जनसंख्या पर लगाम – कई समस्याओं का एक हल!

साल था, 1975 जब भारतीय जनसंख्या इतनी अनियमित हो गई थी कि, देश में आपाताकाल लगने के बाद संजय गांधी के निर्देशों पर देश के लगभग 60 लाखों की जबरन नसबंदी कर दी गई और नतीजा ये रहा कि, कांग्रेस उसके बाद महज 154 सीटों पर ही सिमट कर रह गई। इसी दौर में एक नारा आया था कि, हम दो हमारे दो..

ये वो समय था, जब जबरन लोगों की नसबंदी तक करवाई जाने लगी थी। नेताओं ने स्टेज पर खड़े होकर, माइक पर चिल्लाने से लेकर पोस्टर-बैनकर तक हर जगह बताया कि बच्चे दो ही अच्छे। हालांकि इसके बावजूद भी हमारे देश में कोई खास असर नहीं पड़ा। क्योंकि आज जनसंख्या के मामले में हमारा देश सबसे आगे है।

एक वो दौर था, एक ये दौर है। अभी कुछ दिनों पहले ही आजादी के मौके पर जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से झंडा फहराया तो उन्होंने अपनी सरकार की खूबियों के साथ धारा 370, तीन तलाक और फिर अनेकों चीजों पर बात की. इसके साथ पहली बार प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर पर खड़े होकर कहा की परिवार नियोजन के लिए परिवार में दो बच्चे बहुत अच्छे होते हैं. वाकई ये बात हर तरह से जायज भी है.

जनसंख्या पर लगाम – भगवान की देन कहकर लग जाती हैं बच्चों की कतार

क्योंकि हर कोई जानता है कि परिवार में एक बच्चे का पालन-पोषण आसानी से किया जा सकता है। तो वहीं दो से ज्यादा बच्चों को पालना आज के महंगाई के दौर में बहुत मुश्किल हो चला है। आज भी हमारे समाज में ऐसे न जाने कितने परिवार हैं जो अपने मनोरंजन में बच्चे तो पैदा कर लेते हैं और बाद में कहते हैं कि ये तो भगवान की देन है,

हालांकि हम अभी भी ये मानने को तैयार नहीं हैं कि आज जनसंख्या हमारे देश में कितनी गंभीर समस्या बन गई है. आज हमारे देश में कोई भी समस्या क्यों ना हो उसकी शुरूवात और उसकी जड़ कहीं न कहीं जनसंख्या से ही जुड़ी है। क्योंकि हर कोई जानता है. कि, जहां एक तरफ अनाज से लेकर संसाधन और फिर नौकरियों की बात की जाए तो हर जगह जनसंख्या ही हमारे चारों ओर दानव की तरह मुंह खोलकर खड़ी हो जाती है

और इस जनसंख्या की बीमारी से हर कोई भलि भांति वाकिफ भी है. क्योंकि हर इंसान आज जानता है कि जब भी कभी सरकार की तरफ से एक चपरासी के लिए भी आवेदन निकलता है तो उसके लिए हमारे देश में पीएचडी से लेकर बड़ी-बड़ी डिग्रियां ले चुके लोग भी उसके लिए आवेदन करते हैं. लेकिन अभी भी हमको समझ नहीं आया है कि, हमारी इस गड़बड़ी की शुरूवात कहां से हुई है।

एक बात कहीं न कहीं ये भी है कि, उस दौर में जहां नसबंदी से लेकर प्रचार प्रसार लोगों को बताने का माध्यम बना था. वहीं आज के समय में जागरूकता लोगों के लिए माध्यम बन रही है.

क्योंकि स्कूलों से लेकर कॉलेजों में भी आज के समय में बच्चों को किताबी कीड़ा जरूर बना दिया जाता है. पढ़ाई के नाम पर बच्चों को रट्टू तोता बना दिया जाता है।

लेकिन उन्हें देश दुनिया से रूबरू नहीं कराया जाता. और यही वजह है कि जब हमारे देश का प्रधानमंत्री भी लाल किले के प्राचीर से जनसंख्या रोकथाम की बात करता है तो उसके विरोध में भी नेता कहते हैं कि ये तो बरगलाने की कोशिश है।

जनसंख्या पर लगाम – दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला दूसरा देश है भारत

अरे भईया रहते कहां हो, कब समझोगे. समझ नहीं आता ये कीड़ा किसी नेता या फिर इंसान के दिमाग में उछलता कहां से है। कुछ इसी तरह ही कहा ओवैसीद्दीन औवेसी ने.. दरअसल, उन्होंने प्रधानमंत्री की इस बात को गलत सोच का नतीजा कहा और कहा कि, ये दूसरों की जिंदगी में दखल देने जैसा है.

हालांकि आपको नहीं लगता कि अभी भी हमारे देश में जनसंख्या की बिमारी हमारे लिए सभी समस्याओं की आधार है. क्योंकि हमारे भारत में कोई भी समस्या क्यों न हो सभी चीजों की जड़े इसी से जुड़ी हुई हैं. लेकिन फिर भी हमारे देश में जनसंख्या विकास दर पर न तो कोई रोक लग रही है और न ही इस पर कोई ज्यादा ध्यान दे रहा है.

लेकिन वहीं अगर हम चीन की बात करें तो आज के समय में चीन की जनसंख्या का अनुपात हमारे जनसंख्या की विकास दर से काफी पीछे चला गया है. जबकि चीन एक समय में दुनिया की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश रह चुका है.

फैसला आपको करना है. समझना आपको है. क्या अभी भी हमें इस पर ध्यान देना चाहिए या नहीं. क्योंकि हम चीन की तरह जनसंख्या पर लगाम लगाने को तनाशाही का प्रयोग तो कर नहीं सकते. क्योंकि हमारे यहां लोकतंत्र है।

हालांकि कोई भी छोटी चीज हमारे देश में क्यों न हो जाए कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि ये तो लोकतंत्र की हत्या है. जिसका विरोध वो और उनके चमचे करना शुरू कर देते हैं हालांकि वो उसके दूरगामी परिणाम देखना भूल जाते हैं. अब समझना आपको है जनसंख्या की विकास दर पर ब्रेक आपको लगाना है. तब शायद आने वाले समय में इस पर रोक लग सकती है. बाकि आप खुद समझदार हैं और समझदारी का परिचय देते रहते हैं।

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