‘चेकुट्टी’ नाम की गुड़िया कैसे बन गई केरल के बाढ़ पीड़ितों की उम्मीद

केरल बाढ़ 2018, गॉड ऑन कंट्री में आई इस तबाही को कोई कैसे भूल सकता है। इस बाढ़ रुपी विभिषिका ने सिर्फ केरल में तबाही मचाई थी लेकिन उसके प्रकोप का असर देश के हर कोने में देखने को मिला था। इस बाढ़ में 373 लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी तो वहीं 2 लाख 69 हजार से ज्यादा लोग बेघर हो गए। इस बाढ़ को भारत सरकार ने लेवल थ्री की त्रासदी माना तो वहीं राज्य सरकार की रिपोर्ट बताती है कि, केरल की 1/6 आबादी सीधे तौर पर इस बाढ़ से प्रभावित हुई थी। बाढ़ की इस विभिषका को हम सबने अपनी आंखो से देखा, हमने देखा कि किस तरह से बाढ़ ने एक के बाद एक केरल के जिलों को और गांवों को अपनी जद में लिया। इस मंजर को भुलाया नहीं जा सकता। कुछ ही दिनों में इस तबाही के दो साल हो जाएंगे।

जानकार मानते हैं कि, केरल में एक और ऐसी ही बाढ़ आएगी। इसका एक बड़ा कारण है कि, केरल में वॉटर मैनेजमेंट सिस्टम उतना अच्छा नहीं है जितना होना चाहिए और शायद यहीं कारण है कि, बाढ़ का खतरा अभी टला नहीं है। बाढ़ के खतरे से भले ही सरकार अभी चिंतित न हो लेकिन कुछ लोगों ने बाढ़ की विभिषिका से लड़ने का तरीका ढूंढ़ निकाला है। बाढ़ के आने और जाने के कारण इन लोगों को नुकसान हो रहा था उस नुकसान की भरपाई अब जादू की गुड़िया कर रही है, बस यूं समझ लीजिए कि, यह गुड़िया केरल का नया सिंबल बन चुकी है।

केरल के हैण्डलूम कैपिटल के लिए वरदान बनी गुडिया ‘चेकुट्टी’

Chekutty doll

केरल में एक गांव है चेंदामंगलम, इस गांव को हैंडलूम/करघों की धरती भी कहा जाता है। जब केरल में बाढ़ आई तो कई लोगों की नौकरियां भी चली गई और कइयों को बड़ा नुकसान हुआ। हैण्डलूम पर कपड़े बुनने वाले कई लोगों को भी बड़ा नुकसान पहुंचा। एक अनुमान के अनुसार करघों का काम करने वाले लोगों को लगभग 10 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यानि 2018 में आई बाढ़ ने लोगों की आजीविका के संग ही एक पारंपरिक काम की राजधानी की परंपरा को भी नष्ट कर दिया था। यहां पारंपरिक हैण्डलूमों में करीब 500 लोग काम करते हैं, जो एक खास तरह के धागे से बुनाई करते हैं जो पीढ़ियों से ट्रांसफर होते हुए आए हैं। ऐसे ही एक कारीगरों में हैं यहां के रहने वाले राजन जो अपनी पत्नी के संग ‘चिंडा मंगलम मंडू’ साड़ी तैयार करते हैं। इस बाढ़ से हैण्डलूम के काम को सबसे बड़ा नुकसान यह पहुंचा कि, जो कपड़े इन लोगों ने बनाए थे वो सारे के सारे बाढ़ में खराब हो गए। इन कपड़ों को बाढ़ के पानी ने ऐसा खराब किया कि, कितनी भी धुलाई हो जाए एक न एक दाग रह ही जाता था। ऐसे में हैंडलूम कारीगर काम बंद ही करने वाले थे क्योंकि इनके पास कोई चारा नहीं था।

इस दौरान फैशन डिजाइनर शालिनी जेम्स ने इन कारीगरों से संपर्क किया और अपने कुछ दोस्तों की मदद से हैंडलूमों के खराब कपड़ो को ड्राइक्लीन करके मार्केट में इसे बेचकर इस कम्युनिटी के लिए कुछ पैसे जुटाए। लेकिन अब भी दिक्क्त यह थी कि, ये कपड़े पूरी तरह से साफ नहीं हो सकते थे ऐसे में इन्हें जला देना ही एक उपाय मात्र दिख रहा था। लेकिन इसी समय लक्ष्मी मेनन जैसी फेशन डिजाइनर के दिमाग में इन बेकार हो गए कपड़ों से गुडिया बनाने का आइडिया आया। किसी को शुरू में इस आइडिया पर उतना तो विश्वास नहीं था लेकिन आखिरकार यह गुडिया आज केरल की आशा की किरण बन गई है। लक्ष्मी ने एक ओर यहां के लोगों को इस बेकार पड़े कपड़े से गुड़िया बनाने के काम में शामिल किया और साथ ही इन गुड़ियों को एक अच्छा मार्केट दिया जा सके इसके लिए भी काम किया, जल्द ही लोगों की ओर से अच्छा रिस्पॉन्स ‘चेकुट्टी’ नाम की इस गुड़िया को मिला।

Chekutty doll की खासियत है उसके एक्सप्रेशन

Chekutty doll

‘चेकुट्टी’ नाम की इन गुड़ियों की खासियत ये हैं कि, एक तो ये कपड़ो से बनी हैं साथ ही ये अलग—अलग एक्सप्रेशन वाली होतीं हैं। लक्ष्मी की माने तो जब इन गुड़ियों को बनाने का काम शुरू किया गया तो लोग जो इसे बना रहे थे और जो इसे खरीद रहे थे, उनके मन में एक ही भाव था कि एक भी गुड़िया बनाई या खरीदी तो वे केरल की रीबिल्डिंग में अपनी ओर से एक ईंट का योगदान कर रहे हैं। इसी भाव ने इन कपड़ों की गुड़ियों को इनके मूल कपड़े से भी ज्यादा प्रॉफिटेबल बना दिया। दरअसल जो कपड़े बाढ़ में गंदे हो गए थे उन्हें अगर मार्केट में खरीदने जाएं तो एक साड़ी 1500 से 1600 रुपये की मिलती है। लेकिन यहां एक साड़ी के कपड़े से 350 चेकुट्टी गुड़िया बनाई जा सकती है और यह हर एक गुड़िया मार्केट में 25 रुपये में बिकती है। ऐसे में एक ही साड़ी से अब 9 हजार तक की इनकम ये लोग कर पा रहे हैं।

इस गुड़िया को बनाने में अपना सहयोग देनेवाली 5 में से एक संस्था का बाढ़ में 20 लाख का कपड़ा बर्बाद हो गया। लेकिन गुड़िया की बिक्री से मात्र 4 महीनों में ही इन लाोगों को 35 लाख रुपया मिला। ‘चेकुट्टी’ गुड़िया की कामयाबी अब एक आशा की किरण बन गई है। इसकी कामयाबी बताती है कि, आगे भी अगर केरल में 2018 जैसी भीषण बाढ़ आई फिर भी केरल के लोग खुद से खुद को खड़ा कर लेंगे। 

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