चिपको आंदोलन की गाथा लिखने वाली गौरा देवी, जिन्हें शायद ही जानते होंगे आप!

हमारे समाज में जब भी कोई ऐसा काम होता है, जिससे समाज को या पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है तो कोई न कोई उसके बचाव में हमेशा खड़ा होता है. साल था 1973 और गांव था, उत्तर प्रदेश का मंडल गांव. उस समय उत्तर प्रदेश सरकार ने व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए करीब 300 पेड़ों को काटने की मंजूरी दी थी. जिसे रोकने के लिए दशौली स्वराज्य सेवा संघ के संस्थापक चंडी प्रसाद भट्ट ने गांव के निवासियों को आगे बढ़कर पेड़ों को कटने से बचाने के लिए प्रेरित किया. लेकिन इतिहास के पन्नों में इसको असल मान्यता साल 1974 में, जिसका नाम पड़ा चिपको आंदोलन.

इस दौरान गाँव की निवासी गौरा देवी ने अपने आसपास की महिलाओं को लकड़हारे के पास खड़े होने के लिए तैयार किया और उन सब के संयुक्त प्रयासों ने उस समय 2,500 पेड़ों को कुल्हाड़ी की धार से कटने से बचा लिया. जिसके बाद से ये आंदोलन, भारतीय मानस का एक प्रमुख हिस्सा बन गया.

लेकिन हम में से गिने चुने लोग ही होंगे, जो इस महिला के बारे में जानते होंगे, जिन्होंने सरकार से लेकर पेड़ों को काटने आए लोगों से अपने आस-पास के वनों को बचाया. चलिए हम आपको परिचित कराते हैं. इसी बहादुर महिला से जिसने एक छोटी सी हिम्मत जुटा कर इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया. साल  1925 में जन्मी गौरा देवी चमोली जिले के लता गाँव के आदिवासी मरचा परिवार से थी. उनका परिवार परंपरागत रूप से ऊन के व्यापार में लगा हुआ था.

चंडी प्रसाद भट्ट के साथ, शुरू किया था गौरा देवी ने मिशन

जब गौरा देवी बड़ी हुई तो पास ही के गांव में उनकी शादी कर दी गई और  दुर्भाग्यवश, जब गौरा देवी का बेटा दो साल हुआ तो, उनके पति का निधन हो गया, जिसके बाद 22 वर्षीय गौरा देवी ने अपने घर जिम्मेदारियों के साथ-साथ परिवार के ऊन के व्यापार को भी संभाल लिया. गौरा के अनुभवों ने उन्हें महिलाओं के संघर्ष के प्रति जागरूक किया, जिसने उन्हें पंचायत और अन्य सामुदायिक पहलुओं पर भी लोगों के बीच सक्रिय कर दिया. इस दौरान गौरा देवी हमेशा से वन संरक्षण के साथ-साथ वनों की सुरक्षा की वकालत करती रही. यही वजह रही की उन्होंने महिला मंगल दल का नेतृत्व करने का फैसला लिया. जिसका लक्ष्य था  गाँव में स्वच्छता सुनिश्चित करने के साथ-साथ सामुदायिक वनों की सुरक्षा करना और इस समय गौरा देवी की उम्र थी चालीस साल.

तब तक चिपको आंदोलन ने पहले से ही व्यापक जागरूकता पैदा करना शुरू कर दिया था और इससे प्रेरित होकर, गौरा देवी ने जंगलों के महत्व के बारे में प्रचार करने के लिए आसपास के गांवों में कई अभियान शुरू किए.

गौरा देवी

इस दौरान 1974 में, जब राज्य सरकार ने बेल्ट में 2,500 पेड़ों की कटाई के लिए अधिकृत किया, तो ग्रामीणों को प्रतिशोध लेने की जल्दी थी, जिसमें गांव की गौरा देवी ने इसका खुलकर विरोध किया. लेकिन इसे विरोध को हवा मिली दशौली स्वराज्य सेवा संघ के संस्थापक चंडी प्रसाद भट्ट के साथ, क्योंकि उन्होंने और गौरा देवी ने मिलकर इसका विरोध करने ठानी.

मंडल में अग्रदूत की तरह, उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया, जिसमें रेनी गांव और आस-पास के क्षेत्रों में सार्वजनिक बैठकें, रैलियां निकाली. इस दौरान अधिकारियों ने ना तो इसकी तरफ ध्यान दिया और न ही उनके विरोध पर कोई प्रतिक्रिया दी क्योंकि शायद, उन लोगों को ये मालूम नहीं था की गौरा देवी और उनके साथ की महिलायें पेड़ों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं.

पेड़ों को गले लगाकर, चिपको आंदोलन की शुरुवात हुई थी

पेड़ों को बचाने के लिए उन महिलाओं ने पेड़ों को गले लगा लिया और अधिकारियों को खुली चुनौती दी कि वे आगे बढ़ें और पेड़ों को काटने से पहले उनको पेड़ों के साथ ही काट ड़ाले…यहीं से शुरुवात हुई चिपको आंदोलन की.

गौरा देवी के प्रतिरोध की खबर ने लोगों को हिला के रख दिया और लगातार चार दिन के गतिरोध के बाद, ठेकेदार वहां से चले गए और ये आश लगी की कुछ समय बाद, राज्य सरकार ग्रामीणों की मांगों का अनुपालन करेगी और क्षेत्र में सभी वाणिज्यिक वनों की कटाई पर 10 साल का प्रतिबंध लगा देगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका.

हालांकि पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ों को गले लगाने की तरकीब एक अचूक तरीका बन गया. लेकिन गौरा देवी का नाम धीरे-धीरे गुमनामी के अंधकार में खो सा गया.

इस घटना के बाद भी, वह महिलाओं को और अधिक विरोध प्रदर्शनों और रैलियों का आयोजन करने के लिए जुटाती रही, लेकिन क्योंकि वह अनपढ़ थी, उसे नीति-निर्माताओं द्वारा वनों के संरक्षण के बारे में कभी भी आमंत्रित नहीं किया गया और 66 साल की उम्र में गौरा देवी की रेनी में असामयिक मौत हो गई.

आज उत्तराखंड के लोगों को छोड़कर, गौरा देवी के बारे में किसी को जानकारी उनके बारे में पता नहीं है. महिला कहानी की आधुनिक ‘झाँसी की रानी’  गौरा देवी आज हम सभी के बीच किसी अंजान कहानी की किरदार की तरह खत्म सी हो गई हैं, लेकिन उनका आंदोलन आज लोगों के बीच किसी योद्धा की तरह खड़ा है.

Indian

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

Bluetooth - इस नाम से जुड़ी है एक राजा की कहानी

Thu Jul 11 , 2019
Share on Facebook Tweet it Pin it Email Bluetooth लगभग हर फ़ोन में होता है। फोन ही नहीं बल्कि कम्प्यूटर तमाम गैजेट्स, टीवी और गाडी में भी हम ब्लूटूथ कनेक्ट कर सकते हैं। इसने ना सिर्फ मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल को और बेहतर बना दिया बल्कि फाइल शेयरिंग को भी बहुत […]
Bluetooth