गणगौर साथी के साथ हमसफर की लंबी उम्र का त्योहार

भारतीय बाजारों से लेकर भारतीय गलियारों में त्योहारों की धूम हर महीने दिखाई देती है. क्योंकि भारत में त्योहार की झड़ी कभी समाप्त नहीं होती. नए साल की शुरुआत जहाँ लोहड़ी मकर संक्रांति से होती है. वहीं उसके बाद देश के हर कोने में महाशिवरात्रि, नवरात्र की धूम दिखाई देती है. जोकि पूरे उत्तर भारत में देखने को मिलती है. हालांकि विविधताओं भरे देश में जब हम राजस्थान की बात करते हैं तो ये राज्य खासकर अपनी धरोहर, सभ्यता और विरासत के लिए पहचाना जाता है. जहाँ की संस्कृति हर किसी को मोह लेती है. इसी तरह राजस्थान में एक त्यौहार चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है.

जिसे राजस्थान के लोग गणगौर के नाम से पहचानते हैं. इस त्योहार की खासियत ही है कि, समूचे राजस्थान में इसकी अलग ही झलक दिखाई देती है. जहाँ इस दिन लोग बड़ी-बड़ी झाकियां निकालते हैं. वहीं इस दिन को लड़कियां एवं विवाहित महिलाएं शिवजी और पार्वती जी की पूजा अर्चना करती हैं.

गणगौर त्योहार की खासियत

पौराणिक कहावतों की मानें तो, गणगौर त्योहार हमेशा से राजस्थान में आस्था प्रेम और पारिवारिक सौहार्द का त्योहार रहा है। होलिका दहन के दूसरे दिन यानि की चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शक्ल तृतीया तक मनाया जाने वाला ये त्योहार नवरात्रों के नव दिन की ही तरह 18 दिनों तक मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि, होली के दूसरे दिन ही माता गवरजा अपने नईहर यानि की अपने मायके चली जाती हैं. जिसके आठ दिनों के बाद भगवान शिव जिन्हें ईसर के नाम से जाना जाता है. वो उन्हें वापस लाने के लिए जाते हैं. जहाँ से चैत्र शुक्ल की तृतीया के दिन यानि की गणगौर के आखिरी दिन उनकी विदाई होती है.

गणगौर

इसी की तर्ज पर गणगौर हर साल मनाया जाता है. जिसमें पूजा के दौरान राजस्थानी लोकगीत गाए जाते हैं. ऐसा भी कहा जाता है कि, इन लोकगीतों में इस त्योहार की आत्मा बसती है. क्योंकि ये लोकगीत राजस्थानी सभ्यता के साथ-साथ राजस्थान की संस्कृति पर गाए जाते हैं। वहीं इस पर्व के दौरान गवरजा और ईसर की बड़ी बहन के साथ उनके जीजा जी की भी इन्हीं गीतों के जरिए पूजा की जाती है.

गणगौर पूजन के दिन ही अदा की जाती है वैवाहिक रस्में

इन गीतों के बाद अपने परिजनों के नाम पुकारे जाते हैं. जिसके बाद पूजा की समाप्ति की जाती है. हालांकि राजस्थान की कुछ जगहों पर गणगौर पूजन के दिन वैवाहिक रस्मों को भी अदा किया जाता है. साथ ही इस त्योहार के समय में कन्याएं व महिलाएं अपने परिवार की सुख समृद्धि के लिए गणगौर के हर वर्ष वापस आने की प्रार्थना करती हैं. साथ ये महिलाएं पूजा करने के दौरान दूब से पानी की छींटे ईसर और पार्वती जी पर डालती हैं।

हमेशा से ऐसा माना जाता है कि, इस त्योहार को महिलाएं अपने पतियों की लम्बी उम्र के लिए रखती है. इसके साथ लड़कियां अपने परिवार के साथ-साथ अपने होने वाले हमसफर के लिए रखती हैं.

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