गांव का गोदना अब शहर का टैटू बन गया है…. लुप्त हो गई है यह अनोखी भारतीय परंपरा

टैटू…. इसके बारे में कुछ निगेटिव बोल के देखिए आज के दौर में आप सीधे आउट डेटेड करार दे दिए जाएंगे. भले आमने सामने नहीं पीठ पीछे दो तीन लोग तो ऐसा कह ही देंगे। टैटू आज के युवाओं के बीच तेजी से बढ़ता हुआ क्रेज है. ये क्रेज कुछ ऐसा है कि क्या बड़े, क्या बूढ़े और क्या महिलाएं और मर्द, सब अपने शरीर को आकर्षक बनाने के लिए टैटू बनवाना चाहते हैं। लेकिन अगर असल में टैटू का इतिहास आप जानेगें तो खुद ही आउटडेटेड महसूस करेंगे. लेकिन आपके लिए हमारे पास एक कहावत है कि, दुनिया गोल है.

दरअसल आज जिस टैटू के पीछे दुनिया पागल हुई है वो कई सालों से हमारे देश की परंपरा का हिस्सा रही है। सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया की तमाम पुरानी सभ्यताओं में टैटू की परंपरा रही है। बात अपने देश इंडिया की करें तो हमारे देश में नार्थ इंउिया में टैटू का शुद्ध देसी नाम ‘गोदना’ है। वहीं साउथ में इसे ‘पचकुतरथु’ नाम से जाना जाता है। वैसे ये वाला टैटू स्थायी होता है। यानी एक बार आपने गोदना गोदवा दिया तो फिर प्राण निकलने के बाद भी वो आपकी बॉडी पर रहेगा। देश के कई हिस्सों में गोदना गोदवाना एक परंपरा रही है और कई जगहों पर इसे आज भी लोग अपनाए हुए हैं। कईयों में तो गोदना शरीर के श्रृंगार का हिस्सा रहा है तो कईयों में यह विरोध जताने का तरीका।

विरोध से लेकर रोगों के ईलाज तक के लिए गोदवाया जाता था गोदना  

आदिवासियों की बात करें तो इनके समाज में गोदना गुदवाना शहरी फैशन वाले टैटू की तरह फैशन से नहीं जुड़ा हुआ। बल्कि मान्यताओं और गुलामी की जंजीरे को तोड़ने की लिए लोग इसे अपने शरीर पर गुदवाते हैं। आपने रामनामी संप्रदाय के बारे में तो सुना ही होगा जिनके पूरे बदन पर राम नाम का टैटू गुदा हुआ रहता है…यह धर्म के साथ ही एक विरोध का आंदोलन भी था। इसके अलावा सहरिया आदिवासी युवावस्था में अपने शरीद पर टैटू बनवाते है, इन लोगों का मानना है कि अगर बच्चा इससे होनेवाले दर्द को सह लेता है तो वह बच्चा मर्द बनेगा। बैगा नाम की जनजाति की महिलाएं आठ साल की उम्र में ही शरीर पर गोदना बनवाना शुरू कर देती हैं और शादी के बाद भी वो गोदना बनवाती हैं। इन जनजातियों में गोदना महिलाओं के लिए श्रृंगार का एक हिस्सा है।

ये लोग इसे धर्म मानते हैं। वहीं इनमें मान्यता है कि बरसात को छोड़कर किसी भी महिने में गोदना गुदवाया जा सकता है। ऐसी भी मान्यता है कि जो बच्चा चल नहीं सकता, चलने में कमजोर है, उस के जांघ के आसपास गोदने से वह न सिर्फ चलने लगेगा बल्कि दौड़ना भी शुरू कर देगा। वहीं कुछ लोग मानते हैं कि इससे कई असाध्य रोगों का ईलाज भी संभव होता है और शरीर निरोगी रहता है। भारतीय राज्यों उड़ीसा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल के आदिवासियों में गोदना कॉमन बात है। भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में संथाल, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, बोडो, भील, खासी, सहरिया, गरासिया, मीणा, उरांव, बिरहोर वगैरह हैं और गोदना को लेकर इन सबकी अलग—अलग मान्यताएं हैं।

सिर्फ आदिवासियों में ही गोदन की परंपरा नहीं है। आम भारतीय समाज में भी गोदना का क्रेज प्राचीन काल से रहा है। खासतौर पर महिलाओं में… आमतौर पर महिलाएं शादी के समय अपनी हथेली पर अपने पति का नाम गुदवा लेती थी। यह उनके पहचान के रूप में माना जाता है। वहीं पुरूष भी अपनी स्त्री से प्यार जताने लिए गोदना का दर्द सहकर उनका नाम गुदवाते थे।

पौराणिक है गोदना का इतिहास

गोदना के इतिहास की बात करें तो मिस्त्र की मम्मीज में गोदन के निशान मिले हैं। यानि दुनिया में टैटू की परंपरा कोई नई चीज नहीं है। लेकिन बात अगर भारत की करें तो यहां भी यह परंपरा सदियों पुरानी रही है। रामायण और महाभारत काल में भी इसका जिक्र आता है। कृष्ण लीला में गोदना गोदनी का जिक्र आता है, जिसमें बताया गया है कि कृष्ण नटीन के रूप में गोपियों के हाथों पर गोदना गोदा करते थे। इसके अलावा वैष्णव संप्रदाय के लोग भी सदियों से अपने हाथों पर शंख, गदा, कमल ओर चक्र का गोदन गोदवाते आ रहे हैं। वहीं शैव संप्रदाय वाले त्रिशूल गुदवाते हैं।

देसी टैटू के देसी नाम भी हैं

देसी टैटू यानि की गोदना के अपने कई प्रकार होते है… यह आज के डिफ्रेंट टैटू स्टाइल्स की तरह ही है। खास बात यह है कि इनके गुदवाने को लेकर कई मान्यताएं भी है। महिलाएं माथे पर सुन्दरता के लिए बिन्दी की आकृति गुदवाती हैं जिसे लेकर मान्यता है कि इससे बुद्धि भी बढ़ती है। वहीं दांतो की मजबूती के लिए ठोढी में गोदना गुदवाया जाता हैं जिसे ‘मुट्की’ कहते हैं। नाक की गोदना को ‘फूल्ली’ और कान की गोदना को ‘झूमका’ कहते हैं। गले में हसुली सुन्दरता और आवाज में मधुरता के लिए गुदवाया जाता है। कलाई की गोदना को ‘मोलहा’ कहा जाता है। इसे गुदवाने से स्वर्ग में भाई-बहन के मिलने की मान्यताएं हैं। हथेली के पीछे गोदवाए जाने वाले गोदना को ’’करेला चानी’’ और हथेली के पीछे वाले को ’’हथौरी फोराय’’ कहते है। अंगूठा में मुन्दी और पेंडरी में लवांग फूल गुदवाया जाता है।

बात पैरों की करें तो ‘चूरा-पैरी’ और पंजा में ‘अलानी गहना’ गुदवाने की परंपरा पूरे भारत में है। पैर के अंगूठे वाले गोदना को ‘अनवठ’ कहते हैं। इसी तरह शरीर के प्रत्येक अंगों में हाथी पांज, जट, गेंदा फूल, सरसों फूल, कोंहड़ा फूल, षंखा चूड़ी, अंडरी दाद, हल्दी गांठ, माछी मूड़ी पोथी, कराकुल सेत, दखिनहा, धंधा, बिच्छवारी, पर्रा बिजना, हरिना गोदना अनेक अलग-अलग नामों से गोदना गुदवाये जाते हैं। इन सभी गोदना के अपने अलग—अलग महत्व हैं।

गोदना का रंग और इसे गोदने वाली जातियां

गोदना गोदने वाली जातियों की बात करें तो इस कला में सबसे ज्यादा निपुण वादी, देवार, भाट, कंजर, बंजारा, और मलार माने जाते हैं। वैसे इस काम को सबसे ज्यादा महिलाएं ही करती हैं। गोदना गोदने के लिए सुईयों का प्रयोग होता है। सुईयों की संख्या गोदने की आकृति के अनुसार उपयोग में लाई जाती है। कम चौडी गोदना के लिए चार सुईयां और अधिक चौडी के लिए छः-सात सुईयों का यूज होता है। गोदने के रंग के लिए रामतिल या किसी भी तेल के काजल को तेल या पानी के साथ मिलाकर लेप बनाया जाता है। इसी लेप में सुईयों को डूबोकर शरीर में चुभा कर गोदना की मनमोहक आकृतियां बनाई जाती हैं। आकृतियां बनाने के बाद पानी या गोबर के घोल से इसे अच्छी तरह धोकर इसमें तेल और हल्दी का लेप लगाया जाता है। रेडी का तेल और हल्दी के लेप से सूजन नहीं होता है और गोदना जल्दी सूख जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि बहुत पहले बबूल के कांटे को बलोर के रस में डूबोकर गोदना गोदा जाता था।


हमारे देश में ज्यादात्तर ग्रामीण इलाकों में गोदना का चलन रहा है। लेकिन अब गांव के लोगों ने इस परंपरा को त्याग दिया है। वहीं शहरों में गोदना नए जेनरेशन के लिए नए नाम के साथ आ गई है। लेकिन एक जगह पर ऐसा लगता है कि टैटू की चमक और चौंध गोदन को चमक को बढ़ाने के बजाए इसपर भारी पड़ रही है। आज के दौर में अगर हम टैटू और गोदन को एक साथ रखें तो लगता है कि दो जेनरेशनों के बीच में एक बड़ा अंतर आ चुका है।

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