गणेश चतुर्थी बनी थी, आजादी की नींव!

आज गणेशोत्सव है। यानी गण्पति पप्पा का आगमन हुआ है। महाराष्ट्र सहित पूरे भारत में आज गौरी पुत्र गणेश की अराधना करते हुए लोग खुशी मना रहे हैं, नाच गा रहे है ओर झूम रहे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि सालभर में एक बार मनाए जानेवाले इस गणेशोत्सव की शुरूआत कब हुई? और क्या आप यह जानते हैं कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भगवान गणेश का क्या रोल रहा है? अगर नहीं तो हम आपको इससे आज गणेशोत्सव के दिन ही अवगत कराने जा रहे हैं।

जिस गणेशोत्सव को आज लोग सावर्जनिक रुप से बड़े ही धूमधाम से मना रहे हैं उसकी नीव भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महानतम नेता बाल गंगाधर तिलक ने रखी थी। इस पब्लिक फंक्शन को शुरू करने को लेकर गंगाधर तिलक को अपनी ही पार्टी कांग्रेस के अंदर ही विरोध भी झेलने पड़े थे, लेकिन वे जानते थे कि गणेशोत्सव के जरिए भारत के लोंगो को जोड़ कर उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित किया जा सकता है। दरअसल 1857 की क्रांति को अंग्रेजों द्वारा बर्बरता से कुचले जाने के बाद देश में स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन धीमा ओर सुस्त पड़ गया था। अंग्रेजो ने आम लोंगों के एक जगहों पर इकठ्ठा होने तक को लेकर कई कड़े नियम बना दिए थे। जिसके कारण आम भारतीय जनता एक साथ ज्यादा वक्त तक न तो मिल पाती थी न एक दूसरे से बातचीत ही कर पाती थी।

1857 के बाद गणेश चतुर्थी बनी थी, आजादी की नीव!

1857 के बाद 1885 में बनी कांग्रेस ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभाल ली थी। लेकिन कांग्रेस का यह फेज अंग्रेजों संग आपसी बातचीत और अनुनय विनय वाला था। इस प्रकार इस दौरान कांग्रेस के इन नेताओं की कूटनीति के कारण अंग्रेजों ने इनकी कई बातें मान ली और थोड़ी कुछ कड़ाई कम की। लेकिन अभी भी बात नहीं बन रही थी।  भारत की आम जनता अभी भी अपनी आजादी के लिए सजग नहीं थी। कांग्रेस के इसी फेज में दो धड़े भी हुए जिसमें नरम दल पुरानी और शांति की बातों को लेकर स्वतंत्रता संग्राम करना चाहता था तो गरम दल अंग्रेजों के खिलाफ उग्र विचारों वाला था।

बाल गंगाधर तिलक इसी धड़े के नेता थे। उनके विचारों से जनता तो प्रभावित होती थी लेकि बड़ीबात अभी भी लोगों के एकजुटता और एक जगह पर इकठ्ठा होने की थी। जब तिलक ने इस उत्सव की शुरूआत की तो कांग्रेस के नरम धड़े ने इसका विरोध किया क्यों कि उन्हें डर था कि इससे समाजिक तनाव बढ़ेगा और आंदोलन धार्मिक रंग ले लेगा। लेकिन कांग्रेस के  गर्म दल के नेता जैसे कि लाला लाजपत राय, विपिन्द्र चंद्र पाल, अरविंदो घोष जैसे नेताओं ने इसका समर्थन किया।

गणपति बप्पा के महोत्सव से लोकप्रिय हुए बालगंगाधर तिलक

जल्द ही गणेशोत्सव काफी लोकप्रिय हो गया। इस दौरान  लोंगो की भारी भीडत उमड़ने लगी। गणेशोत्सव के जरिए ही बालगंगाधर तिलक ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को और धार दी। इस दौरान उनकी सभाओं ओर जोशीले भाषणों ने लोंगो को आजादी की लड़ाई में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। जब तिलक ने इस सार्वजनिक उत्सव की शुरूआत की थी तब वे युवा क्रांतिकारी दल के नेता थे। इस दौरान जुटनेवाली भारी भीड़ को तिलक ने अपने स्वराज के क्रांतिकारी विचार से अवगत कराया जिसके कारण जल्द ही भारत के युवाओं का एक बड़ा दल उनके साथ आ गया। जिससे आजादी के आंदोलन को और गति मिली। कई लोग आज भी यही कहते हे कि तिलक नहीं होते तो आजादी ओर देर से मिल पाती।

गणेत्सव से घबराए थे, अंग्रेज

इतिहास से पता चलता है कि सार्वजनिक गणेशोत्सव से अंग्रेज काफी घबराए हुए थे। इस बारे में रॉलेट समिति की एक रिपोर्ट मे जो बातें कही गई हैं उससे यही लगता है कि गणेश पूजा से अंग्रेज काफी डरे थे। रिपोर्ट में कहा गया था कि इस आयोजन के दौरान युवाओं की ओलियां घूम—घूम कर अंग्रेजी शासन का विरोध करती हैं। स्कूली बच्चे पर्चे बांटते हैं। इस दौरान आम लोंगो से अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने और शिवाजी की तरह विरोध करने का आह्वाहन किया जाता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस दोरान तिलक, सावरकर, नेताजी बोस, रेंगलर परांजये, गोपीचंद्र शर्मा, सरोजनी नायडू जैसे जनआधार वाले नेता भाषण देने के लिए आते हैं।

यानि गणेशोत्सव गुलामी के समय में वह ढ़ाल बन गई थी जिसके पिछे छिप कर हमारे स्वतंत्रता संग्राम के हिरोज इस देश को आजादी दिलाने की पूरी रणनीति तैयार करते थे। अंग्रेजी सरकार को यह बात पता तो थी लेकिन कोई कुछ कर नहीं पाया। शायद इसमें गणपति पप्पा का ही हाथ होगा।

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