छोटी सी उम्र में बड़ी कोशिश का दूसरा नाम, ताइरा भार्गव

कहते हैं किसी काम को अंजाम तक पहुंचाने में उम्र कभी रोड़ा नहीं बनती क्योंकि आज छोटी सी उम्र से लेकर उम्र के आखिरी पड़ाव में ऐसे न जानें कितने हैं जो नए-नए आयाम गढ़ जाते हैं. उन्हीं लोगों में एक हैं गुड़गांव के श्रीराम स्कूल के दसवीं में पढ़ने वाली ताइरा भार्गव

अगर आपसे कोई पूछे की आपने अपने बचपन यानि की दसवीं के वक्त क्या किया तो कुछ लोगों का जवाब शायद होगा की जहां एक तरफ बोर्ड थे हम उसकी तैयारी में लगे थे तो कुछ लोगों का जवाब एग्जाम के साथ मस्ती, खेल कूद में वक्त निकाल देते थे. लेकिन क्या कभी आप में से किसी ने अपने आस पास के उन लोगों को देखा जो सुविधाओं की आस और आभाव में अपना जीवन बिता रहे होते हैं, जिन्हें हम सब गरीब कहकर बुलाते हैं. क्या आपने कभी उनकी भलाई के लिए कुछ करने का सोचा..? शायद, अधिकतर लोगों का जवाब न होगा. लेकिन हम आपको बताने आए हैं गुड़गांव की रहने वाली एक ऐसी लड़की के बारे में जो उन लोगों की परवाह करती है. जो जरूरतमंद होते हैं. दिल्ली की रहने वाली ताइरा अभी दसवीं क्लास में पढ़ती हैं, और वो पढ़ाई करने के साथ-साथ गरीबों का पेट भरने के लिए अनेकों प्रयास कर रही हैं.

एक शादी समारोह से आया छोटा सा ख्याल

चलिए हम आपको बताते हैं की ताइरा भार्गव के साथ ऐसा क्या हुआ जो वो उन जरूरतमंदों के लिए जीना सीख गई. दरअसल ताइरा एक परिचित के यहां शादी समारोह में गई थी. जहां उन्होंने देखा कि काफी सारा खाना यूं ही बेकार कर दिया गया और उसे बाद में फेंक दिया गया.

खाने की इस बर्बादी का अंदाजा लगाते हुए ताइरा ने सोचा की काश ये खाना उन लोगों तक पहुंच पाता जो लोग इसके असल हकदार हैं, जिसके बाद ताइरा वहां से घर लौटकर आई और उन्होंने सोचा कि वे गरीब और भूखे लोगों के लिए कुछ करेंगी. घर लौटने के बाद ताइरा ने इसके बारे में रिसर्च करना शुरू किया. इस बीच ताइरा के दिमाग में आइडिया आया कि इसी तरह बेकरी में भी ब्रेड जैसा काफी सामान बनता होगा जो समय रहते बिक नहीं पाता होगा जिससे वो भी यूं ही फेंक दिया जाता होगा. उन्होंने सोचा कि क्यों न इसे बेकार होने से पहले ही भूखे लोगों में बांट दिया जाए.

डबल रोटी फाउंडेशन भरता है, सैकड़ो लोगों का पेट

जिसके बाद ताइरा ने मॉडर्न बेकरी से संपर्क किया और उनसे अपना आइडिया शेयर किया. ताइरा की बात को बेकरी वालों ने समझा और अपनी तरफ से अच्छा रिस्पॉन्स दिया. उन्होंने ताइरा को एक निश्चित मात्रा में ब्रेड और बाकी चीजें मुफ्त में देने पर सहमति प्रदान कर दी. जिसके बाद ताइरा ने अपना एक फाउंडेशन बनाया जिसका नाम रखा ‘डबल रोटी’ क्योंकि ब्रेड का हिंदी वर्जन नाम डबल रोटी होता है. ताइरा कहती हैं कि, हमारी पहल के दो मकसद हैं, एक तो जरूरतमंदों का पेट भरना और दूसरा खाने की बर्बादी को रोकना. ताकि उसे उन लोगों तक पहुंचाया जा सके जिन्हें इसकी जरूरत है.’

इसके साथ वो बताती हैं कि, ‘बेकरी से अच्छे रिस्पॉन्स के बाद उन्होंने खाने पीने का सामान ले कर भूखे और जरूरतमंद लोगों में बांटनां शुरू किया.’ वो कहती हैं, ये ब्रेड पूरी तरह खाने योग्य होता है क्योंकि बेकरी का जो सामान एक या दो दिन में एक्सपायर होने वाला होता है उसे हम उठा लेते हैं और जल्द से जल्द जरूरतमंद लोगों तक बांट देते हैं. ‘

इस काम को करने में मेरे साथ मेरा भाई, मम्मी और मेरे पापा भी होते हैं. वे सप्ताह में एक बार लोदी रोड के पास शनि मंदिर, वसंत विहार, मदर टेरेसा फाउंडेशन और जंगपुरा जैसे इलाकों में जरूर जाते हैं और वहां उस ब्रेड को बांट कर आती हैं. अधिकतर समय में उनके साथ या तो उनका बड़ा भाई या फिर मम्मी होती हैं जो मेरा पूरा सहयोग करती हैं.

300 से ज्यादा जरूरतमंदों का भरता है, ब्रेड से पेट

ताइरा बताती हैं कि, “अभी तक वो लगभग 300 से ज्यादा जरूरतमंदों तक इस पहल को पहुंचा चुकी हैं. साथ ही वो कहती हैं कि, ब्रेड पाकर बच्चों को काफी खुशी मिलती है और बच्चों के चेहरे की खुशी देखकर मुझे खुशी मिलती है.

आपको बता दें कि, ताइरा के माता-पिता कॉर्पोरेट जॉब में हैं. लेकिन ताइरा आगे चलकर मेडिसिन की पढ़ाई करना चाहती हैं. ताइरा कहती हैं कि ये छोटी सी पहल है, जो वो आसानी से कर पा रही हैं. लेकिन आने वाले समय में वो इसको बड़े पैमाने पर करना चाहती हैं. ताइरा ने इसके लिए अपनी वेबसाइट बनाई है. जिससे आप भी इस पहल से जुड़ सकते हैं और साथ ही आप अपनी मदद ताइरा के सहारे उन लोगों तक पहुंचा सकते हैं. जाहिर है, किसी काम को अंजाम देने के लिए उम्र या तजुर्बा नहीं आपकी लगन माइने रखती है.

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