खेतो में 5 रूपये के लिए काम करने वाली ज्योति की सघंर्ष कहानी आपको झंकझोर देगी

जब परेशानियां हमें घेरती हैं तो हम उनके सामने झुक जाते है, जब हमारी सिमाएं घटने लगती हैं तो हम समझौता करने लगते है और जब हमारे रास्ते में रोड़े अटकाने वालों की भीड़ बढ़ने लगती है, तो हम रूक कर उनसे भिड़ने के बजाए बचने की कोशिश करने लगते हैं। ये सब आम लोग करते है। लेकिन इन्हीं आम लोगों में से जब कोई इंसान इस कथन को गलत कर दिखाता है तो वो ही इंसान दुनिया की भीड़ से अलग होकर दुनिया के लिए एक बैंचमार्क सेट कर देता है।

आज हम जिस इंसान की बात कर रहे हैं उसकी जिंदगी भी कुछ ऐसी ही थी, एक आम सी जिंदगी और दुनिया भर की मुश्किलें। लेकिन उसमें सब्र और परेशानियों के सामने डट कर खड़े रहने की हिम्मत थी। जिसके कारण हुआ ये कि, एक के बाद एक मुश्किलें उसके चट्टानों जैसे इरादों से टकराकर चूर हो गए और उसकी मंजिल का रास्ता उसे दिखा दिया। हम जिसकी कहानी आपको बताने जा रहे हैं वो महिला है ज्योति रेड्डी। जो कभी तेज धूप में खेतों में काम करतीं थी लेकिन आज अपना ऑफिस है और नाम यूएस के बड़े बिलेनियर्स में गिना जाता है।

जिन्दगी माता—पिता के बिना कैसी होती है ये जानना हो तो अनाथ लोगों से इसके बारे में पूछ कर देखिए। यह कहावत हमने और आपने कईंयों के मुंह से सुनी होगी। लेकिन ज्योति की जिंदगी में यह कहावत थोड़ी अलग ही थी। मां बाप के होने के बाद भी माथे पर अनाथ का ठप्पा लगा रहा। पिता एक गरीब किसान थे 7 लोगों के परिवार को पालना पोसना काफी मुश्किल था तो पिता ने ज्योति को अनाथ आश्रम में छोड़ दिया और कह दिया कि वो भूल जाए कि, उसकी कोई मां भी थी। यह उनकी जिन्दगी का सबसे खराब दिन था जिस दौरान कई सालों तक उन्होंने अपनी मां का मुंह तक नहीं देखा। इस दौरान उनके पास कोई भी नहीं था जो उनके दु:ख को शेयर कर सके। लेकिन ज्योति इस दौरान टूटी नहीं और हालात को जैसा था वैसा अपनाने से इंकार भी कर दिया।

Jyothi Reddy- पिता के होने के बाद भी अनाथ बनकर रहना पड़ा

ज्योति ने खुद से इस दौरान एक कमीटमेंट किया कि वो कभी अपनी जिन्दगी की मुश्किलों से हार नहीं मानेगीं। वे इससे लड़ेंगी। अनाथ आश्रम में रहने के दौरान ज्योति सरकारी स्कूल में पढ़ती थी। वहीं के सुप्रीटेंडेंट के यहां वो बर्तन मांजने का काम भी करती थी। इसी दौरान उसे लगा कि, बेहतर जिंदगी के लिए सबसे पहले जरूरी है कि बढ़िया सी नौकरी की जाए। ज्योति इसके लिए सपने भी संजोने लगी थी। लेकिन कहते हैं न कि इंसान प्रस्ताव तैयार करने में लगा रहता है। वहीं दूसरी तरफ भगवान उसके प्रस्ताव को न कहने के लिए पहले से तैयार रहते हैं। कुछ ऐसा ही ज्योति के साथ भी हुआ। 16 की उम्र में ज्योति के पिता ने उनकी शादी एक किसान से करा दी। घर की हालत ठीक नहीं थी तो ज्योति भी काम पति के साथ खेत में काम करने लगी। एक समय ऐसा था जब गर्भ से होने के बाद भी उनको 5 रुपये के लिए काम करना पड़ा।

Jyothi Reddy

लेकिन इस दौरान ज्योति हारी नहीं बल्कि वो और मजबूत हुईं। शायद ऊपर वाला भी उसकी परीक्षा ले रहा था और अब समय आ गया था कि वो अपनी इस परीक्षा में ज्योति को फुल मार्क्स के साथ पास घोषित करें। ऐसा ही हुआ। ज्योति के सपनों के जो दरवाजे बंद हुए थे वो खुलने शुरू हुए। ज्योति नेहरू युवा केन्द्र की वॉलेंटियर बन गईं और कुछ समय बाद पढ़ाने लगी। लेकिन पैसे इतने नहीं हो रहे थे कि परिवार का खर्च चल सके। इसके लिए उसने कपड़े सिलने भी शुरू किए और इसी बीच में टाइपराइटिंग का काम भी सीखा। इन सब के बीच उसे दुनिया से लड़ना भी पड़ता था ताकि वो अपने अपनी जिन्दगी में वो काम कर सके जो वो करना चाहती थी। ज्योति ने इस बीच बीए और पीजी की डिग्री भी ली। इसके बाद उसे एक प्रतिमाह 398 रुपये की टीचर की जॉब मिल गई।

Jyothi Reddy ने नहीं मानी हार तो ऊपर वाले ने भी दिखाया रास्ता

स्कूल पहुंचने में ज्योति को 2 घंटे लगते थे। ज्योति ने इस टाइम को यूटिलाइज किया और इस दौरान वे बसों में साड़ियां बेचती थीं। जिन्दगी के इस दौर ने उन्हें समय का सही इस्तेमाल क्रिएटिवली कैसे किया जा सकता है इसके बारे में सीखा दिया। इसी बीच एक घटना ने ज्योति के सपनों को पंख दे दिए वो अमेरिका जाने की सोचने लगी। इसके लिए कम्प्यूटर की पढ़ाई की और फिर अमेरिका गई, इसके लिए उन्हे अपने दोनों बच्चों को एक मिशनरी हॉस्टल में छोड़ना पड़ा। लेकिन अमेरिका में रहना इतना आसान नहीं था। पहले गैस स्टेशन पर काम किया, बेबी सिटर भी बनी, मजदूरों वाले काम भी किए। इस बीच एक कंपनी में रिक्रूटर का काम मिला। फिर एक और जगह काम मिला लेकिन वो नौकरी नहीं रही और फिर ज्योति को गैस स्टेशन पर काम करना पड़ा।

लेकिन इन सब के बीच उनके दिमाग में अपने बिजनेस की बात आ गई थी। वो बस एक सही काम और समय का इंतजार कर रहीं थी। इसी बीच पेपर वर्क में माहिर ज्योति को कंसलटिंग कंपनी खोलने का ख्याल आया और अपनी 40000 डॉलर की सेविंग्स से उन्होंने केईवाईएसएस नाम की कंपनी खोली जो बड़ी तेजी से आगे बढ़ी। आज ज्योति की दोनों बेटियां अमेरिका के अच्छे स्कूल में पढ़ती हैं।

अपनी जिंदगी अनाथ की तरह जीते हुए भी कामयाबियों की बुलंदियों पर पहुंचने वाली ज्योति आज उन लोगों की मदद करती हैं जो अनाथ हैं। वो जब भी भारत आती हैं तो वृद्धा आश्रम और अनाथालयों में जाकर वहां रह रहे बुर्जुगों और बच्चों की मदद करती हैं। ज्योति की मानें तो उनका एक ही सपना है कि भारत का हर एक अनाथ बच्चा अपने दम पर अपना भविष्य लिखे और जिंदगी में कामयाब बने। ज्योति के सघंर्ष की कहानी हम सभी के लिए प्रेरणादायक है जो बताती है कि, मजबूत इरादों और अनिश्चित सहन शक्ति से अपनी तकदीर खुद से लिखी जा सकती है।

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