घिनौनी मानसिकता, समाज का दूसरा चेहरा

कहते हैं, भारत एक लोकतांत्रिक देश हैं. यही वजह है कि, यहाँ रहने वाले हर एक इंसान को खुली साँस लेना….खुली साँस मतलब कुछ भी कहने की आज़ादी है. अपना बात रखने की आज़ादी है. यहाँ तक की देश में किसी भी गंभीर से गंभीर मुद्दे पर भी खुलकर सामने आने की भी आज़ादी है. हो भी क्यों न, लोकतंत्र की परिभाषा ही कुछ ऐसी होती है. जो सबको समानता का अधिकार देती है.

आज अगर भारत की बात करें तो, जहाँ एक तरफ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में सब भाई-भाई का नारा चलता था. आज वहीं पूरे देश में एक अलग तरह की आंधी चल रही है कि, कोई किसे कैसे दोषी ठहराए. हाल ही में हमारे देश में ने दो भारतीय सिनेमा के कलाकारों को खोया. जिनमें एक थे, भारतीय सिनेमा के अपनी एक्टिंग के दम पर अपनी पहचान बनाने वाले इरफान खान, तो दूसरी तरफ रोमांस में चॉकलेटी बॉय के नाम से मशहूर ऋषि कपूर.

ऋषि कपूर और इरफान की पहचान

भारतीय सिनेमा के इन दो नायाब कलाकारों का जाना, हर किसी की नज़र में बहुत बड़ी छति सा है. क्योंकि हमने दो ऐसे कलाकारों को खोया है. जो हमेशा से समाज के सामने अपनी बात रखने में आगे रहते थे. देश में जिस समय इरफान खान की मौत की खबर पूरे भारत में फैली. हर इंसान के अंदर की संवेदनाऐं बाहर आने लगी. चाहे सोशल मीडिया, न्यूज चैनल हो, फिल्म अभिनेता से लेकर राजनेता हो सभी ने उन्हें उसी आदर की तरह लिखा. जैसा की वो असल हकीकत में थे. क्योंकि इरफान खान हमेशा से खुले विचारों वालों में से एक थे. जिन्हें ऊपर वालों से अपना कनेक्शन बनाने के लिए न तो किसी मौलवी की जरूरत पड़ती थी. न ही कभी वो किसी भी ईद पर किसी बकरे की बली देने की पक्ष में थे. क्योंकि उनका मानना था कि, किसी को ठेस पहुंचाना किसी भी तरह से अच्छा नहीं हो सकता.

इसके उलट जिस समय ऋषि कपूर के जानें की खबर सोशल मीडिया से लेकर न्यूज चैनल्स में चली हर इंसान अपनी संवदेनाऐं प्रकट करने लग. हर इंसान कुछ न कुछ उनके लिए लिखने लगा.

कहाँ से आती है, इतनी घिनौनी मानसिकता

दोनों कलाकारों ने अपने फिल्मी करियर में इतने संजीदा किरदान निभाए की हर इंसान इन्हें याद करने पर विवश हो गया.

लेकिन इसी के उलट हमारे समाज में एक और मानसिकता वाले लोग रहते हैं. जिन्हें घिनौनी मानसिकता या दोहरा चेहरा कहें तो शायद गलत नहीं होगा. क्योंकि जिस समय इरफान खान की मौत पर हर इंसान उनके बारे में सोच रहा था.

वहीं कुछ लोग इरफान खान को लेकर अलग-अलग तरह की बातें रख रहे थे. जिसमें उनका कहना था कि, इरफान खान का मरना हमारे लिए अच्छा है. या यूँ कहें तो हम अपने शब्दों में उन शब्दों का प्रयोग ही नहीं कर सकते. क्योंकि इतनी घिनौनी लेखनी उन्हीं की हो सकती है. जिनकी घिनौनी मानसिकता होती है. जो लोकतंत्र के आड़ में हमेशा दो इंसानों को भड़काते रहते हैं.

वो भी इसलिए क्योंकि इरफान खान किसी इंसान को अपने से ऊपर नहीं मानते थे. वो मानते थे तो महज़ अल्लाह को….इसी तरफ ऋषि कपूर की मौत के बाद सोशल मीडिया पर जहाँ हर इंसान उन्हें श्रद्धाजंलि दे रहा था.

वहीं एक वर्ग उनके जाने पर खुशी मना रहा था. क्योंकि उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था वो गौ मांस खाते हैं. और ये बात उन लोगों को हजम नहीं हो सकती. जिनका समाज में कोई अस्तित्व ही नहीं है. क्योंकि उन्हें लगता है. कोई इंसान हमारे धर्म, हमारे मजहब पर इस तरह खुलकर कैसे बोल सकता है. कैसे अपनी बात रख सकता है.

एक कहावत है, बुरी चीजें जल्दी सबको अपने जद में ले लेती हैं, सिवाए अच्छी चीजों के….और हकीकत भी यही है, क्योंकि आज भारत में जो स्थिति है. वो कुछ इसी की हकीकत बयां करती है. जहाँ एक वर्ग दूसरे वर्ग को नीचा दिखाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता. क्योंकि या तो वो खुद को सर्वोपरि समझने लगा है….या उसे सामने दिखने वाली हर एक चीज में खामियां नजर आने लगी हैं.

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