान होते हैं वो इससे खुद को ही नुकसान पहुंचा सकते है। ऐसे में पहले ट्रेनिंग के जरिए लकड़ी के हथियारों को चलाना सिखाया जाता है। इसके बाद बारी आती है तीसरे पार्ट की जिसे हम अंक्थरी के नाम से जानते हैं।

अंक्थरी में कलरीपायट्टु सीखने वालों को लकड़ी की जगह असली हथियारों को चलाने की ट्रेंनिंग दी जाती है। यहां छात्र को उसकी जिम्मेदारी का भी एहसास कराया जाता है ओर साथ ही उसके बौद्धिक विकास के लिए भी उसे कई गुर सिखाए जाते हैं। इस पड़ाव में उसे भाले, ढाल, तलवार आदि जैसे खतरनाक हथियार से ट्रेनिंग दी जाती है। वहीं इस दौरान बिना हथियार के हथियार वाले दुश्मन से भिड़ने की भी ट्रेनिंग दी जाती है।

इन तीनों स्तर की ट्रेनिंग खत्म होने के बाद कलरी ‘मार्मा’ की एक स्पेशल ट्रेनिंग होती है। जिसका मकसद होता है इंसान के शरीर के सभी 107 ऊर्जा बिंदुओं के बारे में जानकारी और उसे सक्रिय कैसे करें इसे सीखना। इन महत्वपूर्ण बिंदुओं का उपयोग शरीर में ऊर्जा-प्रवाह को सुधारने के लिए किया जाता है। इतनी ट्रेनिंग के बाद यह सुनिश्चित हो जाता है कि, कलरीपायट्टु सीखने वाला इंसान किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं पड़ेगा।

कलरीपायट्टु,Martial Arts

क्या है इस प्राचीन ज्ञान का इतिहास, कब, कहां और कैसा आया

कलरीपायट्टु आज भी केरल में सिखाया जाता है। लेकिन केरल में यह शुरू कब हुआ क्या इसका कोई रिकॉर्ड है। असल में यह कोई नहीं जानता कि कलरीपायट्टु की शुरूआत कब हुई थी। लेकिन इसके बारे में कई सारी कहानियां हैं। कई तरह की पौराणिक कहानियों में कलरीपायट्टु की शुरूआत होने को लेकर जिक्र किया गया है। इनमें से एक कहानी है महर्षि अगस्त्य की। ऐसा कहा जाता है कि, अगस्त्य ऋषि ने इसकी शुरूआत जानवरों से इंसानों की रक्षा करने के लिए की थी। कहा जाता है कि, उस समय शेरों की संख्या ज्यादा थी और वे अक्सर इंसानों पर अटैक कर दिया करते थे। ऐसे में अगस्त्य ने एक लड़ाई की शैली तैयार की इसे ही कलरीपायट्टु कहा गया।

दूसरी पौराणिक कहानी के अनुसार, कलरीपायट्टु को सबसे पहले भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान पशुराम ने शुरू किया था। केरल को बसाने का भी श्रेय उन्हें ही जाता है। उन्होंने इस विद्या को आगे बढ़ाने के लिए 42 कलरी खोले और 21 लोगों को चुना, जिन्हें यह कला उन्होंने सिखाई। भगवान पशुराम के अलावा कई जगहों पर यह भी जिक्र मिलता है कि, कलरीपायट्टु की शुरूआत भगवान श्री कृष्ण ने की थी। कहा जाता है कि, इसी कला के दम पर उन्होंने चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों को मारा। कालिया नाग को मारने में भी वे कलरीपायट्टु के कारण ही सफल हुए थे।

खैर ये तो पौराणिक कहानियां हैं। लेकिन प्राप्त इतिहास साक्ष्यों की बात करें तो सबसे पहला इसका जिक्र ऋग्वेद में आता है। जहां जिक्र आता है कि, इंद्र ने अपने वज्र से वृत्रा को हराया। वहीं अथर्वबेद में भी इसका जिक्र मिलता है। इन बातों से यह तो साफ है कि, प्राचीन भारतीय मार्शल आर्ट की तकनीक से परिचित थे। वहीं शुश्रुत ने भी अपनी किताब में शरीर के 107 प्वाइंटस का जिक्र 6ठीं शताब्दी से पहले किया है। उन्होंने कई ऐसी आयुर्वेदिक बातों का जिक्र किया है जिसकी पढ़ाई मार्शल आर्ट के साथ ही की जाती है, जैसे कि वर्मा कालाई और मरमा आदि।

वहीं 9वीं शताब्दी में कलरीपायट्टु का असल विस्तार देखने को मिलता है। जब केरल के योद्धाओं ने इसे जंग के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया था। माना जाता है कि, 11वीं शताब्दी में चोल राजवंश, पाण्ड्य राजवंश और चेर साम्राज्य के बीच 100 साल तक चली लड़ाई में इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ। भारत के दूसरे हिस्सों की तरह ही केरल में भी वॉरियर हर कास्ट के लोग होते थे। वहीं यहां की सोसायटी में महिलाओं को भी इसमें बड़ा योगदान होता था। ऊनीयार्चा इन्हीं वीर महिलाओं में से एक थी जिनकी आज भी पूजा उनके मार्शल आर्ट में परांगत होने के लिए की जाती है। यह परंपरा आज भी जारी है। श्री मीनाक्षी अम्मा को आज कौन नहीं जानता है। वे 73 साल की है लेकिन कलरीपायट्टु में उनकी परांगता को देखकर ऐसा नहीं लगता। हाल ही में भारत सरकार की ओर से भी उन्हें सम्मानित किया गया था।

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